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Green Hydrogen क्या है? जिसे क्लीन एनर्जी पर भारत का सबसे बड़ा दांव माना जा रहा है

Green Hydrogen को भारत की क्लीन एनर्जी रणनीति का सबसे बड़ा दांव माना जा रहा है, लेकिन असल तस्वीर सरकारी लक्ष्यों जितनी आसान नहीं है। आइए विस्तार से समझते हैं Green Hydrogen क्या है, यह कैसे बनता है, और भारत में इसकी असली प्रगति अभी कहां तक पहुंची है।

Green Hydrogen क्या है?

Green Hydrogen वह हाइड्रोजन है, जो पानी को इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया के जरिए तोड़कर बनाया जाता है, और इसके लिए इस्तेमाल होने वाली बिजली पूरी तरह सोलर या विंड जैसे रिन्यूएबल स्रोतों से आती है। इसे “ग्रीन” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी पूरी उत्पादन प्रक्रिया लगभग शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के साथ होती है, जबकि पारंपरिक “ग्रे हाइड्रोजन” जीवाश्म ईंधन पर निर्भर रहती है।

यह कैसे बनाई जाती है?

इसका मुख्य आधार इलेक्ट्रोलिसिस तकनीक है, जिसमें PEM (Proton Exchange Membrane) और अल्कलाइन इलेक्ट्रोलाइजर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। हाल के सालों में इन तकनीकों की लागत में करीब 40 प्रतिशत तक कमी आई है, जिससे प्रोडक्शन धीरे-धीरे किफायती होता जा रहा है।

National Green Hydrogen Mission: सरकार का लक्ष्य क्या है?

जनवरी 2023 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹19,744 करोड़ के बजट के साथ National Green Hydrogen Mission को मंजूरी दी थी। इसका लक्ष्य 2030 तक हर साल कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन Green Hydrogen का उत्पादन करना है, जिसके लिए 125 GW समर्पित रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता और ₹8 लाख करोड़ से ज्यादा का निवेश जरूरी है। सरकार का अनुमान है कि इससे 6 लाख से ज्यादा रोजगार पैदा होंगे और करीब 50 मिलियन टन CO2 उत्सर्जन कम होगा।

असल प्रगति कहां तक पहुंची है?

यहीं पर तस्वीर उतनी उत्साहजनक नहीं दिखती। फरवरी 2026 तक भारत में सिर्फ करीब 8,000 टन सालाना उत्पादन क्षमता ही चालू हो पाई है, यानी 2030 के लक्ष्य का सिर्फ 0.16 प्रतिशत, और सिर्फ चार साल बचे हैं। इसका मतलब है कि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उत्पादन को अगले चार सालों में करीब 600 गुना बढ़ाना होगा, जिसे ज्यादातर विश्लेषक अब एक व्यावहारिक अनुमान से ज्यादा एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य मानने लगे हैं।

फंड के इस्तेमाल में भी सुधार जरूर हुआ है, FY24 में सिर्फ ₹0.11 करोड़ खर्च हुए थे, जो 2026 की शुरुआत तक बढ़कर ₹203.75 करोड़ हो गया, लेकिन मिशन ने अभी तक किसी भी पूरे वित्त वर्ष में ₹300 करोड़ भी खर्च नहीं किए हैं।

कीमत अभी भी सबसे बड़ी चुनौती क्यों है?

2026 में Green Hydrogen की कीमत ₹397 से ₹560 प्रति किलो के बीच है, जबकि पारंपरिक ग्रे हाइड्रोजन सिर्फ ₹150-200 प्रति किलो में मिल जाती है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुल लागत का करीब 50-70 प्रतिशत हिस्सा (लगभग ₹235 प्रति किलो) सिर्फ रिन्यूएबल बिजली की लागत से आता है। हालांकि SIGHT स्कीम के तहत हुई ग्रीन अमोनिया की नीलामी में ₹49.75-64.74 प्रति किलो जैसे उत्साहजनक दाम भी सामने आए हैं, जो वैश्विक औसत ₹110 प्रति किलो से काफी कम हैं।

Green Hydrogen renewable energy solar wind
Green Hydrogen, प्रतीकात्मक तस्वीर

इसका इस्तेमाल कहां होता है?

Green Hydrogen का सबसे बड़ा इस्तेमाल उन उद्योगों में हो रहा है, जिन्हें डीकार्बोनाइज करना सबसे मुश्किल माना जाता है, जैसे स्टील मैन्युफैक्चरिंग, फर्टिलाइजर (ग्रीन अमोनिया के रूप में), रिफाइनिंग और शिपिंग। Adani New Industries, L&T Electrolyzers, BHEL और Gensol Engineering जैसी कंपनियां इस क्षेत्र में बड़ी क्षमता स्थापित करने में जुटी हैं। अगर आप क्लीन एनर्जी से जुड़े अन्य विकल्पों के बारे में जानना चाहते हैं, तो हमारी Best Electric Vehicles in India गाइड भी देख सकते हैं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. Green Hydrogen क्या है, आसान शब्दों में समझाएं?
यह पानी को रिन्यूएबल बिजली से इलेक्ट्रोलिसिस करके बनाई गई हाइड्रोजन है, जिसमें लगभग शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है।

2. भारत का लक्ष्य क्या है?
2030 तक हर साल 5 मिलियन मीट्रिक टन उत्पादन का लक्ष्य है, हालांकि फरवरी 2026 तक सिर्फ 8,000 टन ही हासिल हो पाया है।

3. यह ग्रे हाइड्रोजन से महंगी क्यों है?
क्योंकि इसमें इस्तेमाल होने वाली रिन्यूएबल बिजली की लागत कुल खर्च का बड़ा हिस्सा खा जाती है।

4. इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल किन क्षेत्रों में होता है?
स्टील, फर्टिलाइजर, रिफाइनिंग और शिपिंग जैसे भारी उद्योगों में इसका इस्तेमाल सबसे ज्यादा हो रहा है।

उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है। अधिक तकनीकी जानकारी के लिए Wikipedia पर Green Hydrogen से जुड़ा लेख भी देखा जा सकता है।

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