Accounts Payable यानी वह रकम जो किसी कारोबार को अपने सप्लायर या वेंडर को आगे चुकानी है। आसान शब्दों में कहें, तो सामान या सेवा उधार में ली गई है और उसका भुगतान अभी बाकी है। छोटी दुकान हो या बड़ी कंपनी, हर बिजनेस में यह हिस्सा रोज के कामकाज से जुड़ा होता है। इसे सही से संभालना कैश फ्लो, साख और मुनाफे तीनों के लिए जरूरी है। इस लेख में हम Accounts Payable को एकदम आसान भाषा में समझेंगे।
इसे एक आसान उदाहरण से समझें
मान लीजिए एक कपड़ा दुकानदार ने थोक विक्रेता से 2 लाख रुपये का माल खरीदा। विक्रेता ने कहा कि भुगतान 30 दिन में कर दीजिए। अब जब तक दुकानदार यह 2 लाख रुपये नहीं चुकाता, तब तक यह रकम उसकी किताबों में देनदारी के रूप में दर्ज रहेगी। भुगतान होते ही यह देनदारी खत्म हो जाती है।
बैलेंस शीट में इसकी जगह कहां होती है?
बैलेंस शीट में यह रकम Current Liabilities यानी चालू देनदारियों के अंदर दिखाई जाती है। इसका मतलब है कि इसे आमतौर पर एक साल के अंदर चुकाना होता है। इसका ठीक उल्टा Accounts Receivable होता है, यानी वह पैसा जो ग्राहकों से आपको मिलना है। एक में पैसा जाना है और दूसरे में पैसा आना है।
Accounts Payable का बिजनेस में क्या महत्व है?
Accounts Payable का पहला फायदा कैश फ्लो से जुड़ा है। उधार में माल मिलने से कारोबारी अपना पैसा तुरंत खर्च किए बिना काम जारी रख सकता है और उस पैसे को दूसरी जरूरतों में लगा सकता है। दूसरा फायदा सप्लायर के साथ भरोसे का है।
जो कारोबारी समय पर भुगतान करता है, उसे आगे बेहतर कीमत, ज्यादा क्रेडिट और प्राथमिकता से माल मिलता है। तीसरा फायदा सही वित्तीय तस्वीर का है। बकाया भुगतान का साफ रिकॉर्ड होने से मालिक को पता रहता है कि अगले हफ्तों में कितना पैसा बाहर जाने वाला है।
भुगतान में देरी के क्या नुकसान हैं?
समय पर भुगतान न करने से लेट फीस और ब्याज देना पड़ सकता है। इसके अलावा सप्लायर क्रेडिट बंद कर सकता है या एडवांस पेमेंट की मांग कर सकता है। भारत में MSME सप्लायर को भुगतान के लिए कानून में अधिकतम 45 दिन की सीमा तय है। इस सीमा के बाद भुगतान करने पर खरीदार को ब्याज देना पड़ सकता है और टैक्स में उस खर्च की छूट पर भी असर पड़ सकता है।
इसकी प्रक्रिया कैसे चलती है?
Accounts Payable की प्रक्रिया की बात करें तो सबसे पहले कंपनी सप्लायर को परचेज ऑर्डर देती है। माल आने के बाद उसकी जांच होती है और फिर सप्लायर का बिल यानी इनवॉइस मिलता है। इसके बाद परचेज ऑर्डर, माल की रसीद और इनवॉइस को आपस में मिलाया जाता है।
इसे थ्री वे मैचिंग कहते हैं, जिससे गलत या दोहरे भुगतान से बचाव होता है। सब कुछ सही होने पर बिल को मंजूरी मिलती है और तय तारीख पर भुगतान कर दिया जाता है। आखिर में इसे अकाउंट की किताबों में दर्ज कर दिया जाता है।

इसे बेहतर तरीके से कैसे संभालें?
सभी बिलों की ड्यू डेट का एक कैलेंडर बनाएं, ताकि कोई भुगतान छूटे नहीं। आजकल Tally, Zoho Books जैसे अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर यह काम काफी आसान बना देते हैं। अगर सप्लायर जल्दी भुगतान पर डिस्काउंट देता है, तो उसका फायदा जरूर उठाएं। साथ ही GST इनवॉइस सही रखें, ताकि इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने में दिक्कत न आए।
बिजनेस के पैसों की बेहतर समझ के लिए Working Capital की प्लानिंग के बारे में पढ़ें। साथ ही Cash Flow Management और ट्रेड क्रेडिट वाले लेख भी आपके काम आएंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. Accounts Payable को हिंदी में क्या कहते हैं?
इसे हिंदी में देय खाते या लेनदारों की बकाया राशि कहा जाता है।
2. क्या यAccounts Payable एसेट है या लायबिलिटी?
यह लायबिलिटी यानी देनदारी है, जिसे बैलेंस शीट में चालू देनदारियों में दिखाया जाता है।
3. Accounts Receivable से यह कैसे अलग है?
इसमें पैसा आपको चुकाना होता है, जबकि Receivable में पैसा ग्राहकों से आपको मिलना होता है।
4. MSME सप्लायर को कितने दिन में भुगतान करना जरूरी है?
लिखित समझौता होने पर अधिकतम 45 दिन और समझौता न होने पर 15 दिन के अंदर भुगतान करना होता है।
5. Accounts Payable के बारे में और विस्तार से कहां पढ़ें?
इसकी विस्तृत परिभाषा और उदाहरण आप Investopedia पर पढ़ सकते हैं।
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उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

