दीपावली के अवसर पर पटाखों के इस्तेमाल और उससे होने वाले वायु एवं ध्वनि प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। 29 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि पटाखों पर रोक लगाने और उनके इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए दिए गए उसके आदेशों का लगातार उल्लंघन हो रहा है। अदालत ने टिप्पणी की कि उसके आदेशों का पालन होने के बजाय उनका उल्लंघन ‘लेफ्ट एंड राइट’ यानी हर तरफ किया जा रहा है।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश की पीठ ने कहा कि दीपावली मूल रूप से रोशनी का त्योहार है। इसका संबंध दीपों, प्रकाश और खुशियों से रहा है, न कि बारूद और विस्फोटक पटाखों से।
दीपावली का मूल स्वरूप रोशनी और खुशियों से जुड़ा
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने दीपावली की सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्ता की ओर ध्यान दिलाया। अदालत की टिप्पणी थी कि दीपावली बारूद के इस्तेमाल से पहले भी मनाई जाती थी। इसलिए इस त्योहार की पहचान को पटाखों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
दीपावली भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है, जिसमें घरों को दीपों से सजाया जाता है, पूजा-अर्चना की जाती है और परिवार के लोग एक-दूसरे के साथ खुशियां बांटते हैं। ऐसे में त्योहार की मूल भावना को बनाए रखते हुए पर्यावरण और आम नागरिकों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है।
बार-बार टूट रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई कि पटाखों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए वर्षों से निर्देश जारी किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका प्रभावी पालन नहीं हो रहा है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। संबंधित सरकारी विभागों और प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे इन निर्देशों को वास्तविक रूप से लागू करें।
न्यायालय ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से पूछा कि प्रतिबंधित एवं नकली पटाखों की बिक्री रोकने के लिए अब तक क्या प्रभावी कदम उठाए गए हैं। अदालत ने अधिकारियों को निर्देशों के पालन को लेकर गंभीरता दिखाने की आवश्यकता बताई।
प्रदूषण से बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर खतरा
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा कि लगातार पटाखे फोड़ने से समाज के बड़े हिस्से के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
इसका असर विशेष रूप से निम्नलिखित वर्गों पर पड़ सकता है:
- छोटे बच्चों और बुजुर्गों पर।
- सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों पर।
- गर्भवती महिलाओं पर।
- गंभीर रूप से बीमार और दिव्यांग व्यक्तियों पर।
पटाखों से निकलने वाला धुआं हवा में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ाता है। वहीं तेज आवाज से ध्वनि प्रदूषण पैदा होता है। इससे लोगों को सांस लेने में परेशानी, आंखों में जलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
पूर्ण प्रतिबंध के बजाय प्रभावी नियंत्रण पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के पक्ष में फिलहाल नहीं है। अदालत ने माना कि पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव हो सकता है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री और नियमों के उल्लंघन को नजरअंदाज किया जाए। अदालत का जोर मौजूदा नियमों को प्रभावी तरीके से लागू कराने पर है।
न्यायालय ने अधिकारियों से कहा कि वे केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रहें, बल्कि बाजारों और अन्य संबंधित स्थानों पर जाकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करें।
नकली और प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री पर कार्रवाई जरूरी
अदालत ने केंद्र और दिल्ली सरकार से विशेष रूप से उन व्यापारियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा जो अधिक मुनाफा कमाने के लिए नकली और प्रतिबंधित पटाखे बेचते हैं।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों को व्यक्तिगत त्योहारों से ऊपर उठकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना होगा। बाजार में प्रतिबंधित पटाखों की उपलब्धता रोकने के लिए नियमित निरीक्षण और सख्त निगरानी आवश्यक है।
सरकार और प्रशासन की जवाबदेही
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी प्रशासनिक जवाबदेही के महत्व को भी सामने लाती है। यदि न्यायालय के आदेशों का बार-बार उल्लंघन होता है, तो केवल नए निर्देश जारी करने से समस्या का समाधान नहीं होगा।
सरकार को यह बताना होगा कि कितनी कार्रवाई की गई, कितने उल्लंघनकर्ताओं पर कार्रवाई हुई और प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री रोकने में कितनी सफलता मिली।
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निष्कर्ष:
परंपरा और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल पटाखों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज को दीपावली के वास्तविक अर्थ पर विचार करने का अवसर भी देती है।
दीपावली का संदेश अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय है। इसे मनाने के लिए अत्यधिक धुआं और शोर आवश्यक नहीं है। दीप जलाकर, जरूरतमंदों की सहायता करके और पर्यावरण का ध्यान रखते हुए भी त्योहार की खुशियां मनाई जा सकती हैं।
अदालत का स्पष्ट संदेश है कि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान करते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करना भी जरूरी है। त्योहार तभी सार्थक होगा, जब उसकी खुशियां किसी दूसरे व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवन के लिए परेशानी का कारण न बनें।

