SATYAPAL MALIK: देश के वरिष्ठ राजनेता और जम्मू-कश्मीर, गोवा, मेघालय तथा बिहार के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का मंगलवार को दिल्ली के राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल में निधन हो गया। वह 79 वर्ष के थे और काफी समय से किडनी संबंधी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उन्हें 11 मई 2025 को RML अस्पताल में भर्ती किया गया था, जहां उनकी हालत बिगड़ने पर आईसीयू में रखा गया। मलिक डायलिसिस पर थे और डॉक्टरों के अनुसार उनकी सेहत में सुधार की संभावना बहुत कम थी। उनके निधन की पुष्टि उनके निजी सचिव कंवर सिंह राणा ने की है।

SATYAPAL MALIK का प्रारम्भिक जीवन और राजनीति
सत्यपाल मलिक का जन्म 24 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के हिसावदा गांव में एक जाट किसान परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर हुई, जिसके बाद उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। मलिक ने छात्र राजनीति में सक्रियता दिखाई और मेरठ कॉलेज में छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे। उनकी सादगी और ग्रामीण पृष्ठभूमि ने उनके व्यक्तित्व को एक जन-नेता के रूप में आकार दिया। सत्यपाल मलिक ने 1970 के दशक में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की।

वह विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े रहे, जिनमें जनता दल, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) शामिल हैं। 1974 से 1977 तक वह उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। इस दौरान उन्होंने ग्रामीण विकास और सामाजिक मुद्दों पर जोर दिया। 1980 से 1989 तक वह राज्यसभा सांसद के रूप में सक्रिय रहे, जहां उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। 1989 से 1991 के बीच वह जनता दल के टिकट पर अलीगढ़ से लोकसभा सांसद चुने गए और इस कार्यकाल में उन्होंने किसानों और सामाजिक न्याय के मुद्दों को संसद में प्रमुखता से उठाया।

राज्यपाल के रूप में कार्यकाल
राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल भी उल्लेखनीय रहा। वह 30 सितंबर 2017 से 21 अगस्त 2018 तक बिहार के राज्यपाल रहे। इसके बाद 21 अगस्त 2018 को उन्हें जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया गया और उन्होंने 30 अक्टूबर 2019 तक यह जिम्मेदारी निभाई। उनके कार्यकाल के दौरान ही 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया गया, जो देश के इतिहास में एक बड़ा और विवादास्पद फैसला था। इसके बाद वह गोवा और फिर मेघालय के राज्यपाल रहे और अक्टूबर 2022 तक अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया।

मलिक अपनी बेबाक राय और स्पष्ट वक्तव्यों के लिए हमेशा सुर्खियों में रहे। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहते हुए उन्होंने किरू जलविद्युत परियोजना से जुड़ी दो फाइलों को मंज़ूरी देने के लिए 300 करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश का दावा किया था, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। इस मामले में 2024 में सीबीआई ने उनके खिलाफ छापेमारी की थी, जिसे उन्होंने राजनीतिक साजिश करार दिया था।उन्होंने किसान आंदोलन और महिला पहलवानों के धरनों का समर्थन किया था और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते रहे। पुलवामा हमले को लेकर भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखी थी, जिससे उन्हें लेकर कई बार विवाद भी खड़े हुए।

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