/ Mar 25, 2026

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इच्छामृत्यु पाने वाले देश के पहले मरीज हरीश राणा पंचतत्व में हुए विलीन

HARISH RANA PASSIVE EUTHANASIA: नियति के क्रूर प्रहार और 13 वर्षों के अंतहीन शारीरिक कष्ट के बाद, 31 वर्षीय हरीश राणा को बुधवार सुबह सम्मानजनक विदाई दी गई। दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में गमगीन माहौल के बीच हरीश का अंतिम संस्कार किया गया। छोटे भाई आशीष ने उन्हें मुखाग्नि दी। यह भारत का वह ऐतिहासिक और भावुक मामला है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार किसी मरीज को ‘पैसिव यूथेनेशिया‘ (इच्छामृत्यु) की अनुमति दी थी।

HARISH RANA PASSIVE EUTHANASIA: “कोई रोना मत”: पिता की रुंधती आवाज और बेटे का अंगदान

अंतिम संस्कार के दौरान माहौल बेहद हृदयविदारक था। 13 साल तक अपने बेटे को तिल-तिल मरते देखने वाले 62 वर्षीय पिता अशोक राणा ने हाथ जोड़कर वहां मौजूद लोगों से कहा, “कोई रोना मत। बेटा अब शांति से जाए, मैं बस यही प्रार्थना कर रहा हूं। भगवान उसे अगले जन्म में आशीर्वाद दें।”

मृत्यु के बाद भी हरीश छह लोगों के जीवन में उजाला कर गए। एम्स के डॉक्टरों के मुताबिक, परिवार की सहमति से हरीश के फेफड़े, दोनों किडनी और कॉर्निया दान कर दिए गए हैं, जिससे छह जरूरतमंद मरीजों को नया जीवन मिलने की उम्मीद है।(HARISH RANA PASSIVE EUTHANASIA)

HARISH RANA PASSIVE EUTHANASIA
HARISH RANA PASSIVE EUTHANASIA

एक हादसे ने छीन ली थी जिंदगी की मुस्कान

हरीश की दुखद दास्तां अगस्त 2013 में शुरू हुई थी। उस समय 19 साल के हरीश चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र थे। रक्षाबंधन के दिन अपनी बहन से फोन पर बात करते हुए वह पीजी की चौथी मंजिल से नीचे गिर गए। इस हादसे ने उन्हें ‘क्वाड्रिप्लेजिया’ (स्थायी वनस्पति अवस्था) में धकेल दिया।

अगले 13 वर्षों तक हरीश न बोल सकते थे, न हिल सकते थे। वह पूरी तरह मशीनों और फीडिंग ट्यूब पर निर्भर थे। बिस्तर पर पड़े-पड़े उनके शरीर में गहरे ‘बेडसोर्स’ (घाव) हो गए थे। डॉक्टरों के अनुसार, उनकी रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं थी और वे हर पल असहनीय दर्द में थे।(HARISH RANA PASSIVE EUTHANASIA)

कोर्ट का चक्कर और पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया

परिवार ने बेटे के इलाज में अपनी पूरी जमापूंजी लगा दी और आर्थिक व मानसिक रूप से टूट चुका था। बेटे को इस नरक जैसी स्थिति से मुक्ति दिलाने के लिए माता-पिता ने कानूनी लड़ाई लड़ी। 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ‘गरिमा के साथ मरने के अधिकार’ को बरकरार रखते हुए इच्छामृत्यु की अनुमति दी।(HARISH RANA PASSIVE EUTHANASIA)

  • 14 मार्च: हरीश को गाजियाबाद से दिल्ली एम्स शिफ्ट किया गया।

  • 16 मार्च: डॉक्टरों ने उनकी खाने की नली (फीडिंग ट्यूब) और अन्य लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाना शुरू किया।

  • 24 मार्च: एम्स में हरीश ने अंतिम सांस ली।

HARISH RANA PASSIVE EUTHANASIA: 13 साल के संघर्ष की टाइमलाइन

तिथि महत्वपूर्ण घटना
20 अगस्त 2013 हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल और कोमा में गए।
वर्ष 2022 माता-पिता ने दिल्ली हाई कोर्ट में पहली बार इच्छामृत्यु की गुहार लगाई।
8 जुलाई 2024 दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिका खारिज की, परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
11 मार्च 2026 सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, इच्छामृत्यु की अनुमति मिली।
24 मार्च 2026 13 साल के इंतजार के बाद एम्स में निधन।

पैसिव यूथेनेसिया क्या है?

पैसिव यूथेनेसिया (Passive Euthanasia) का मतलब होता है किसी गंभीर या लाइलाज बीमारी से पीड़ित मरीज को जानबूझकर जीवन बचाने वाले इलाज को न देना या उसे बंद कर देना, ताकि उसकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से हो सके। इसमें मरीज को मारने के लिए कोई दवा या इंजेक्शन नहीं दिया जाता, बल्कि केवल उस उपचार को रोक दिया जाता है जो कृत्रिम रूप से उसकी जिंदगी को बढ़ा रहा होता है, जैसे वेंटिलेटर हटाना या दवाएं बंद करना।

यह निर्णय आमतौर पर तब लिया जाता है जब डॉक्टरों को लगता है कि मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है और इलाज जारी रखने से सिर्फ उसकी पीड़ा बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में मरीज की इच्छा या उसके परिवार की सहमति भी महत्वपूर्ण होती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि पैसिव यूथेनेसिया और एक्टिव यूथेनेसिया अलग होते हैं। पैसिव में इलाज रोका जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेसिया में जानबूझकर दवा देकर मौत दी जाती है, जो भारत में अभी भी अवैध है।(HARISH RANA PASSIVE EUTHANASIA)

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