धामी ने नेताओं के चहेतों को चढ़ा दिया पहाड़ !

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सभी धाणी देहरादून, होणी खाणी देहरादून, छोड़ा पहाड़ीयुं घोर -गोऊं, मारा ताणी देहरादून, ये गाना है लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी जी एक एल्बम का, जिसे साहित्यकार वीरेंद्र पंवार जी ने लिखा है. वैसे तो यह गाना कई मायनों में सटीक बैठता है. लेकिन यह गाना उन अधिकारी और कर्मचारियों पर भी सटीक बैठता है जिन्हें तैनाती तो मिल रखी है पहाड़ों में और वे अटैचमेंट में रह रहे हैं देहरादून में. अब वे पहाड़ों में रहें भी क्यूं. क्योंकि उनकी राजनीति पकड़ जो ठैरी ये पकड़ इतनी मजबूत हो गई है कि कई सालों से सरकारें आई और गई हैं लेकिन ये देहरादून में ही जमे हुए हैं. यही नहीं ये उन बेचारे अधिकारियों और कर्मचारियों को चिढ़ाते भी हैं जो लंबे समय से पहाड़ में रह रहे हैं, कि जिसती चलती उसकी क्या गलती. अब जब चलती है तभी तो इनकी होणी खाणी देहरादून में ही हो रखी है. लेकिन अब ऐसे अधिकारियों का देहरादून रहने का सपना चकना चूर हो गया है.

इनके देहरादून रहने के सपने भी किसी और ने नहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चकना चूर कर दिये हैं. मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने निर्देश जारी कर दिये हैं कि मुख्यमंत्री सचिवालय कार्यालय, आवास कार्यालय, विधानसभआ सहित देहरादून में विभिन्न विभागों के कार्यालयों में जो भी कर्मचारी समय- समय पर सम्बद्ध हुए हैं उनकी सम्बद्धता तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी जाये.अब ऐसे में उन सभी कर्मचारियों के नींद उड़ गई है जिन्हें पहाड़ों में वापस जाना पड़ेगा. मुख्यमंत्री का यह निर्देश उनका पहाड़ प्रेम भी दर्शाता है.

दअरसल उत्तराखंड में कर्मचारियों के अटैचमेंट का खेल आज से नहीं तब से खेला जा रहा है जब से उत्तराखंड बना. यहां कई अधिकारी और कर्मचारी ऐसे हैं जिनकी मूल तैनाती पहाड़ों में है लेकिन वे अपनी राजनीतिक पकड़ के कारण देहरादून में रह- रहे हैं. ये अटैचमेंट एक विभाग नहीं अमोमन सभी विभागों के अंदर है. इससे जो सबसे बड़ा नुकसान हो रहा है वह हो रहा है पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले लोगों का वो कैसे हो रहा है आप को समझाते हैं. जिन की नियुक्ती पहाड़ी क्षेत्र मे हो रखी है और वह देहरादून अटैच है, एक तो उसकी मूल तैनाती पहाड़ी क्षेत्र मे ही गिनी जाती है. यहां तक की उसकी सेवा भी दुर्गम क्षेत्र में गिनी जाती है. जिससे अटैचमेंट में रहने वाले कर्मचारियों को पूरा फायदा मिलता आ रहा है. लेकिन उनकी जगह किसी और कि भी तैनाती नहीं हो सकती, वह पद हमेशा रिक्त रहता है, तो ऐसे में नुकसान किस का हुआ.

धामी ने नेताओं के चहेतों को चढ़ा दिया पहाड़ !

पहाड़ी की जनता का दूसरा नुकसान उस कर्मचारी का हुआ जो लंबे समय से पहाड़ों में तैनात है और अपने साथ दूसरे कर्मचारी का कार्य भी उसे करना पड़ता है. जिसे ऐसे भी कह सकते हैं कि मजे किसी और के और सजा किसी और को इस अटैचमेंट के खेल में एक बड़ा नुकसान कर्मचारियों के उस तबके का भी होता है जो लंबे समय से पहाड़ों तैनात हैं.उनका स्वास्थ्य या पारिवारिक कारण से देहरादून आना जरूरी है. ऐसे में विभाग में पद तो खाली हैं लेकिन उन पर तो माननीयों के खासम खास अटॅच हुए बैठे हैं. इसके साथ ही इसके पीछे का एक पहलू यह भी है कि विभाग अटैचमेंट की स्थिति में आखिर खाली पद कहां का दिखायें पहाड़ का या देहरादून का और उस रिक्त पद को भरें तो भरें कैसे ऐसे में जब रिक्त पद नहीं भरेंगे तो फिर नुकसान किसे होगा, एक बेरोजगार को अब आप समझ गये होंगे के क्यों लोग मंत्री- विधायकों के पीछे घुमते हैं. ये पहली बार हुआ है कि किसी मुख्यमंत्री ने पूरी तरह से अटैचमेंट को समाप्त कर दिया हो इससे पहले अटैचमेंट को संरक्षण देना का ही काम किया जाता रहा है.

जिसे एक बार अटैचमेंट मिल जाता उसे फिर कोई दूसरा नहीं हिला सकता था. अब मुख्यमंत्री के इस मास्टर शॉट से कई लोग परेशान भी हो गये होंगे, लेकिन देखा जाये तो यह उत्तराखंड की नई कार्यप्रणाली के लिए बहुत जरूरी हो गया था. अब आप के साथ हमे भी यही इंतेजार रहेगा कि कितनी जल्दी मुख्यमंत्री के इन निर्देशों को अमली जामा पहनाया जाता है.