गणेश चतुर्थी का पर्व आते ही देशभर में ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयघोष सुनाई देने लगते हैं। आमतौर पर गणेशोत्सव की सबसे भव्य तस्वीर महाराष्ट्र से जुड़ी मानी जाती है, जहां मुंबई और पुणे से लेकर छोटे शहरों और गांवों तक गणपति पंडालों की रौनक देखते ही बनती है। लेकिन भगवान गणेश की आराधना केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। देश के कई अन्य राज्यों में भी गणेशोत्सव अलग-अलग क्षेत्रीय परंपराओं, लोक-संस्कृति और उत्सवी रंगों के साथ मनाया जाता है।
2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर से शुरू हो रही है और इसके साथ ही देश के अलग-अलग हिस्सों में गणेश प्रतिमाओं की स्थापना, पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक आयोजनों का सिलसिला शुरू हो गया है। अलग-अलग राज्यों में इस पर्व का स्वरूप भले ही अलग हो, लेकिन श्रद्धा और उत्साह में कोई कमी नहीं दिखाई देती।
महाराष्ट्र की परंपरा सबसे अलग
महाराष्ट्र को गणेशोत्सव का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। मुंबई, पुणे, नागपुर, नासिक और कोल्हापुर जैसे शहरों में सार्वजनिक गणेश मंडलों की परंपरा बेहद मजबूत है। मुंबई में लालबागचा राजा जैसे प्रसिद्ध गणपति पंडालों में दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
पुणे में भी ऐतिहासिक गणपति मंडलों और पारंपरिक ढोल-ताशा पथकों की अपनी अलग पहचान है। इस वर्ष भी गणेश चतुर्थी के अवसर पर महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में बप्पा के आगमन को लेकर जबरदस्त उत्साह है।हालांकि, गणेशोत्सव की यह भव्यता अब महाराष्ट्र की सीमा से बाहर भी दिखाई देती है।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में झांकियों की खास पहचान
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी गणेशोत्सव के दौरान दस दिनों तक उत्सवी माहौल बना रहता है। मध्य प्रदेश के इंदौर में गणेश उत्सव की झांकियां और अनंत चतुर्दशी का प्रसिद्ध ‘चल समारोह’ विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है।
इंदौर की ऐतिहासिक कपड़ा मिलों से जुड़ी झांकियों की परंपरा ने गणेशोत्सव को स्थानीय संस्कृति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वहीं भोपाल और ग्वालियर जैसे शहरों में भी विभिन्न समितियां भव्य पंडाल और धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं।
छत्तीसगढ़ में रायपुर और भिलाई जैसे शहरों में गणपति पंडालों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां धार्मिक आयोजनों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
गुजरात में गणपति के साथ गरबा और रास
गुजरात की पहचान गरबा और रास से है और गणेशोत्सव में भी इस लोक-संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। यहां कई स्थानों पर गणपति पंडालों में शाम की आरती के बाद गरबा और रास का आयोजन किया जाता है।
इस तरह गणेश पूजा और गुजरात की पारंपरिक लोक-संस्कृति एक साथ दिखाई देती है। परिवारों और स्थानीय समितियों के अलावा युवा समूह भी इन आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।यही क्षेत्रीय विविधता गणेशोत्सव को केवल धार्मिक पर्व न रहकर सांस्कृतिक उत्सव का रूप देती है।
कर्नाटक में गणेशोत्सव से पहले होती है गौरी पूजा
दक्षिण भारत में कर्नाटक का गणेशोत्सव अपनी विशेष परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां गणेश चतुर्थी से ठीक पहले ‘गौरी हब्बा’ मनाया जाता है। यह पर्व माता गौरी को समर्पित है और इसके बाद गणेश जी का स्वागत किया जाता है।
कर्नाटक के कई हिस्सों में गणेश प्रतिमाओं की स्थापना के साथ विशेष पूजा-अर्चना और पारंपरिक व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। बेंगलुरु और हुबली जैसे शहरों में बड़े पंडाल भी सजाए जाते हैं।गौरी हब्बा और गणेश चतुर्थी का यह क्रम कर्नाटक की धार्मिक परंपराओं में देवी और गणेश के पारिवारिक संबंध को भी दर्शाता है।
तेलंगाना में खैराताबाद गणेश आकर्षण का केंद्र
