चुनाव आयोग के मतभेद Special Intensive Revision (SIR) को लेकर सामने आई रिपोर्ट के बाद राजनीतिक विवाद और तेज हो गया है। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने, पूरे मामले की जांच कराने और कुछ राज्यों में दोबारा चुनाव कराने की मांग उठाई है। RJD नेता तेजस्वी यादव ने बिहार और पश्चिम बंगाल में नए सिरे से चुनाव कराने की मांग की, जबकि उन्होंने महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा के चुनाव परिणामों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए।
वहीं, चुनाव आयोग ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और इसमें अलग-अलग राय, सवाल, तकनीकी सुझाव तथा आंतरिक टिप्पणियां सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा हैं। EC के अनुसार SIR समेत उसके महत्वपूर्ण फैसले सभी तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए।
तेजस्वी यादव ने क्या मांग रखी?
RJD नेता तेजस्वी यादव ने बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग पर विपक्ष को नुकसान पहुंचाने वाली कार्यप्रणाली अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बिहार और पश्चिम बंगाल में हुए चुनावों को लेकर गंभीर सवाल हैं और दोनों राज्यों में फिर से चुनाव कराया जाना चाहिए।
तेजस्वी ने महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा के चुनाव परिणामों का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, इन राज्यों में विपक्ष चुनावी प्रक्रिया के कारण नुकसान में रहा। हालांकि, ये आरोप विपक्षी नेताओं के राजनीतिक दावे हैं और चुनाव आयोग ने इन्हें स्वीकार नहीं किया है।
तेजस्वी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग भी की। उन्होंने चुनाव और मतगणना से जुड़े रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की अवधि में बदलाव पर भी सवाल उठाया और कहा कि इससे चुनावी विवादों में अदालत जाने वाले पक्षों के सामने साक्ष्य से जुड़ी मुश्किलें पैदा हो सकती हैं।
SIR और चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद
इस विवाद की पृष्ठभूमि में वह रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर करीब 10 महीनों में 14 बार आपत्तियां या टिप्पणियां दर्ज की थीं।
विपक्षी नेताओं ने इन रिपोर्टेड टिप्पणियों को आयोग के भीतर गंभीर मतभेद के संकेत के रूप में पेश किया है। DMK प्रमुख एमके स्टालिन ने भी ज्ञानेश कुमार को हटाने और SIR प्रक्रिया को रोकने की मांग की। उन्होंने कहा कि दो चुनाव आयुक्तों की ओर से उठाई गई आपत्तियों की स्वतंत्र और विस्तृत जांच होनी चाहिए।
SIR पर ममता बनर्जी ने भी उठाए सवाल
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी रिपोर्ट को लेकर चुनाव आयोग पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने SIR प्रक्रिया और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर सवाल उठाए तथा ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
ममता ने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया में आयोग की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। उनके बयान के मुताबिक, SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर विपक्षी दल पहले से आपत्ति जताते रहे हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने इस तरह के आरोपों को अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया में स्वीकार नहीं किया है।
अखिलेश यादव ने भी EC की भूमिका पर सवाल उठाए
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी चुनाव आयोग में कथित आंतरिक असहमति को गंभीर विषय बताया। उन्होंने कहा कि यदि दो चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मौकों पर फैसलों और आदेशों पर आपत्तियां दर्ज कीं, तो इसकी सार्वजनिक और संस्थागत जांच होनी चाहिए।
अखिलेश ने मतदाता सूची से जुड़े मामलों का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी के समर्थकों के नाम व्यवस्थित तरीके से हटाए गए। उन्होंने यह भी मांग की कि पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान ले। ये दावे भी अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के आरोप हैं।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
विपक्ष के आरोपों के बीच चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट में जिस तरह से आंतरिक मतभेद की तस्वीर पेश की गई है, वह अंतिम निर्णय प्रक्रिया को पूरी तरह नहीं दर्शाती।
EC के अनुसार, किसी बहु-सदस्यीय संस्था में निर्णय से पहले अलग-अलग सदस्यों द्वारा सवाल पूछना, सुझाव देना या किसी बिंदु पर अपनी राय दर्ज करना सामान्य प्रक्रिया है। आयोग ने कहा कि SIR समेत सभी महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने यह भी कहा कि उसके सभी आधिकारिक आदेश कानूनी आधार और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुरूप हैं।
BJP ने भी EC के पक्ष में रखा पक्ष
विपक्ष के आरोपों के जवाब में बीजेपी ने चुनाव आयोग के भीतर होने वाले विचार-विमर्श को लोकतांत्रिक संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। पार्टी नेताओं ने कहा कि अलग-अलग विचार सामने आना अपने आप में किसी फैसले को अवैध या असंवैधानिक नहीं बनाता।
इस तरह एक ही रिपोर्ट को लेकर विपक्ष और बीजेपी की व्याख्या अलग-अलग है। विपक्ष इसे चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़े गंभीर सवालों के रूप में देख रहा है, जबकि बीजेपी और EC का कहना है कि संस्थागत विचार-विमर्श को आंतरिक टकराव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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अब आगे क्या होगा?
फिलहाल विवाद के केंद्र में SIR, मतदाता सूची, चुनावी रिकॉर्ड और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया है। विपक्ष की मांग है कि आयोग के कामकाज की स्वतंत्र जांच हो और कुछ राज्यों में चुनाव दोबारा कराए जाएं। दूसरी ओर EC का कहना है कि उसके फैसले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद, अदालतों और राजनीतिक मंचों पर आगे उठ सकता है। खास तौर पर SIR से जुड़े फैसलों, चुनावी रिकॉर्ड के संरक्षण और दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों पर बहस जारी रहने की संभावना है।

