नेपाल में हाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बीच हिमालयी क्षेत्र से एक और चिंताजनक खबर सामने आई है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण उच्च हिमालयी इलाकों में 77 नई झीलें बनने की जानकारी सामने आई है। इन झीलों के अस्तित्व ने नेपाल के साथ-साथ उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए संभावित खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इन झीलों में से किसी झील की प्राकृतिक बांध जैसी संरचना टूटती है तो अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर आ सकता है और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
नेपाल में हालिया बाढ़ ने पहले ही हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है। नदियों के जलस्तर में अचानक बढ़ोतरी, भूस्खलन और मलबे के तेज बहाव ने कई इलाकों में जनजीवन को प्रभावित किया है। ऐसे समय में ग्लेशियरों के पिघलने से नई झीलों का निर्माण भविष्य में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को और गंभीर बना सकता है।
ग्लेशियरों के पिघलने से बन रही हैं झीलें
हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो रही है। जब ग्लेशियर पीछे हटते हैं तो उनके पीछे या आसपास पानी जमा होने लगता है। समय के साथ यह पानी बड़ी या छोटी झीलों का रूप ले सकता है।
इनमें से कई झीलें प्राकृतिक रूप से बनी मिट्टी, चट्टानों और बर्फ की संरचनाओं से घिरी होती हैं। इन संरचनाओं को स्थायी बांध नहीं माना जा सकता। भारी बारिश, भूस्खलन, बर्फ या चट्टानों के झील में गिरने अथवा जलस्तर अचानक बढ़ने से ऐसी झीलों की सीमाएं टूट सकती हैं।
ऐसी स्थिति में पानी बेहद तेज गति से नीचे की ओर बहता है और रास्ते में मिट्टी, पत्थर तथा अन्य मलबा अपने साथ बहा ले जाता है। यही प्रक्रिया GLOF को अत्यंत विनाशकारी बना सकती है।
77 नई झीलों ने बढ़ाई चिंता
रिपोर्ट के अनुसार, उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने से 77 नई झीलें बनने की जानकारी सामने आई है। इनका सामने आना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमालयी नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में मौजूद ऐसी झीलें निचले इलाकों के लिए संभावित खतरा बन सकती हैं।
विशेषज्ञों के लिए चिंता केवल झीलों की संख्या नहीं, बल्कि उनके आकार, गहराई, जलस्तर, प्राकृतिक बांध की मजबूती और आसपास की भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़ी है। सभी नई झीलें समान रूप से खतरनाक हों, यह जरूरी नहीं है। लेकिन जिन झीलों में पानी तेजी से जमा हो रहा है और जिनके आसपास अस्थिर ढलान मौजूद हैं, उनकी निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
नेपाल की बाढ़ ने दिखाया हिमालय का खतरा
हाल की नेपाल बाढ़ ने इस खतरे को और प्रासंगिक बना दिया है। रिपोर्टों और सामने आए दृश्यों में नेपाल के कई क्षेत्रों में अचानक आए तेज पानी और मलबे से भारी नुकसान दिखाई दिया। कुछ क्षेत्रों में बाढ़ का स्वरूप इतना तीव्र था कि सड़कें, इमारतें और संपर्क मार्ग प्रभावित हुए।
प्रारंभिक चर्चाओं में इस आपदा के संभावित कारणों में हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन, बर्फ-चट्टान के बड़े पैमाने पर खिसकने और नदी के प्रवाह में अचानक बदलाव जैसी घटनाओं का उल्लेख हुआ है। हालांकि, किसी एक कारण को अंतिम रूप से जिम्मेदार ठहराने से पहले वैज्ञानिक और आधिकारिक जांच जरूरी है।इस घटना ने यह जरूर दिखा दिया है कि ऊंचे हिमालयी इलाकों में छोटी अवधि में होने वाली प्राकृतिक घटनाएं नीचे बसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा सकती हैं।
उत्तराखंड के लिए भी खतरे की घंटी
नेपाल और तिब्बत से सटे हिमालयी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां उत्तराखंड के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। उत्तराखंड में अनेक प्रमुख नदियों और उनकी सहायक धाराओं का उद्गम हिमालयी ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले जलग्रहण क्षेत्रों से होता है।
यदि किसी ऊपरी क्षेत्र में ग्लेशियल झील टूटती है तो उसका प्रभाव नदी के प्रवाह के साथ काफी नीचे तक महसूस किया जा सकता है। तेज पानी के साथ आने वाला मलबा पुलों, सड़कों, बिजली परियोजनाओं और नदी किनारे बसे इलाकों को नुकसान पहुंचा सकता है।
उत्तराखंड पहले ही बादल फटने, अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं के प्रति संवेदनशील राज्य माना जाता है। ऐसे में हिमालयी झीलों की निगरानी और शुरुआती चेतावनी प्रणाली का महत्व और बढ़ जाता है।
GLOF क्या है और क्यों खतरनाक है?
