उत्तराखंड सरकार पहाड़ी क्षेत्रों के स्थानीय उत्पादों को देश और दुनिया के बाजारों तक पहुंचाने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही है। इस दिशा में ‘HOUSE OF HIMALAYAS‘ ब्रांड एक अहम भूमिका निभा रहा है।
उत्तराखंड ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट 2023 के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक कारोबारियों के साथ संवाद किया था जिसके बाद से इन उत्पादों की विदेशों में बिक्री तेज हुई है। हाउस ऑफ हिमालयाज के उत्पाद अब हिंदी, हिंग्लिश और चार-पांच अन्य भाषाओं में वेबसाइट और पैकेजिंग पर उपलब्ध हो गए हैं।
HOUSE OF HIMALAYAS इसलिए है खास
HOUSE OF HIMALAYAS ब्रांड के तहत उत्तराखंड के उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों को देश और दुनिया के बाजारों के अनुरूप तैयार किया गया है। इसमें प्रामाणिकता का अनुभव, सामाजिक पहल के माध्यम से जनजातीय समुदायों की मदद, बेहतर ऑनलाइन उपस्थिति और उत्पाद की गुणवत्ता पर पूरा ध्यान दिया जाता है।
HOUSE OF HIMALAYAS में बेड़ु, रिंगाल, काफल, भांग और ऐपण आदि पर विशेष ध्यान केंद्रित कर इन्हें प्रमुख ब्रांड बनाया जा रहा है। पर्यटक अपनी यात्रा व्यय का 5 प्रतिशत स्थानीय उत्पादों पर खर्च करें, इसके लिए भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

एक जिला-दो उत्पाद योजना से दुनिया में धमाल
ODTP यानी One District Two Products योजना के तहत राज्य के प्रत्येक जिले के दो प्रमुख उत्पादों को चिन्हित कर उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रमोट किया जा रहा है।
HOUSE OF HIMALAYAS योजना में अल्मोड़ा से बाल मिठाई और टींग, बागेश्वर से ताम्र शिल्प उत्पाद और कीवी के उत्पाद, चमोली से गुलाब जल और हस्तकला के उत्पाद, चंपावत से शहद और लोहे के उत्पाद, देहरादून से देसी घी और मंदिर अनुकृति हस्तशिल्प शामिल है।
इसके अलावा रुद्रप्रयाग से चौलाई के उत्पाद और फल परिसंस्करण, नैनीताल से ऐपण हस्तशिल्प और हर्बल मेडिसिन, पौड़ी से पैचा ओगल और लकड़ी शिल्प, उधम सिंह नगर से मृत्यु साज उत्पाद और लाल चावल, उत्तरकाशी से सेब के उत्पाद और अनी कालीन, पिथौरागढ़ से मुनस्यारी राजमा और पनीर, टिहरी से टिहरी नमक शामिल हैं।
देवभूमि के पारंपरिक उत्पादों को मिला GI टैग
HOUSE OF HIMALAYAS के अलावा उत्तराखंड के कई पारंपरिक उत्पादों को जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी GI टैग प्रदान किया गया है। उत्तराखंड के जिन प्रमुख उत्पादों को GI टैग मिला है उनमें उत्तराखंड की भोटिया दन, उत्तराखंड झुलसा, उत्तराखंड लिंबाई यानी लकड़ी की नक्काशी, नैनीताल मोमबत्तियां, कुमाऊं की रंगवाली पिछौड़ा, उत्तराखंड ऐपण, चमोली लकड़ी का रावण मुखौटा, उत्तराखंड तमता उत्पाद, उत्तराखंड विष्णु बूटी और उत्तराखंड रिंगाल शिल्प शामिल हैं।

जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी GI टैग क्या होता है?
Geographical Indication या GI टैग एक प्रकार का कानूनी संरक्षण या संकेत है, जो उन उत्पादों को दिया जाता है जिनकी एक विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति होती है और जिनमें उस स्थान की वजह से कुछ विशेष गुण या प्रतिष्ठा होती है। सरल शब्दों में कहें तो, यह एक भरोसे का प्रतीक है जो बताता है कि कोई खास चीज़ अपनी शुद्धता और खूबी के लिए उसी विशेष इलाके से जुड़ी है।
GI टैग की मुख्य विशेषताएं
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स्थान आधारित पहचान: यह टैग किसी उत्पाद को उसके पैदा होने या बनने वाले स्थान (जैसे शहर, राज्य या क्षेत्र) से जोड़ता है।
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गुणवत्ता का आश्वासन: यह सुनिश्चित करता है कि उत्पाद में वे विशिष्ट गुण मौजूद हैं जो उस मिट्टी, जलवायु या वहां की पारंपरिक कारीगरी की वजह से हैं।
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कानूनी सुरक्षा: भारत में ‘भौगोलिक उपदर्शन (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999’ के तहत इसे लागू किया गया है। कोई भी बाहरी व्यक्ति या कंपनी उस नाम का गलत इस्तेमाल नहीं कर सकती।
यह किन उत्पादों को मिलता है?
GI टैग मुख्य रूप से तीन श्रेणियों के उत्पादों को दिया जाता है:
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कृषि उत्पाद: जैसे दार्जिलिंग चाय, अल्फांसो आम या बासमती चावल।
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हस्तशिल्प (Handicraft): जैसे बनारसी साड़ी, कश्मीरी पश्मीना या जयपुर की ब्लू पॉटरी।
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खाद्य सामग्री और औद्योगिक उत्पाद: जैसे बीकानेरी भुजिया, कंदमाल हल्दी या कोल्हापुरी चप्पल।
GI टैग के फायदे
आइए, जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग के फ़ायदों को विस्तार से जानें।
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किसानों और कारीगरों को लाभ: यह स्थानीय उत्पादकों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाता है, जिससे उनकी आय बढ़ती है।
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नकली उत्पादों पर रोक: कोई अन्य व्यक्ति दार्जिलिंग के बाहर उगाई गई चाय को ‘दार्जिलिंग चाय’ कहकर नहीं बेच सकता।
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पर्यटन को बढ़ावा: जीआई टैग मिलने से उस क्षेत्र की प्रसिद्धी बढ़ती है, जिससे पर्यटन को भी गति मिलती है।
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