रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने की दिशा में भारत ने एक बार फिर कूटनीतिक पहल का संकेत दिया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने गुरुवार को यूक्रेन की राजधानी कीव में यूक्रेनी विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा के साथ व्यापक बातचीत की। बैठक के बाद जयशंकर ने कहा कि भारत इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए “किसी भी तरह की मदद” देने को तैयार है। उन्होंने दोहराया कि भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि युद्ध का समाधान युद्धक्षेत्र में नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति के जरिए निकलेगा।
जयशंकर का यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष चौथे साल में पहुंच चुका है और दोनों देशों के बीच लंबे समय से प्रत्यक्ष शांति वार्ता में ठहराव बना हुआ है। भारत की ओर से कीव में दिया गया यह संदेश उसकी संतुलित कूटनीति और दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने की नीति को रेखांकित करता है।
‘अगर भारत मदद कर सकता है तो हम तैयार हैं’
जयशंकर ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि भारत लगातार मानता रहा है कि “यह युद्ध का युग नहीं है” और किसी भी समाधान को युद्ध के मैदान से हासिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि संघर्ष का हर गुजरता दिन और अधिक मौत और तबाही लेकर आता है।
उन्होंने कहा कि युद्ध को समाप्त करने के लिए अंतिम निर्णय रूस और यूक्रेन को ही लेना होगा, लेकिन अगर भारत किसी भी रूप में मददगार साबित हो सकता है तो वह इसके लिए तैयार है।
भारत की यह पेशकश महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि नई दिल्ली ने रूस और यूक्रेन दोनों के साथ अपने राजनयिक संबंध बनाए रखे हैं। भारत ने युद्ध शुरू होने के बाद से लगातार संवाद और कूटनीति को समाधान का रास्ता बताया है, जबकि पश्चिमी देशों और रूस के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी है।
जयशंकर ने पीएम मोदी के संदेश का भी दिया हवाला
जयशंकर ने अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया टिप्पणी का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि मोदी ने दो दिन पहले बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात में कहा था कि अब “अंतहीन युद्ध” को युद्ध के अंत की ओर बढ़ना चाहिए।
भारत का कहना है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान वैश्विक हित में है। युद्ध के कारण केवल दोनों देशों को ही नुकसान नहीं हुआ है, बल्कि ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, उर्वरक और वैश्विक व्यापार पर भी व्यापक असर पड़ा है।
यूक्रेन ने भारत के रुख का किया स्वागत
यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने भारत की पहल का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यूक्रेन प्रधानमंत्री मोदी के उस संदेश का समर्थन करता है जिसमें अंतहीन युद्ध को समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही गई है। यूक्रेन ने यह भी स्पष्ट किया कि वह कूटनीति के लिए तैयार है।
जयशंकर की यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से भी हुई। जेलेंस्की ने भारत के युद्ध समाप्त कराने के प्रयासों के प्रति आभार जताया और कहा कि शांति की जरूरत को लेकर भारत का रुख स्पष्ट है। दोनों नेताओं के बीच बातचीत में युद्ध समाप्त करने के संभावित रास्तों के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर भी चर्चा हुई।
कीव में भारतीय नागरिक की मौत का भी जिक्र
जयशंकर ने कीव यात्रा के दौरान हालिया हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि युद्ध में जान गंवाने वाले हर व्यक्ति के परिवार के प्रति भारत की गहरी संवेदना है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब जयशंकर के कीव पहुंचने के दौरान भी यूक्रेन में रूसी ड्रोन हमलों की खबरें सामने आईं। जेलेंस्की ने कहा कि रूसी हमलों में इस्तेमाल किए गए शहीद ड्रोन राजधानी की ओर भेजे गए थे, लेकिन यूक्रेनी लड़ाकू विमानों ने उनका मुकाबला किया।
काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा भी मुद्दा