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF उस स्थिति को कहा जाता है जब ग्लेशियर से जुड़ी झील का पानी अचानक बाहर निकल जाता है। यह घटना प्राकृतिक बांध के टूटने, झील में बड़े भूस्खलन या बर्फ-चट्टान के गिरने अथवा अत्यधिक जलस्तर बढ़ने के कारण हो सकती है।
GLOF की सबसे बड़ी विशेषता इसका अचानक आना है। नीचे रहने वाले लोगों को बहुत कम समय में भारी जलप्रवाह का सामना करना पड़ सकता है। पानी अपने साथ बड़ी मात्रा में चट्टान, मिट्टी और मलबा लेकर आता है, जिससे सामान्य बाढ़ की तुलना में इसका प्रभाव कई गुना अधिक विनाशकारी हो सकता है।
निगरानी और शुरुआती चेतावनी जरूरी
नई बनी झीलों को लेकर सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता उनकी वैज्ञानिक निगरानी है। विशेषज्ञों के अनुसार, उपग्रह तस्वीरों, ड्रोन सर्वेक्षण और जमीनी निरीक्षण के जरिए झीलों के आकार और जलस्तर में होने वाले बदलावों पर नजर रखी जा सकती है।
खतरनाक मानी जाने वाली झीलों के लिए शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित करना भी जरूरी है। यदि किसी झील के टूटने का खतरा बढ़ता है तो नीचे बसे गांवों और कस्बों तक समय रहते सूचना पहुंचाई जा सकती है।इसके अलावा, नदी किनारे निर्माण और बस्तियों की योजना बनाते समय भविष्य में आने वाली ऐसी घटनाओं के जोखिम को भी ध्यान में रखना होगा।
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जलवायु परिवर्तन से जुड़ा बड़ा सवाल
हिमालय में ग्लेशियरों का पिघलना केवल स्थानीय मौसम की समस्या नहीं है। यह व्यापक जलवायु परिवर्तन से जुड़ा विषय है। तापमान में लगातार वृद्धि होने से ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और कई स्थानों पर नए जलाशय बन रहे हैं।
हालांकि किसी विशेष बाढ़ या GLOF घटना को केवल जलवायु परिवर्तन के कारण बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। प्रत्येक घटना में स्थानीय भूस्खलन, वर्षा, भूगर्भीय परिस्थितियों और झील की संरचना जैसे कई कारक भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन ग्लेशियरों के पीछे हटने से संभावित झीलों की संख्या और आकार में बदलाव आना भविष्य के जोखिमों को समझने के लिए महत्वपूर्ण संकेत है।
निष्कर्ष
नेपाल में हाल की बाढ़ और भूस्खलन ने हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती प्राकृतिक संवेदनशीलता को फिर सामने ला दिया है। इसी बीच उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने से 77 नई झीलों के बनने की खबर ने चिंता बढ़ा दी है।
इन झीलों में से सभी खतरनाक हों, यह जरूरी नहीं है, लेकिन संभावित रूप से संवेदनशील झीलों की नियमित निगरानी बेहद आवश्यक है। नेपाल, उत्तराखंड और पूरे हिमालयी क्षेत्र में वैज्ञानिक संस्थानों तथा आपदा प्रबंधन एजेंसियों को मिलकर ऐसी झीलों की पहचान, जोखिम आकलन और शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना होगा।
हिमालय केवल बर्फ और पहाड़ों का क्षेत्र नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए जल का स्रोत है। इसलिए ग्लेशियरों के बदलते स्वरूप और उनसे बन रही नई झीलों को समझना आने वाले वर्षों में आपदा प्रबंधन और जल सुरक्षा दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।

