HomeViral Newsसरकारी स्कूलों में पत्रकारों-कार्यकर्ताओं की एंट्री पर रोक के खिलाफ याचिका खारिज,...

सरकारी स्कूलों में पत्रकारों-कार्यकर्ताओं की एंट्री पर रोक के खिलाफ याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने दखल से किया इनकार

सरकारी स्कूलों में पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, यूट्यूबर्स और अन्य बाहरी लोगों के प्रवेश पर उत्तर प्रदेश और राजस्थान में लगाए गए प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से दायर याचिका को अनुच्छेद 32 के तहत स्वीकार करने से मना करते हुए इसे खारिज कर दिया।

इस मामले में केवल स्कूल परिसरों में प्रवेश का मुद्दा ही नहीं था, बल्कि सरकारी स्कूलों में फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, ऑडियो रिकॉर्डिंग, इंटरव्यू और लाइव स्ट्रीमिंग को लेकर लागू किए गए प्रतिबंधों को भी चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता प्रिया मिश्रा का तर्क था कि सार्वजनिक हित से जुड़े मुद्दों की स्वतंत्र रिपोर्टिंग और दस्तावेजीकरण पर इस तरह की पाबंदियां नागरिकों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकती हैं।

राजस्थान में जारी किया गया था अनुमति संबंधी सर्कुलर

याचिका में राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा निदेशक की ओर से 16 अगस्त को जारी सर्कुलर को विशेष रूप से चुनौती दी गई थी। इस निर्देश के तहत सरकारी स्कूल परिसर में किसी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश के लिए प्रधानाचार्य से पूर्व अनुमति लेना जरूरी किया गया था।

इसके अलावा स्कूल परिसर में फोटो खींचने, वीडियो बनाने, ऑडियो रिकॉर्ड करने, किसी का इंटरव्यू लेने या लाइव स्ट्रीमिंग करने के लिए भी पहले से लिखित अनुमति लेने का प्रावधान किया गया था। सरकार की ओर से ऐसे नियमों का उद्देश्य स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा और उनकी निजता सुनिश्चित करना बताया गया है।

उत्तर प्रदेश में भी लागू हुए समान नियम

याचिका में उत्तर प्रदेश में जारी किए गए आदेशों का भी उल्लेख किया गया था। अयोध्या के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 19 अगस्त को एक आदेश जारी कर बाहरी लोगों, यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्तियों को बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति के परिषद के स्कूलों में प्रवेश करने अथवा फोटो-वीडियो बनाने से रोक दिया था।

याचिका में कहा गया था कि उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी इसी तरह के आदेश जारी किए गए हैं। याचिकाकर्ता ने इन आदेशों को मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताते हुए अदालत से उन्हें रद्द करने की मांग की थी।

याचिकाकर्ता ने क्या तर्क दिया?सुप्रीम कोर्ट

याचिकाकर्ता की ओर से मुख्य तर्क यह था कि सरकारी स्कूल सार्वजनिक संस्थान हैं और वहां की बुनियादी सुविधाओं तथा शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों का दस्तावेजीकरण सार्वजनिक हित का विषय हो सकता है।

याचिका में कथित तौर पर यह अंतर भी बताया गया कि बच्चों की पहचान उजागर करने वाली तस्वीरें या वीडियो रिकॉर्ड करने और स्कूल की भौतिक सुविधाओं, जैसे शौचालय, बिजली, भवन की स्थिति या अन्य बुनियादी ढांचे का दस्तावेजीकरण करने को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

याचिकाकर्ता ने इन प्रतिबंधों को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 से जुड़े अधिकारों के संदर्भ में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि किसी भी प्रतिबंध को उचित, आवश्यक और अनुपातिक होना चाहिए।

स्कूल ठीक करो’ अभियान की पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय आया है जब सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर नागरिक समूहों और कार्यकर्ताओं की गतिविधियां भी चर्चा में हैं। हाल के दिनों में ‘स्कूल ठीक करो’ जैसे अभियानों के तहत कुछ संगठनों ने सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं का निरीक्षण और दस्तावेजीकरण शुरू किया था।