भारत और यूक्रेन की बातचीत में केवल युद्ध और शांति वार्ता ही नहीं, बल्कि काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों का मुद्दा भी प्रमुख रहा। जयशंकर ने कहा कि भारतीय नाविक विभिन्न देशों के झंडे वाले जहाजों पर काम करते हैं और संघर्ष के दौरान कई बार वे भी इसका शिकार बने हैं।
उनके मुताबिक, समुद्री मार्गों में बाधा का असर केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं है। वैश्विक दक्षिण के कई देशों को ईंधन, उर्वरक और खाद्य आपूर्ति से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए भारत ने वाणिज्यिक शिपिंग और नाविकों की सुरक्षा को महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है।
रूस से तेल खरीद पर भारत का रुख कायम
यूक्रेन यात्रा के दौरान भारत की रूस से तेल खरीद भी चर्चा में रही। जयशंकर ने संकेत दिया कि केवल रूस से तेल खरीद बंद कर देने से युद्ध समाप्त नहीं होगा। भारत ने लगातार कहा है कि उसकी ऊर्जा जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा।
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में शामिल है और नई दिल्ली का तर्क है कि उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी अपने नागरिकों के लिए स्थिर और किफायती ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना है। इस मुद्दे पर भारत और पश्चिमी देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं।
भारत-यूक्रेन संबंधों को भी नई दिशा देने की कोशिश
जयशंकर और सिबिहा की बातचीत में दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर भी चर्चा हुई। विदेश मंत्री ने बताया कि भारत और यूक्रेन के बीच फार्मास्यूटिकल्स, खाद्य एवं कृषि, उर्वरक, मशीनरी, रसायन और उपभोक्ता वस्तुओं जैसे क्षेत्रों में व्यापार होता है।
उन्होंने कहा कि युद्ध और लॉजिस्टिक चुनौतियों के कारण पिछले चार वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार प्रभावित हुआ, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के संबंधों में मजबूती बनी रही है। डिजिटल तकनीक, स्टार्टअप, नवाचार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में भविष्य में सहयोग की नई संभावनाएं भी तलाशी जा सकती हैं।भारत ने यूक्रेन को अब तक 19 खेपों में मानवीय सहायता भी भेजी है। इनमें जनरेटर, दवाएं और चिकित्सा उपकरण समेत करीब 160 टन सामग्री शामिल है।
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आगे क्या है भारत की भूमिका?
जयशंकर की कीव यात्रा को भारत की उस कोशिश के रूप में देखा जा रहा है जिसमें वह रूस और यूक्रेन दोनों के साथ संवाद बनाए रखते हुए शांति प्रक्रिया में रचनात्मक भूमिका निभाना चाहता है। हालांकि, भारत ने किसी औपचारिक मध्यस्थता प्रक्रिया की घोषणा नहीं की है और जयशंकर ने भी यह नहीं बताया कि भारत किस विशेष प्रारूप में हस्तक्षेप करेगा।
फिलहाल नई दिल्ली का संदेश स्पष्ट है- युद्ध को सैन्य रास्ते से खत्म करने की कोशिश के बजाय बातचीत और कूटनीति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
निष्कर्ष
कीव में विदेश मंत्री एस. जयशंकर का यह बयान रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत की कूटनीतिक सक्रियता को दर्शाता है। भारत ने स्पष्ट किया है कि यदि वह किसी भी तरीके से दोनों पक्षों के बीच संघर्ष समाप्त कराने में मदद कर सकता है तो वह इसके लिए तैयार है।
यूक्रेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शांति संदेश का स्वागत किया है, जबकि जयशंकर ने बातचीत और कूटनीति को युद्ध समाप्त करने का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता बताया। साथ ही भारत ने काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा, वैश्विक खाद्य एवं ऊर्जा आपूर्ति और मानवीय सहायता जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता दी है।
अब देखना होगा कि भारत की यह कूटनीतिक पेशकश रूस-यूक्रेन शांति प्रक्रिया में किस हद तक प्रभावी भूमिका निभा पाती है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि नई दिल्ली दोनों पक्षों से संपर्क बनाए रखते हुए युद्ध के शांतिपूर्ण समाधान के लिए अपनी भूमिका निभाने को तैयार है।

