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मोहन भागवत के अमेरिका दौरे पर USCIRF की आपत्ति, RSS सदस्यों पर लक्षित प्रतिबंधों की मांग

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका दौरे को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी आयोग अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता (USCIRF) ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर गंभीर चिंता जताते हुए अमेरिकी सरकार से RSS के सदस्यों और कथित रूप से धार्मिक स्वतंत्रता उल्लंघनों में शामिल भारतीय अधिकारियों के खिलाफ लक्षित प्रतिबंधों पर विचार करने की अपील की है। आयोग ने विशेष रूप से मोहन भागवत को जारी अमेरिकी वीजा रद्द करने और भविष्य में उनके अमेरिका प्रवेश को रोकने की मांग की है।

USCIRF ने यह बयान 26 अगस्त 2026 को जारी किया। आयोग का कहना है कि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न को लेकर उसकी चिंता लगातार बनी हुई है। आयोग ने अपनी पुरानी रिपोर्टों का हवाला देते हुए RSS से जुड़े संगठनों के कुछ सदस्यों पर ईसाइयों, दलितों, मुसलमानों और सिखों के खिलाफ हिंसक हमलों में शामिल होने के आरोप लगाए हैं। हालांकि, ये USCIRF के आरोप और आकलन हैं; भारत सरकार और RSS का इस तरह के आरोपों पर अपना अलग पक्ष रहा है।

मोहन भागवत के दौरे पर क्यों उठी आपत्ति?मोहन

USCIRF के मुताबिक RSS प्रमुख मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा ने आयोग की चिंता बढ़ाई है। आयोग के अध्यक्ष आसिफ महमूद ने अमेरिकी सरकार से कहा कि वह धार्मिक स्वतंत्रता के कथित उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उपलब्ध नीतिगत विकल्पों पर विचार करे।

USCIRF ने विशेष रूप से भागवत का अमेरिकी वीजा रद्द करने और उन्हें भविष्य में अमेरिका में प्रवेश के लिए अयोग्य घोषित करने की मांग की है। साथ ही आयोग ने RSS के उन सदस्यों और भारतीय अधिकारियों के खिलाफ लक्षित प्रतिबंधों पर विचार करने की अपील की है, जिन्हें वह धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों से जोड़ता है।

भारत को ‘Country of Particular Concern’ बनाने की सिफारिश

USCIRF ने 2026 की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भारत को ‘Country of Particular Concern’ (CPC) के रूप में नामित करने की सिफारिश की थी। इस श्रेणी में उन देशों को रखा जाता है, जहां आयोग के आकलन के मुताबिक धार्मिक स्वतंत्रता के ‘विशेष रूप से गंभीर’ उल्लंघन होते हैं या सरकार उन्हें रोकने में विफल रहती है।

2026 की USCIRF सिफारिशों में भारत समेत 18 देशों को CPC के लिए अनुशंसित किया गया है। आयोग ने भारत के संदर्भ में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और कुछ कानूनों के इस्तेमाल को लेकर चिंता व्यक्त की है।

USCIRF ने किन मुद्दों का हवाला दिया?

अपने ताजा बयान में आयोग ने भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और कथित भेदभाव को लेकर कई मुद्दे गिनाए। आयोग का दावा है कि कुछ राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों का इस्तेमाल धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए किया गया है। उसने मुस्लिम नागरिकों से जुड़े NRC और CAA के संदर्भ में भी अपनी चिंताएं दर्ज की हैं।

इसके अलावा USCIRF ने भारत में नागरिक समाज और धार्मिक संगठनों के लिए काम करने की परिस्थितियों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। आयोग ने FCRA में प्रस्तावित बदलावों को लेकर कहा कि इससे धार्मिक और विश्वास-आधारित संगठनों की गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।

मई में भी हुई थी भारत पर सुनवाई

USCIRF की भारत को लेकर चिंता अचानक सामने नहीं आई है। आयोग ने 7 मई 2026 को ‘Deteriorating Religious Freedom Conditions in India’ विषय पर एक सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की थी। इसमें भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और कथित उत्पीड़न जैसे मुद्दों पर विशेषज्ञों ने अपनी राय रखी थी।

