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पहले वोट गया, फिर झुग्गी गई: दिल्ली में SIR पर उठे गंभीर सवाल

“पहले वोट गया, फिर झुग्गी गई”—दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर आयोजित जनसुनवाई में यह दर्द भरा बयान लोकतांत्रिक व्यवस्था और गरीबों के अधिकारों पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। जिन लोगों ने वर्षों से दिल्ली में रहकर मतदान किया, अब उन्हीं में से कई लोगों के नाम मतदाता सूची से गायब होने और उनके घर उजाड़े जाने की शिकायतें सामने आई हैं। इस मुद्दे ने चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और आम नागरिक के मताधिकार को लेकर बहस तेज कर दी है।

दिल्ली की माया देवी की कहानी ने खींचा ध्यानदिल्ली

दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 में रहने वाली 58 वर्षीय माया देवी की कहानी इस विवाद का एक प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आई है। घरेलू कामकाज करके परिवार चलाने वाली माया देवी ने बताया कि मतदाता सूची से उनका और उनकी दो बेटियों का नाम गायब है, जबकि उनके पति और बेटे के नाम सूची में मौजूद हैं।

माया देवी के मुताबिक, वह किशोरावस्था से दिल्ली में रह रही हैं और 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव सहित पिछले कई चुनावों में मतदान कर चुकी हैं। उन्होंने अपने नाम को दोबारा मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से मदद मांगी, लेकिन उनके अनुसार, अधिकारी उनकी सहायता के लिए नहीं पहुंचे।

इसी बीच उनकी झुग्गी भी तोड़ दी गई। इसके बाद परिवार के पांच सदस्यों को सीमित जगह में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। उनकी आपबीती ने यह सवाल खड़ा किया कि जब किसी परिवार की पहचान, आवास और मतदान का अधिकार एक साथ संकट में आ जाए, तो उसकी समस्याओं का समाधान कौन करेगा?

दिल्ली के SIR प्रक्रिया और मतदाता सूची में विसंगतियां

SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना और मृत, स्थानांतरित या दोहरे पंजीकरण वाले मतदाताओं की पहचान करना है। हालांकि, दिल्ली में इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और लोगों को नोटिस दिए जाने पर आपत्तियां उठी हैं।

15 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में आयोजित एक स्वतंत्र जनसुनवाई में दिल्ली समेत पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, बिहार और राजस्थान के लोगों ने अपनी शिकायतें रखीं। सुनवाई की अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीशों के एक पैनल ने की। कई लोगों ने दावा किया कि जरूरी दस्तावेज जमा करने के बावजूद उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।

वोटर अधिकार मंच और जन सरोकार से जुड़े प्रस्तुतकर्ताओं के अनुसार, जनवरी 2025 की मतदाता सूची में दिल्ली में 1.5 करोड़ से अधिक मतदाता थे। जनवरी से जून 2026 के बीच नियमित विलोपन के दौरान लगभग 11 लाख नाम हटाए गए। इसके बाद 31 अगस्त 2026 को प्रकाशित SIR की मसौदा सूची में 47 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम भी शामिल नहीं थे।

इन आंकड़ों और शिकायतों ने सूची तैयार करने की प्रक्रिया, सत्यापन की गुणवत्ता और प्रभावित नागरिकों को समय पर सूचना देने की व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।

दिल्ली में झुग्गी बस्तियों के मतदाताओं की परेशानी

बेला एस्टेट के एक शिक्षक कमल ने भी जनसुनवाई में अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि वह 2002 से मतदान करते आ रहे हैं, लेकिन अब उनके परिवार और बस्ती के दूसरे निवासियों को मतदाता सूची से बाहर होने की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

उनके अनुसार, बस्ती के निवासियों ने 500 से अधिक गणना प्रपत्र जमा किए थे। इसके बावजूद लोगों के नाम सूची में नहीं दिखाई दिए। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि लंबे समय से वहां रहने वाले लोगों को अतिक्रमणकारी बताकर उनके मताधिकार पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आवास संबंधी विवाद और मतदाता पहचान दो अलग-अलग विषय हैं। किसी बस्ती के कानूनी दर्जे या वहां रहने वाले परिवारों के आवास को लेकर विवाद होने से मतदाता पात्रता का स्वतः निर्धारण नहीं किया जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति की पात्रता का नियमानुसार अलग सत्यापन जरूरी है।

‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ पर भी सवाल

जनसुनवाई में मतदाताओं को नोटिस जारी करने के लिए इस्तेमाल की गई कथित ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी तार्किक विसंगतियों पर भी चिंता जताई गई। इनमें माता-पिता और बच्चों की उम्र के बीच कम अंतर या परिवार में भाई-बहनों की संख्या जैसी जानकारियां शामिल थीं।

आलोचकों का कहना है कि केवल तकनीकी आंकड़ों के आधार पर किसी व्यक्ति की पात्रता पर संदेह करना उचित नहीं है। सामाजिक परिस्थितियों, कम उम्र में विवाह, पारिवारिक संरचना और स्थानीय वास्तविकताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। ऐसे मामलों में मानवीय जांच और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर देना आवश्यक है।

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पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत

स्वतंत्र आयोग ने सुझाव दिया कि मतदाता सूचियों की सार्वजनिक स्तर पर जांच होनी चाहिए। मसौदा सूची को सार्वजनिक बैठकों में पढ़कर सुनाने जैसी व्यवस्था से स्थानीय निवासी नामों की पुष्टि कर सकते हैं और गलतियों की पहचान कर सकते हैं।

लोकतंत्र में मतदान केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, जिसे कानून के अनुसार सुरक्षित रखा जाना चाहिए। मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि कोई पात्र नागरिक प्रशासनिक गलती के कारण अपने अधिकार से वंचित न हो।

दिल्ली की जनसुनवाई ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची से नाम हटने की शिकायतों को केवल आंकड़ों का मामला मानकर नहीं टाला जा सकता। हर शिकायत की निष्पक्ष जांच, उचित सूचना, प्रभावी अपील और समयबद्ध समाधान जरूरी हैं।

आखिरकार, सवाल केवल इतना नहीं है कि मतदाता सूची में कितने नाम हटे, बल्कि यह भी है कि क्या हर पात्र नागरिक को अपना नाम बचाने और लोकतंत्र में अपनी आवाज उठाने का उचित अवसर मिला?

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PandeyAbhishek
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Abhishek Pandey is a skilled news editor with 4-5 years of experience in the field, he covers mostly political, world news, sports and etc.
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