UTTARKASHI PIRUL PLANT FIRE: उत्तरकाशी जिले के चकोन गांव स्थित पिरूल प्लांट में सोमवार तड़के लगी भीषण आग की घटना ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया। आग इतनी विकराल थी कि उसकी ऊंची लपटें दूर-दूर तक दिखाई दे रही थीं।
4 घंटे की मशक्कत के बाद काबू
UTTARKASHI PIRUL PLANT FIRE की सूचना मिलते ही फायर सर्विस की दो गाड़ियां टीम सहित मौके पर पहुंचीं और आग बुझाने का अभियान शुरू किया। दमकल कर्मियों ने करीब चार घंटे तक लगातार मशक्कत करने के बाद सुबह लगभग साढ़े सात बजे आग पर पूरी तरह नियंत्रण पाया।
हादसे में प्लांट का एक बड़ा हिस्सा, मशीनरी और भारी मात्रा में रखा पिरूल पाउडर जलकर राख हो गया। हालांकि राहत की बात यह रही कि घटना में किसी भी व्यक्ति या पशु की जान नहीं गई।
तड़के भड़की UTTARKASHI PIRUL PLANT FIRE
आपदा कंट्रोल रूम और स्थानीय सूत्रों के अनुसार ग्राम चकोन में महावीर गंगाडी के पिरूल प्लांट में सोमवार सुबह करीब साढ़े तीन बजे अचानक आग लग गई। प्लांट में बड़ी मात्रा में सूखी और ज्वलनशील सामग्री मौजूद होने के कारण आग तेजी से फैलती चली गई और कुछ ही देर में पूरे परिसर को अपनी गिरफ्त में ले लिया।

आसपास रहने वाले लोगों ने जब प्लांट से उठता धुआं और तेज लपटें देखीं तो तुरंत UTTARKASHI PIRUL PLANT FIRE की सूचना फायर ब्रिगेड और आपदा प्रबंधन विभाग को दी। आपदा प्रबंधन अधिकारी शार्दुल गुसांई ने बताया कि सूचना मिलते ही फायर सर्विस की टीम को तुरंत मौके पर भेजा गया।
दमकल कर्मियों ने सबसे पहले आग को आसपास के जंगलों और रिहायशी इलाकों तक फैलने से रोकने पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया। कई घंटों तक चले राहत कार्य के बाद आखिरकार सुबह साढ़े सात बजे आग पर काबू पा लिया गया।
शॉर्ट सर्किट से आग लगने की आशंका
UTTARKASHI PIRUL PLANT FIRE की प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि आग लगने की वजह शॉर्ट सर्किट हो सकती है। प्लांट में मौजूद अत्यधिक ज्वलनशील पिरूल सामग्री ने आग को और तेजी से फैलने में मदद की। हालांकि प्रशासन और फायर विभाग अभी वास्तविक कारणों की विस्तृत जांच कर रहे हैं।
UTTARKASHI PIRUL PLANT FIRE में प्लांट संचालक को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। शुरुआती अनुमान के अनुसार प्लांट की मशीनें, संरचना, तैयार पिरूल पाउडर और अन्य उपकरण पूरी तरह जल गए हैं।
महिलाओं की आजीविका पर पड़ा असर
इस पिरूल प्लांट से चकोन और आसपास के गांवों की लगभग 30 से 40 महिलाओं को रोजगार मिला हुआ था। महिलाएं जंगलों से चीड़ के सूखे पत्ते यानी पिरूल इकट्ठा करके प्लांट तक पहुंचाती थीं। प्लांट संचालक इन पत्तियों को करीब 50 रुपये प्रति किलो के हिसाब से खरीदता था।
इस योजना में वन विभाग की ओर से भी सब्सिडी दी जा रही थी। ऐसे में यह प्लांट केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं था, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता का बड़ा जरिया भी बन चुका था। आग के बाद प्लांट बंद होने से इन महिलाओं के सामने आय का संकट खड़ा हो गया है।
क्या होता है पिरूल प्लांट?
पिरूल प्लांट में चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियों को प्रोसेस करके धुआं रहित कोयला और ब्रिकेट तैयार किए जाते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में यही पिरूल गर्मियों में जंगलों की आग का सबसे बड़ा कारण बनता है।

ऐसे प्लांट जंगलों से पिरूल हटाकर उसे उपयोगी ईंधन में बदलने का काम करते हैं, जिससे वनाग्नि की घटनाएं कम करने में मदद मिलती है। इसके अलावा गैस सिलेंडरों की बढ़ती कीमतों और दूरस्थ इलाकों में गैस आपूर्ति की समस्याओं के बीच यह पिरूल आधारित ईंधन ग्रामीणों के लिए सस्ता और सुविधाजनक विकल्प बन रहा था।
डिस्क्लेमर: ऊपर दी गई UTTARKASHI PIRUL PLANT FIRE से संबंधित जानकारी विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, गूगल सर्च, अलग-अलग वेबसाइट्स तथा मीडिया/न्यूज़ रिपोर्ट्स के आधार पर संकलित की गई है। जानकारी को अधिकतम सावधानी के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, हालांकि समय-समय पर आंकड़ों और रिपोर्ट्स में बदलाव संभव है। किसी भी आधिकारिक निर्णय या निष्कर्ष के लिए संबंधित सरकारी संस्थानों और आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि अवश्य करें।
देश दुनिया से जुड़ी हर खबर और जानकारी के लिए क्लिक करें-देवभूमि न्यूज

