छह साल से जेल में बंद हैं दोनों आरोपी
वर्ष 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद और छात्र कार्यकर्ता शरजील इमाम ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। दोनों ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत से राहत की मांग की है।
दोनों आरोपियों की ओर से दायर याचिकाओं में कहा गया है कि वे पिछले छह वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद हैं, लेकिन अब तक अभियोजन पक्ष ने मामले में सूचीबद्ध 900 से अधिक गवाहों में से एक भी गवाह की गवाही दर्ज नहीं कराई है। ऐसे में मुकदमे की सुनवाई में हो रही देरी और लंबे समय से जारी न्यायिक हिरासत को जमानत देने का आधार बनाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के एक साल के प्रतिबंध का दिया हवाला
5 जनवरी 2026 के फैसले के बाद नई याचिका
दरअसल, 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था। हालांकि, उसी मामले में अदालत ने पांच अन्य आरोपियों को जमानत प्रदान की थी।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि उमर खालिद और शरजील इमाम की कथित भूमिका अन्य आरोपियों से अलग स्तर की है। अदालत ने दोनों को भविष्य में जमानत के लिए दोबारा आवेदन करने की छूट दी थी। यह छूट संरक्षित गवाहों की जांच पूरी होने या फैसले की तारीख से एक वर्ष पूरा होने, दोनों में से जो पहले हो, उसके आधार पर दी गई थी।
अब दोनों आरोपियों ने दलील दी है कि 5 जनवरी 2027 तक एक वर्ष की अवधि पूरी होने वाली है, जबकि संरक्षित गवाहों की जांच निर्धारित समय तक पूरी होने की संभावना नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी खारिज कर दी थी जमानत
30 सितंबर को आया था फैसला
सुप्रीम कोर्ट के जनवरी के आदेश के बाद उमर खालिद और शरजील इमाम ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, 30 सितंबर 2026 को हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
हाईकोर्ट ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों के रहते वह दोनों आरोपियों को जमानत देने में राहत नहीं दे सकता।
इसके बाद दोनों ने शीर्ष अदालत में नई याचिकाएं दाखिल कर अपनी गिरफ्तारी, लंबी न्यायिक हिरासत और मुकदमे में हो रही देरी का मुद्दा उठाया है।
900 से अधिक गवाह, लेकिन अब तक एक की भी गवाही नहीं
मुकदमे में देरी को बनाया मुख्य आधार
उमर खालिद और शरजील इमाम की याचिकाओं में मुकदमे की धीमी गति पर विशेष जोर दिया गया है। दोनों का कहना है कि अभियोजन पक्ष ने 900 से अधिक गवाहों की सूची पेश की है, जिनमें 47 गवाह संरक्षित श्रेणी में रखे गए हैं।
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, अब तक किसी भी गवाह की गवाही शुरू नहीं हुई है। ऐसे में संरक्षित गवाहों की जांच जनवरी 2027 तक पूरी होने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है।
उनका तर्क है कि यदि मुकदमे की प्रक्रिया लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ती है और आरोपी लगातार जेल में रहते हैं, तो यह हिरासत न्यायिक प्रक्रिया के बजाय सजा जैसी स्थिति बन सकती है। उन्होंने संविधान के तहत त्वरित सुनवाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का भी सवाल उठाया है।
आरोप क्या हैं और कैसे शुरू हुआ था मामला?
फरवरी 2020 में भड़की थी हिंसा
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 के दौरान नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों के बीच हिंसा भड़क गई थी। 23 से 25 फरवरी के बीच हुई हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई थी, जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए थे। संपत्ति को भी बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा था।
दिल्ली पुलिस ने इस मामले में आरोप लगाया कि हिंसा अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक बड़ी साजिश थी। पुलिस ने उमर खालिद और शरजील इमाम सहित कई लोगों पर इस कथित साजिश में शामिल होने के आरोप लगाए।
दोनों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। उमर खालिद को सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था, जबकि शरजील इमाम को अगस्त 2020 में इस बड़ी साजिश से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था।
हालांकि, ये सभी आरोप हैं और अदालत में दोषसिद्धि होने तक दोनों आरोपी कानून की नजर में निर्दोष माने जाते हैं।
पांच अन्य आरोपियों को मिल चुकी है जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी 2026 को इसी मामले में गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दी थी। अदालत ने इन आरोपियों की कथित भूमिका को उमर खालिद और शरजील इमाम से अलग माना था।
इस फैसले के बाद दोनों आरोपियों की जमानत का मामला कानूनी और राजनीतिक बहस का विषय बना रहा।
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अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी निगाहें
उमर खालिद और शरजील इमाम की नई याचिकाओं के बाद अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट पर है। अदालत के सामने एक ओर कथित बड़ी साजिश से जुड़े गंभीर आरोप हैं, तो दूसरी ओर लंबे समय से जेल में बंद आरोपियों के मौलिक अधिकार और मुकदमे में हो रही देरी का सवाल है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का आगामी रुख न केवल दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाओं के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि UAPA के तहत लंबे समय तक विचाराधीन कैद और त्वरित न्याय के सिद्धांत पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकता है। फिलहाल दोनों आरोपियों को जमानत मिलने या न मिलने पर अंतिम फैसला अदालत को करना है।

