विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बुधवार को चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोलते हुए ‘वोट चोरी’ को भारतीय नागरिकों के खिलाफ अपराध और संविधान पर सीधा हमला बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार लोगों ने देश के साथ विश्वासघात किया है। हालांकि, चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद की खबरों को खारिज करते हुए कहा है कि आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
राहुल गांधी ने क्या कहा?
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच X पर एक पोस्ट के जरिए चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि कथित ‘वोट चोरी’ भारतीय लोगों के खिलाफ अपराध और संविधान पर सीधा हमला है। उन्होंने बीजेपी, आरएसएस और चुनाव आयोग पर इसके लिए जिम्मेदार होने का आरोप लगाते हुए इसे ‘देशद्रोह’ करार दिया।
राहुल गांधी की यह टिप्पणी उस रिपोर्ट के बाद आई है जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में SIR और मतदाता सूची से जुड़े कई फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं।
SIR को लेकर क्या सामने आया?
रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 मौकों पर मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, अपीलों, नए मतदाताओं के पंजीकरण और मतदाता डेटा के प्रबंधन जैसे मुद्दों पर सवाल या आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ टिप्पणियां मतदाता डेटा को केंद्रीय स्तर पर संभालने और फॉर्म-6 से जुड़ी प्रक्रियाओं से संबंधित थीं।
इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और विशेष रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस ने की CEC के इस्तीफे की मांग
कांग्रेस नेताओं ने रिपोर्ट को आधार बनाकर चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए। वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने कहा कि यदि दो चुनाव आयुक्तों ने किसी निर्णय पर अलग राय रखी थी, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिया गया। उन्होंने SIR से जुड़े फैसलों की समीक्षा की मांग भी उठाई।
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर सवाल उठाते हुए उनके हटने की मांग की। विपक्षी दलों के कुछ अन्य नेताओं ने भी मामले की जांच और SIR प्रक्रिया को लेकर पुनर्विचार की मांग की है।
चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी?
राजनीतिक आरोपों के बीच चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि रिपोर्टों में जिस तरह के मतभेद की तस्वीर पेश की गई है, वह आयोग की अंतिम निर्णय प्रक्रिया को सही तरीके से नहीं दर्शाती।
EC के अनुसार किसी बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय, सवाल और सुझाव सामने आना सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा है। आयोग ने कहा कि आंतरिक स्तर पर किसी अधिकारी या सदस्य की टिप्पणी को अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।
चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक SIR सहित आयोग के सभी निर्णय मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
SIR क्यों बना राजनीतिक मुद्दा?
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची की समीक्षा और उसे अपडेट करना है। इस प्रक्रिया में मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच की जाती है और मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करने की कोशिश की जाती है। चुनाव आयोग का कहना है कि इसका उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता बढ़ाना है।
विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रक्रिया के दौरान वास्तविक मतदाताओं के नाम हटने की आशंका है और इस संबंध में पर्याप्त पारदर्शिता तथा उचित प्रक्रिया जरूरी है। यही विवाद अब चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया से जुड़ी रिपोर्ट के बाद और गहरा गया है।
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विवाद के बीच आयोग की भूमिका पर बहस तेज
इस पूरे घटनाक्रम में एक तरफ विपक्ष चुनाव आयोग से जवाबदेही और SIR प्रक्रिया की समीक्षा की मांग कर रहा है, जबकि आयोग का कहना है कि उसके अंतिम फैसलों में कोई संस्थागत विभाजन नहीं है।
राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ और ‘देशद्रोह’ वाले आरोप राजनीतिक विवाद को और तीखा करते हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि अलग-अलग विचारों को अंतिम निर्णय से जोड़कर देखना उचित नहीं है और SIR से संबंधित फैसले आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए गए हैं।
अब निगाह इस बात पर है कि SIR की आगे की प्रक्रिया, मतदाता सूची में संशोधन और विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों पर चुनाव आयोग किस तरह जवाब देता है। इस विवाद ने एक बार फिर मतदाता सूची की पारदर्शिता, चुनावी संस्थाओं की जवाबदेही और निर्णय प्रक्रिया को सार्वजनिक जांच के दायरे में ला दिया है।

