घर में अपने परिवार के साथ छुट्टी काट रहे अब्दुल हमीद को एक फोन आया, फोन था सरहद से उनकी बटालियन के अधिकारी का, इस फोन कॉल में कुछ ऐसी बाते हुई, जिसे सुनकर अब्दुल हमीद बिना एक क्षण गवांए अपना बिस्तरबंद बांधने लगे, बीवी ने पूछा कहा जा रहे हो, तो अब्दुल हमीद ने कहा कि भारत माता को मेरी जरूरत है, मै दुश्मनों से अपनी भारत माता की रक्षा करने जा रहा हूं। मगर जाते समय एक अपशकुन हो गया। बिस्तरबंद बांधते वक्त उसकी रस्सी टूट गई, जिसके बाद अब्दुल हमीद की पत्नी ने उन्हें इसे बड़ा अपशकुन बताते हुए उस वक्त उन्हें रुकने को कहा। मगर अब्दुल हमीद न माने और निकल पड़े रणभूमि में दुश्मन को अपनी भूमि से खदेड़ने के लिए।

1 जुलाई 1933 को उत्तरप्रदेश के गाजीपुर में जन्में अब्दुल हमीद एक बहुत ही साधारण से परिवार से तालुक रखते थे। इनके पिता सिलाई का काम करते थे और चाहते थे कि अब्दुल हमीद भी उनके साथ इस काम में उनका हाथ बटाए और काम संभाले। मगर अब्दुल हमीद को कुछ अलग ही करना था, उन्हें अपने देश के लिए कुछ काम करना था और ऐसा काम जिसके जरिए उन्हें देश कभी भुला न सके। अब्दुल हमीद बचपन से ही बहुत बहादुर थे, किशोर अवस्था में उन्होंने कुश्ती सीखी, लाठी चलाना सीखा और साथ ही वो एक अच्छे तैराक भी थे जिन्होंने बाढ़ में डूब रही 2 लड़कियों की जान भी बचाई।

27 दिसंबर 1954 को 20 साल की उम्र में अब्दुल हमीद सेना में भर्ती हुए थे। ट्रेनिंग के बाद उन्हें 1955 में 4 ग्रेनेडियर्स में पोस्टिंग मिली। अब्दुल हमीद ने भारत-चीन युद्ध के दौरान भी चीनियों को अच्छी खासी शिकस्त दी। इसके बाद 1965 में भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा, इस दौरान अब्दुल हमीद अपने घर छुट्टियों पर गए थे और युद्ध छिड़ने के बाद उन्हें सरहद में वापिस बुला लिया गया।

दरअसल सन 1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के आसार बने तो उनको अपनी छुट्टी बीच में ही छोड़कर वापस ड्यूटी ज्वाइन करनी पड़ी। युद्ध छिड़ने के बाद वापिस जाने के बारे में सिर्फ उनकी पत्नी और उनके एक दोस्त को ही मासूम था। उन्होंने इस बारे में अपने माता पिता को नही बताया था, मगर जब तड़के सुबह वह घर से निकल रहे थे तो सबको इस बारे में पता चल गया। उनके पिता जी ने उन्हें रुकने को कहा, मगर वो नही रुके और उन्होंने अपनी पत्नी से सिर्फ एक ही बात कही, ”तुम बच्चों का ख्याल रखना, अल्लाह ने चाहा तो जल्द मुलाकात होगी।

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अब्दुल हमीद पंजाब के तरनतारण जिले के खेमकरण सेक्टर में तैनात थे। इस दौरान पाकिस्तान ने भारत पर हमला बोला क्योंकि उसे इस बात का घमंड था कि उसके पास पैटन टैंक हैं। दरअसल ये पैटन टैंक पाकिस्तान को अमेरिका ने दिए थे। जिसके बाद पाकिस्तानी सेना ने 8 सितंबर 1965 को अमेरिकन पैटन टैंकों से उताड़ गांव में हमला बोल दिया।

इस दौरान सुबह करीब 9 बजे चीमा गांव के बाहरी इलाके में अब्दुल हमीद जीप से गन्ने के खेतों में गश्त कर रहे थे। वह ड्राइविंग सीट के बगल वाली सीट में बैठे थे। तभी उन्होंने पाकिस्तानी सेना के एक टैंक को आते देखा। इस वक्त उन्होंने तुरंत हमला नही किया, बल्की उन्होंने इंतजार किया रिकॉयलेस गन की रेंज में टैंकों के आने का। अब जैसे ही पाकिस्तानी टैंक रिकॉयलेस गन की रेंज में आए वैसे ही अब्दुल हमीद ने फायरिंग की और एक साथ उन्होंने 4 टैंक उड़ा दिए। इसके बाद 10 सितंबर 1965 को अब्दुल हमीद ने पाकिस्तान के 3 और टैंकों को उड़ा दिया और जैसे ही उन्होंने एक और टैंक को निशाना बनाया वैसे एक पाकिस्तानी सैनिक की नजर उन पर पड़ गई और एक साथ दोनों तरफ से फायर हुआ। अब अब्दुल हमीद 8वें पाकिस्तानी टैंक को नष्ट करने में तो कामयाब हुए मगर एक गोला उनकी जीप पर भी आकर गिरा जिसके बाद उनकी जीप के परखच्चे उड़ गए और 10 सिंतबर 1965 को अब्दुल हमीद भारत माता की रक्षा करते हुए शहीद हो गए।

शहादत के एक हफ्ते बाद ही अब्दुल हमीद को 16 सितंबर 1965 को भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र देने की घोषणा की गई और 26 जनवरी 1966 को गणतंत्र दिवस के मौके पर तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने वीर अब्दुल हमीद की पत्नी रसूलन बीबी को परमवीर चक्र प्रदान किया। इसके बाद साल 2000 में भारतीय डाक विभाग द्वारा 3 रुपये का एक डाक टिकट भी जारी किया गया, जिसपर वीर अब्दुल हमीद की तस्वीर बनी है और वह जीप पर सवार रिकॉयलेस राइफल से गोली चलाते नजर आ रहे हैं।