तेलंगाना में गणेशोत्सव की बात हो और हैदराबाद के खैराताबाद गणेश का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं। खैराताबाद क्षेत्र में विशाल गणेश प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा लंबे समय से लोगों के आकर्षण का केंद्र रही है।
गणेशोत्सव के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। विशाल प्रतिमा और विसर्जन जुलूस इस आयोजन को खास पहचान देते हैं। प्रतिमा के विसर्जन के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है और जुलूस हुसैन सागर झील की ओर बढ़ता है।
तेलंगाना में गणेश चतुर्थी को स्थानीय तौर पर विनायक चविथी के नाम से भी जाना जाता है और कई इलाकों में सामुदायिक स्तर पर आयोजन होते हैं।
दक्षिण भारत के दूसरे राज्यों में भी बढ़ी लोकप्रियता
गणेश चतुर्थी कर्नाटक और तेलंगाना के अलावा आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में भी श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। तमिलनाडु में इसे विनायकर चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। राज्य के कई शहरों में घरों और सार्वजनिक स्थानों पर गणेश प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं।
हालिया रिपोर्टों के मुताबिक 2026 में तमिलनाडु समेत देश के विभिन्न हिस्सों में गणेश चतुर्थी के अवसर पर मंदिरों और सार्वजनिक पंडालों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है।
पूर्वोत्तर में भी दिख रहा उत्सव का नया रंग
गणेशोत्सव का विस्तार पूर्वोत्तर भारत तक भी दिखाई देता है। असम के गुवाहाटी में 2026 के गणेश चतुर्थी आयोजन में 45 फीट ऊंची पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमा विशेष आकर्षण बनी है। यह आयोजन दिवंगत गायक जुबिन गर्ग को श्रद्धांजलि देने के लिए भी विशेष रूप से चर्चा में है।
प्रतिमा के निर्माण में प्लास्टिक और कृत्रिम रंगों से बचते हुए पर्यावरण-अनुकूल सामग्री के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। इससे गणेशोत्सव में धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण के संदेश को भी जोड़ा जा रहा है।
पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता
गणेशोत्सव के बढ़ते विस्तार के साथ पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी जागरूकता बढ़ी है। कई स्थानों पर मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाओं और प्राकृतिक रंगों को प्राथमिकता दी जा रही है। इसका उद्देश्य विसर्जन के दौरान जलस्रोतों को होने वाले नुकसान को कम करना है।
कई समितियां पंडालों में सामाजिक संदेश, रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जांच और अन्य सामुदायिक गतिविधियां भी आयोजित करती हैं। इस तरह गणेशोत्सव धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक भागीदारी का माध्यम भी बन रहा है।
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एक पर्व, अनेक परंपराएं
गणेशोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में इसका स्वरूप स्थानीय संस्कृति के अनुसार बदल जाता है। महाराष्ट्र में ढोल-ताशे और भव्य सार्वजनिक मंडल, गुजरात में गरबा-रास, कर्नाटक में गौरी हब्बा, तेलंगाना में विशाल प्रतिमाएं और पूर्वोत्तर में पर्यावरण-अनुकूल आयोजन—ये सभी एक ही पर्व के अलग-अलग रंग हैं।
निष्कर्ष
गणेश चतुर्थी 2026 के साथ देशभर में उत्सव का माहौल है। महाराष्ट्र भले ही गणेशोत्सव की भव्य सार्वजनिक परंपरा के लिए सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हो, लेकिन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और असम समेत कई राज्यों में भी बप्पा के स्वागत की अपनी अनूठी परंपराएं हैं।
यही विविधता गणेशोत्सव को भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनाती है। अलग-अलग भाषाएं, रीति-रिवाज और उत्सव की शैलियां होने के बावजूद ‘गणपति बप्पा मोरया’ का जयघोष देश के कोने-कोने में लोगों को एक सूत्र में जोड़ता दिखाई देता है।

