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राइट टू प्राइवेसी अफेयर छुपाने की ढाल नहीं: सुप्रीम कोर्ट का 2026 का बड़ा फैसला

राइट टू प्राइवेसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और साफ संदेश दिया है- शादी के दायरे से बाहर बने रिश्तों को छुपाने के लिए इसे ढाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें पति के होटल बुकिंग रिकॉर्ड और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) मंगाने की इजाज़त दी गई थी।

राइट टू प्राइवेसी पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने साफ किया कि अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाला राइट टू प्राइवेसी एक असीमित अधिकार नहीं है। कोर्ट के अनुसार, शादी के दायरे से बाहर किसी अन्य व्यक्ति के साथ आपसी सहमति से बने संबंध को इस अधिकार के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई भी पति सिर्फ प्राइवेसी का हवाला देकर अपनी पत्नी को जरूरी जानकारी देने से मना नहीं कर सकता, खासकर तब जब मामला अदालत में वैवाहिक विवाद का हो।

पूरा मामला क्या था?

यह विवाद जयपुर के एक मामले से जुड़ा है, जहां पत्नी ने तलाक की अर्जी में पति पर क्रूरता और व्यभिचार का आरोप लगाया था। पत्नी का दावा था कि उसका पति एक होटल में किसी अन्य महिला के साथ ठहरा था, और इसे साबित करने के लिए उसने होटल रिकॉर्ड व पति के मोबाइल नंबरों का CDR मांगा।

पति ने इसका विरोध करते हुए राइट टू प्राइवेसी का हवाला दिया, लेकिन फैमिली कोर्ट और बाद में दिल्ली हाई कोर्ट, दोनों ने पत्नी के पक्ष में फैसला दिया।

राइट टू प्राइवेसी सुप्रीम कोर्ट भवन
राइट टू प्राइवेसी सुप्रीम कोर्ट भवन

हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने क्यों सही ठहराया?

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा था कि राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकार जरूर है, लेकिन सार्वजनिक हित और न्याय के मामलों में इस पर तार्किक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। कोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि व्यभिचार तलाक का एक वैध आधार है।

सुप्रीम कोर्ट ने अब इसी तर्क को बरकरार रखते हुए साफ कर दिया कि राइट टू प्राइवेसी के नाम पर शादीशुदा जीवन में बेवफाई साबित करने से रोकना जनहित में नहीं होगा।

आम लोगों के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?

राइट टू प्राइवेसी से जुड़ा यह फैसला उन तमाम मामलों के लिए एक मिसाल बन सकता है जहां पति-पत्नी के बीच व्यभिचार या बेवफाई का विवाद अदालत तक पहुंचता है। अब फैमिली कोर्ट ऐसे सबूत जुटाने में पति या पत्नी की मदद कर सकती हैं, भले ही दूसरा पक्ष प्राइवेसी का हवाला दे।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला वैवाहिक विवादों में सबूत जुटाने की प्रक्रिया को आसान बनाएगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. राइट टू प्राइवेसी का यह फैसला किस मामले से जुड़ा है?
यह जयपुर के एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा है, जहां पत्नी ने पति पर व्यभिचार का आरोप लगाया था।

2. सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
कोर्ट ने कहा कि राइट टू प्राइवेसी का इस्तेमाल शादी के बाहर के संबंध छुपाने के लिए नहीं किया जा सकता, और होटल व कॉल रिकॉर्ड मंगाने को सही ठहराया।

3. क्या राइट टू प्राइवेसी पूरी तरह खत्म हो गया है?
नहीं, कोर्ट ने सिर्फ इतना कहा कि यह अधिकार असीमित नहीं है और जनहित व न्याय के मामलों में इस पर उचित प्रतिबंध लग सकते हैं।

4. इस फैसले का आम लोगों पर क्या असर होगा?
अब वैवाहिक विवादों में व्यभिचार साबित करने के लिए सबूत जुटाना कानूनी रूप से आसान हो सकता है। (स्रोत: Times Now Navbharat)

उपरोक्त जानकारी गूगल और विभिन्न वेबसाइट/समाचार माध्यमों से ली गई है। सटीकता की गारंटी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के अन्य हालिया बड़े फैसले

राइट टू प्राइवेसी से जुड़े इस फैसले के अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने हाल में और भी कई अहम मामलों पर फैसले सुनाए हैं। जैसे फ्लैट का कब्जा मिलने के बाद भी मुआवजा मांगने के अधिकार से जुड़ा एक बड़ा फैसला, और खतरनाक कुत्तों को लेकर आया एक चर्चित फैसला, दोनों ही कानूनी हलकों में खासी चर्चा में रहे।

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