राजस्थान में ऐसे ही एक निरीक्षण के दौरान कॉकroach जनता पार्टी (CJP) से जुड़े कार्यकर्ताओं के साथ कथित मारपीट की घटना भी सामने आई थी। इस घटना ने स्कूल परिसरों में नागरिक समूहों के प्रवेश और उनके निरीक्षण के अधिकार को लेकर बहस को और तेज कर दिया।

इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका को केवल प्रशासनिक आदेशों की चुनौती के तौर पर नहीं, बल्कि सरकारी संस्थानों की पारदर्शिता और बच्चों की सुरक्षा के बीच संतुलन से जुड़े बड़े सवाल के रूप में भी देखा जा रहा था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने 1 सितंबर के आदेश में कहा कि अदालत संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस रिट याचिका पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं है। इसके साथ ही याचिका को खारिज कर दिया गया।

कोर्ट के इस फैसले का व्यावहारिक असर यह है कि फिलहाल उत्तर प्रदेश और राजस्थान में संबंधित प्रशासनिक आदेश प्रभावी बने रहेंगे। यानी बाहरी लोगों, पत्रकारों, सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स और कार्यकर्ताओं को स्कूल परिसर में प्रवेश या रिकॉर्डिंग के लिए संबंधित अधिकारियों से अनुमति लेने की व्यवस्था जारी रहेगी।

बच्चों की सुरक्षा बनाम पारदर्शिता की बहस

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चों की निजता और सुरक्षा तथा सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता के बीच संतुलन का है।

एक ओर स्कूलों में नाबालिग बच्चों की मौजूदगी के कारण बिना अनुमति फोटो और वीडियो बनाए जाने से उनकी पहचान, निजता और सुरक्षा को लेकर वास्तविक चिंताएं हो सकती हैं। सोशल मीडिया के दौर में किसी बच्चे की तस्वीर या वीडियो का अनियंत्रित प्रसार गंभीर समस्या पैदा कर सकता है।

दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाएं सार्वजनिक नीति और सरकारी खर्च से संबंधित विषय हैं। पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अक्सर स्कूलों की स्थिति, शिक्षा की गुणवत्ता और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की रिपोर्टिंग करते हैं। ऐसे में अनुमति की प्रक्रिया अत्यधिक कठोर होने पर स्वतंत्र निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही प्रभावित होने की आशंका जताई जा सकती है।

आगे और समाचार पढ़े:

आगे की तस्वीर

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद अब राज्य सरकारों की अनुमति-आधारित व्यवस्था जारी रहेगी। स्कूलों में प्रवेश या रिकॉर्डिंग करने वाले पत्रकारों और सामाजिक संगठनों को संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से अनुमति लेने की जरूरत होगी।

भविष्य में यदि किसी विशेष आदेश को लेकर किसी पक्ष की ओर से अलग कानूनी चुनौती दी जाती है, तो अदालत उस आदेश की वैधानिकता और मौलिक अधिकारों पर विस्तृत विचार कर सकती है। फिलहाल शीर्ष अदालत ने मौजूदा जनहित याचिका के माध्यम से हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।

निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों, पत्रकारों, यूट्यूबर्स और सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रवेश तथा फोटो-वीडियोग्राफी पर लगाए गए प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो गई है।

अदालत ने अनुच्छेद 32 के तहत याचिका पर सुनवाई से इनकार किया, जिसके चलते संबंधित प्रशासनिक आदेश फिलहाल लागू रहेंगे। राजस्थान में स्कूल परिसर में प्रवेश और रिकॉर्डिंग के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था है, जबकि उत्तर प्रदेश के अयोध्या समेत अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह के निर्देश जारी किए गए हैं।

यह फैसला एक व्यापक बहस को भी सामने लाता है—स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और निजता सुनिश्चित करते हुए सरकारी संस्थानों की पारदर्शिता और स्वतंत्र पत्रकारिता को किस तरह संतुलित किया जाए। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से इनकार के बाद इस संतुलन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्य प्रशासन और शिक्षा विभागों पर है।

WhatsApp Group
Join Now
PandeyAbhishek
PandeyAbhishek
Abhishek Pandey is a skilled news editor with 4-5 years of experience in the field, he covers mostly political, world news, sports and etc.
RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular