भारत की अदालतों में 5 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं। मौजूदा रफ्तार से इन्हें निपटाने में इंसानी जजों को 300 साल तक लग सकते हैं। यही वजह है कि दुनिया भर की न्याय व्यवस्थाएं AI की तरफ देख रही हैं, लेकिन AI Criminal Justice Bias को लेकर उठे सवाल भी उतने ही गंभीर हैं। अमेरिका के एक मशहूर मामले से शुरुआत करते हैं, फिर देखते हैं कि भारत इसी टेक्नोलॉजी को कैसे अलग तरीके से इस्तेमाल कर रहा है।
AI Criminal Justice Bias: COMPAS का चर्चित मामला
अमेरिका के कई राज्यों में COMPAS नाम का एक टूल इस्तेमाल होता है, जो किसी अपराधी के दोबारा अपराध करने की संभावना का अंदाजा लगाता है, इसी आधार पर जमानत, सजा और पैरोल के फैसले लिए जाते हैं। यह AI Criminal Justice Bias की सबसे चर्चित मिसाल मानी जाती है।
2016 में पत्रकारिता संस्था ProPublica ने इस टूल का विश्लेषण किया और पाया कि जो अश्वेत अपराधी आगे चलकर दोबारा अपराध नहीं करते थे, उन्हें “हाई-रिस्क” के तौर पर गलत तरीके से फ्लैग किए जाने की संभावना श्वेत अपराधियों के मुकाबले लगभग दोगुनी थी। वहीं जो श्वेत अपराधी दोबारा अपराध करते थे, उन्हें “लो-रिस्क” बताए जाने की गलती भी लगभग दोगुनी बार हुई।
COMPAS को बनाने वाली कंपनी Northpointe ने कभी अपने एल्गोरिदम की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की, यानी यह एक “ब्लैक बॉक्स” सिस्टम था, जिसकी जांच बाहर से करना लगभग नामुमकिन था।
AI Criminal Justice Bias: कहानी में एक दिलचस्प मोड़ भी है
बाद में हुई कुछ स्टडीज ने यह सवाल भी उठाया कि क्या COMPAS वाकई इतना “स्मार्ट” था। एक रिसर्च में पाया गया कि COMPAS 137 फैक्टर्स इस्तेमाल करता है, लेकिन सिर्फ दो फैक्टर्स — उम्र और पिछले दोषसिद्धियों की संख्या — से भी लगभग वैसी ही एक्यूरेसी मिल जाती है।
एक अलग स्टडी ने यह भी दिखाया कि साधारण, बेतरतीब इंसानी अंदाजा COMPAS जितना ही सटीक और “फेयर” निकला। यानी AI Criminal Justice Bias का सवाल सिर्फ यह नहीं कि AI बायस्ड है या नहीं, सवाल यह भी है कि क्या यह वाकई इंसानी फैसले से बेहतर है।
एक और चौंकाने वाली बात — एक स्टडी में पाया गया कि जजों ने रंगभेद से जुड़े डिफेंडेंट्स को वैकल्पिक सजा का विकल्प देने से अक्सर मना कर दिया, भले ही खुद AI टूल ने वह विकल्प सुझाया हो। यानी बायस सिर्फ AI में नहीं, इंसानों में भी बना रह सकता है, चाहे तकनीक कुछ भी सुझाए।

AI Criminal Justice Bias: भारत ने अलग रास्ता क्यों चुना
भारत की सुप्रीम कोर्ट ने जान-बूझकर COMPAS जैसा रास्ता नहीं अपनाया, शायद इसी AI Criminal Justice Bias के अनुभव से सीख लेते हुए। यहां के AI टूल्स — SUPACE (केस समराइजेशन और रिसर्च असिस्टेंट), SUVAS (19 भाषाओं में अनुवाद, अब तक 36,000+ फैसले ट्रांसलेट), TERES (रियल-टाइम ट्रांसक्रिप्शन), और LegRAA (लीगल रिसर्च) — कोई भी सजा या फैसले की सिफारिश नहीं करता।
SUPACE सिर्फ केस की जानकारी व्यवस्थित करता है, ताकि जज तेजी से जरूरी दस्तावेज ढूंढ सकें, यह कोई राय या सिफारिश नहीं देता। यह पांच साल बाद भी अभी एक्सपेरिमेंटल स्टेज में ही है, फिलहाल सिर्फ बॉम्बे और दिल्ली हाई कोर्ट के चुनिंदा क्रिमिनल केसेज में।
AI Criminal Justice Bias: जिस घटना ने अलार्म बजाया
जून 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT के कुछ आदेश रद्द कर दिए, क्योंकि वे AI से बनाए गए फर्जी, गैर-मौजूद केस रेफरेंसेज पर आधारित थे। जस्टिस नागरत्ना ने खुद एक ऐसे ही काल्पनिक फैसले का जिक्र किया, जो असल में कभी अस्तित्व में ही नहीं था।
इसी के बाद, 3 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने “Draft Regulations for Use of Artificial Intelligence in Courts, 2026” जारी किए, जिसमें साफ लिखा है, AI सिर्फ सहायक भूमिका में रहेगा, कानून, तथ्य और न्याय से जुड़े फैसले हमेशा इंसानी जजों के हाथ में ही रहेंगे। UNESCO के एक सर्वे में 73% प्रतिभागियों ने न्यायपालिका में AI को अनिवार्य रूप से रेगुलेट करने के पक्ष में राय दी।
अगर आप AI के डेटा और प्राइवेसी से जुड़े बड़े सवालों में दिलचस्पी रखते हैं, तो AI Data Privacy Concerns वाला आर्टिकल भी पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. AI Criminal Justice Bias का सबसे मशहूर उदाहरण क्या है?
अमेरिका का COMPAS टूल, जिसका 2016 में ProPublica ने विश्लेषण किया और रेस-आधारित असमानता पाई।
2. क्या AI इंसानी जजों से ज्यादा फेयर होता है?
जरूरी नहीं — कुछ स्टडीज में साधारण इंसानी अंदाजा भी AI टूल्स जितना ही सटीक और फेयर पाया गया।
3. भारत में जजों की मदद के लिए कौन-कौन से AI टूल्स इस्तेमाल होते हैं?
SUPACE, SUVAS, TERES और LegRAA — सभी सहायक भूमिका में हैं, कोई भी फैसले की सिफारिश नहीं करता।
4. भारत ने AI Criminal Justice Bias से बचने के लिए क्या नियम बनाए हैं?
जून 2026 में जारी Draft Regulations के मुताबिक, AI सिर्फ सहायक टूल रहेगा, न्यायिक फैसले हमेशा इंसानी जजों के अधिकार में रहेंगे।
5. AI को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत क्यों पड़ी?
क्योंकि कुछ मामलों में AI ने फर्जी, गैर-मौजूद केस रेफरेंसेज बना दिए, जिनके आधार पर कोर्ट के आदेश तक पास हो गए।
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यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। न्यायपालिका में AI से जुड़े नियम और तकनीक लगातार बदल रहे हैं, इसलिए नवीनतम जानकारी के लिए संबंधित आधिकारिक स्रोत जरूर चेक करें। उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

