कैसे बना सत्तू का आटा एक दैविक पत्थर?

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पाण्डवों की धरती कहे जाने वाले उत्तराखंड में जब वे भगवान शिव को ढ़ूढते हुए केदारनाथ धाम जा रहे थे तो रुद्रप्रयाग जिले के सौडी के मध्य मन्दाकिनी नदी के बीचों बीच भीम के हाथ से सत्तू यानी की जौ आदि का मोटा आटा मन्दाकिनी नदी में गिर गया और ये आटा गिरकर दो भागों में टूट गया जिसके बाद इसने पत्थर का रूप धारण कर लिया, जिसका नाम पड़ा सत्तूढिण्ढा यानी की सत्तू का पत्थर।

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इसी एपिसोड में आज हम आपके सामने एक विशाल पत्थर की कहानी लेकर आ रहे हैं जो कोई मामूली पत्थर नहीं बल्की एक दैविक पत्थर है। इस विशाल पत्थर के दर्शन मात्र भर से ही आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं। रुद्रप्रयाग जिले से 23 किमी दूर अगस्त्यमुनि बेडूबगड ग्राम हाट सौडी के मध्य अविरल प्रवाहमान मन्दाकिनी नदी के बीचों बीच एक विशाल पत्थर विराजमान है।

इस पत्थर की ऊपरी सतह में चिनाई के अवशेष अभी भी दिखाई देते हैं। और जो इस विशाल पत्थर के बीच में दरार पड़ी है उसी दरार से पत्थर की चोटी तक जाया जाता है। गांव की कई महिलाएं पत्थर की चोटी पर उगी घास काटने के लिए इसी दरार के रास्ते जाती हैं। इस पत्थर की मान्यता है कि जो कोई इस पत्थर को स्पर्श करेगा या फिर दूर से ही इसके दर्शन करेगा उसकी हर एक मनोकामना पूरी होगी।

जो कोई भी केदारबाबा के दर्शन करने के लिए केदारनाथ धाम जाता है उनमें से अधिकतर लोग इस दिव्य पत्थर के दर्शन के लिए भी जाते है। इस दैविक पत्थर की मान्यता इसी बात से लगाई जा सकती है कि विदेश में रह रहे आसपास के लोग जब भी अपने गांव आते हैं तो इस पत्थर के दर्शन करने ज़रूर जाते हैं।

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