आयोग ने उस सुनवाई में कहा था कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति उसके आकलन के अनुसार लगातार खराब दिशा में जा रही है। उसने मुस्लिम और ईसाई समुदायों सहित अन्य धार्मिक समूहों के खिलाफ हिंसा तथा उत्पीड़न की घटनाओं को लेकर चिंता व्यक्त की थी।

लक्षित प्रतिबंध क्या होते हैं?

USCIRF ने इससे पहले मई 2026 में लक्षित प्रतिबंधों को धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघनों के खिलाफ अमेरिकी विदेश नीति के एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में बताया था। आयोग के अनुसार ऐसे प्रतिबंधों में वीजा प्रतिबंध और अमेरिका में मौजूद संपत्तियों को फ्रीज करने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं।

आयोग का तर्क है कि इस तरह के कदम पूरे देश या पूरी आबादी को प्रभावित किए बिना कथित उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों पर दबाव डाल सकते हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति पर प्रतिबंध लगाने का अंतिम निर्णय अमेरिकी सरकार के संबंधित विभागों और लागू कानूनों के तहत होता है।

भारत-अमेरिका संबंधों के लिए संवेदनशील मुद्दा

USCIRF की ताजा मांग ऐसे समय आई है जब भारत और अमेरिका के संबंध रणनीतिक, रक्षा, व्यापार और तकनीकी सहयोग के लिहाज से महत्वपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अमेरिकी संस्था की टिप्पणी दोनों देशों के बीच संवेदनशील कूटनीतिक मुद्दा बन सकती है।

विशेष रूप से मोहन भागवत जैसे RSS के शीर्ष नेता का नाम सीधे तौर पर उठाए जाने से यह विवाद केवल धार्मिक स्वतंत्रता की रिपोर्ट तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि भारत की घरेलू राजनीति और अमेरिका की विदेश नीति के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है।

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क्या अमेरिकी सरकार कार्रवाई करेगी?

फिलहाल USCIRF ने कार्रवाई की सिफारिश की है, कोई प्रतिबंध स्वयं लागू नहीं किया है। अब यह देखना होगा कि अमेरिकी प्रशासन इस सिफारिश पर क्या रुख अपनाता है। USCIRF की सिफारिशें प्रभावशाली हो सकती हैं, लेकिन वे अमेरिकी सरकार के लिए स्वतः बाध्यकारी आदेश नहीं हैं।

अमेरिकी सरकार यदि इस मामले में आगे बढ़ती है, तो उसे संबंधित कानूनों और अपनी विदेश नीति के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना होगा।

निष्कर्ष

मोहन भागवत के अमेरिका दौरे को लेकर USCIRF की ताजा टिप्पणी ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और भारत-अमेरिका संबंधों से जुड़े सवालों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आयोग ने अमेरिकी सरकार से RSS के कथित रूप से जिम्मेदार सदस्यों और संबंधित भारतीय अधिकारियों पर लक्षित प्रतिबंधों पर विचार करने तथा मोहन भागवत का अमेरिकी वीजा रद्द करने की मांग की है।

साथ ही, USCIRF ने भारत को 2026 में ‘Country of Particular Concern’ घोषित करने की अपनी सिफारिश दोहराई है।

हालांकि, इन सिफारिशों को अमेरिकी सरकार के अंतिम फैसले के रूप में नहीं देखा जा सकता। आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिकी प्रशासन USCIRF की मांगों पर क्या प्रतिक्रिया देता है। इस बीच, यह घटनाक्रम भारत में धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकारों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की भूमिका को लेकर एक नई राजनीतिक और कूटनीतिक बहस को जन्म दे सकता है।

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PandeyAbhishek
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Abhishek Pandey is a skilled news editor with 4-5 years of experience in the field, he covers mostly political, world news, sports and etc.
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