H1B VISA RULES CHANGES: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एच-1बी वीजा कार्यक्रम में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव किया है। ट्रंप प्रशासन ने घोषणा की है कि अब कंपनियों को हर एच-1बी वीजा के लिए सालाना 100,000 डॉलर यानी लगभग 88 लाख रुपये का शुल्क चुकाना होगा। अभी तक इसकी फीस सिर्फ 215 डॉलर थी, लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद यह शुल्क 465 गुना बढ़ जाएगा। यह नियम नए और नवीनीकरण दोनों प्रकार के वीजा पर लागू होगा। ट्रंप सरकार का दावा है कि यह कदम अमेरिकी नौकरियों की रक्षा करने और वीजा के दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है।

H1B VISA RULES CHANGES का तकनीकी क्षेत्र पर सबसे ज्यादा असर
एच-1बी वीजा का सबसे अधिक उपयोग तकनीकी कंपनियां करती हैं। अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और गूगल जैसी दिग्गज कंपनियां हर साल हजारों विदेशी कर्मचारियों को एच-1बी वीजा पर नियुक्त करती हैं। 2025 की पहली छमाही में ही अमेजन को 12,000 से ज्यादा और माइक्रोसॉफ्ट को 5,000 से अधिक एच-1बी वीजा स्वीकृत हुए थे। लेकिन अब नई फीस इतनी अधिक है कि छोटी और मध्यम कंपनियां विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करने से पीछे हट सकती हैं। इससे न सिर्फ भारतीय आईटी पेशेवरों को नुकसान होगा, बल्कि अमेरिकी तकनीकी क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी प्रभावित हो सकती है।

न्यूनतम वेतन सीमा में भी बदलाव
फीस बढ़ाने के साथ-साथ न्यूनतम वेतन सीमा को भी काफी ऊपर कर दिया गया है। पहले एच-1बी वीजा धारकों के लिए न्यूनतम वेतन 60,000 डॉलर सालाना था, जिसे अब बढ़ाकर 150,000 डॉलर कर दिया गया है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस बदलाव से केवल उच्च कुशल और योग्य श्रमिकों को अमेरिका में काम करने का अवसर मिलेगा। हालांकि, इससे बड़ी संख्या में विदेशी पेशेवर बाहर हो सकते हैं। इन बदलावों का सबसे बुरा असर भारतीय पेशेवरों पर पड़ेगा। अमेरिका में काम करने वाले हजारों भारतीय आईटी पेशेवर अब इस नई फीस और वेतन सीमा के कारण प्रभावित होंगे।

ट्रंप का नया ‘गोल्ड कार्ड’ कार्यक्रम
एच-1बी वीजा के बदलावों के साथ-साथ ट्रंप ने एक नई योजना ‘ट्रंप गोल्ड कार्ड’ की भी शुरुआत की है। इस योजना के तहत कोई भी विदेशी नागरिक 1 मिलियन डॉलर यानी लगभग 8.4 करोड़ रुपये चुकाकर अमेरिका में स्थायी निवास प्राप्त कर सकता है। कंपनियां भी 2 मिलियन डॉलर का दान देकर किसी विदेशी को प्रायोजित कर सकती हैं। यह योजना खासतौर पर अमीर निवेशकों और उद्यमियों को लक्षित करती है और सीधे ग्रीन कार्ड का रास्ता खोलती है। व्हाइट हाउस के मुताबिक, इसका मकसद अमेरिका की आर्थिक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करना है।

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