नई कार्य व्यवस्था को लेकर उठे विवाद के बीच चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण, कहा- निगरानी का स्तर पहले जैसा ही
चुनाव आयोग (EC) में अधिकारियों की जिम्मेदारियों और प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था को लेकर उठे विवाद के बीच आयोग ने स्पष्ट किया है कि उसकी निगरानी प्रणाली में कोई बदलाव नहीं किया गया है। आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) विभाग की महानिदेशक सीमा खन्ना अब भी निर्धारित प्रशासनिक अधिकारी के अधीन ही काम कर रही हैं। उनके रिपोर्टिंग ढांचे में ऐसी कोई व्यवस्था लागू नहीं हुई, जिससे निगरानी का एक महत्वपूर्ण स्तर समाप्त हो गया हो।
यह स्पष्टीकरण उस समय आया है, जब चुनाव आयोग ने आईटी प्रमुख सीमा खन्ना की कार्य व्यवस्था में नया बदलाव किया है। इसके तहत उन्हें अब वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के बजाय उप चुनाव आयुक्त प्रकाश राज पुरोहित के अधीन रखा गया है। इस बदलाव के बाद आयोग के भीतर अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर चल रही चर्चा फिर तेज हो गई है।
जुलाई के आदेश से शुरू हुआ था विवाद
इस पूरे मामले की शुरुआत 28 जुलाई को जारी एक आदेश से हुई थी। उस समय वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग ने आदेश जारी कर सीमा खन्ना को सीधे चुनाव आयोग के अधीन रिपोर्ट करने के लिए कहा था। चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी तथा एसएस संधू शामिल हैं।
यह आदेश उस समय आया था, जब सीमा खन्ना के तत्कालीन रिपोर्टिंग अधिकारी उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार का दिल्ली सरकार में तबादला हो गया था। इसके बाद उनके कार्यों की जिम्मेदारी मनीष गर्ग को सौंपी गई थी। गर्ग ने नई व्यवस्था के तहत सीमा खन्ना को सीधे आयोग को रिपोर्ट करने का निर्देश दिया।
इस कदम को प्रशासनिक निगरानी के बीच मौजूद एक स्तर को हटाने के रूप में देखा गया। इससे आयोग के भीतर अधिकारियों के अधिकारों और जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर सवाल उठने लगे।
दो चुनाव आयुक्तों ने जताई थी आपत्ति
सीमा खन्ना की रिपोर्टिंग व्यवस्था में बदलाव को लेकर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और एसएस संधू ने आपत्ति जताई थी। दोनों ने इस मामले में अलग-अलग पत्र लिखकर कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन के समक्ष जिम्मेदारियों के वितरण से जुड़ी चिंताएं रखी थीं।
इसके बाद 28 जुलाई को जारी आदेश को स्थगित कर दिया गया। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को भी बताया था कि यह आदेश कभी लागू ही नहीं हुआ था।
इस मामले में महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या 28 जुलाई से 4 नवंबर के बीच सीमा खन्ना सीधे चुनाव आयोग को रिपोर्ट कर रही थीं या उनके ऊपर कोई प्रशासनिक अधिकारी निगरानी रख रहा था।
मनीष गर्ग के पास रही निगरानी की जिम्मेदारी
चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने गुरुवार को स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि संजय कुमार के तबादले के बाद मनीष गर्ग उनकी जिम्मेदारियों के लिए लिंक अधिकारी के रूप में काम कर रहे थे। इसलिए सीमा खन्ना की निगरानी गर्ग के पास ही रही।
अधिकारी के मुताबिक, अब उप चुनाव आयुक्त प्रकाश राज पुरोहित के आयोग में शामिल होने के बाद सीमा खन्ना को उनके अधीन रिपोर्ट करना होगा।
इस स्पष्टीकरण का मुख्य उद्देश्य यह बताना था कि प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव के बावजूद निगरानी का ढांचा समाप्त नहीं हुआ था। आयोग के अनुसार, अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
चुनावी सॉफ्टवेयर को लेकर भी उठे थे सवाल
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू चुनाव आयोग के आईटी विभाग और मतदाता सूची तैयार करने वाले सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली से जुड़ा है।
सीमा खन्ना की भूमिका उस समय चर्चा में आई, जब चुनावी सॉफ्टवेयर के संचालन और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ERO) के अधिकारों को लेकर चिंताएं सामने आईं।
निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी कानून के तहत मतदाता सूचियों को तैयार करने, उनमें संशोधन करने और संबंधित प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
हालांकि, सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ अधिकारियों को सॉफ्टवेयर के माध्यम से आवश्यक कार्य करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। बताया गया कि कुछ महत्वपूर्ण कार्यों के लिए जरूरी डिजिटल अनुमतियां चुनाव आयोग के आईटी विभाग के नियंत्रण में थीं।
इस कारण यह चिंता जताई गई कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों के कानूनी अधिकार तकनीकी व्यवस्था के कारण सीमित हो सकते हैं।
प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर नजर
चुनाव आयोग देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। इसलिए उसके भीतर अधिकारियों की जिम्मेदारियों, तकनीकी विभागों के अधिकारों और प्रशासनिक निगरानी की व्यवस्था का स्पष्ट होना बेहद जरूरी है।
मतदाता सूची से संबंधित कार्यों में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सॉफ्टवेयर अधिकारियों के काम को आसान बनाए, न कि उनके वैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल में बाधा पैदा करे।
फिलहाल चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि सीमा खन्ना की निगरानी व्यवस्था में कोई ऐसा बदलाव लागू नहीं हुआ था, जिससे प्रशासनिक नियंत्रण का स्तर समाप्त हो गया हो। हालांकि, आईटी विभाग के अधिकारों और चुनावी सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवालों पर आगे भी नजर बनी रहेगी।
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निष्कर्ष:
चुनाव आयोग का ताजा स्पष्टीकरण प्रशासनिक निगरानी को लेकर उठे विवाद को स्पष्ट करने की कोशिश है। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने एक अहम सवाल खड़ा किया है कि चुनावी प्रक्रिया में तकनीकी व्यवस्था और जमीनी अधिकारियों के कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन किस तरह बनाए रखा जाए। लोकतंत्र की विश्वसनीयता के लिए यह संतुलन बेहद महत्वपूर्ण है।

