भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा है कि सिंधु जल संधि आज भी “वैध, बाध्यकारी और पूरी तरह प्रभावी” है तथा कोई भी पक्ष इसे एकतरफा निलंबित या समाप्त नहीं कर सकता। उन्होंने भारत द्वारा संधि को स्थगित करने के फैसले को अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि की भावना के विपरीत बताया।
इशाक डार का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सीमा पार आतंकवाद और द्विपक्षीय संबंधों में तनाव के चलते सिंधु जल संधि को लेकर उसका रुख पहले जैसा नहीं रहेगा। इस मुद्दे ने दोनों देशों के बीच जल कूटनीति को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
सिंधु जल संधि पर क्या कहा पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री ने?
इस्लामाबाद में आयोजित ‘इंडस वाटर्स ट्रीटी: एन इंस्ट्रूमेंट ऑफ पीस एंड रीजनल स्टेबिलिटी’ विषयक एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए इशाक डार ने कहा कि सिंधु जल संधि केवल पानी के बंटवारे का समझौता नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और सहयोग का महत्वपूर्ण आधार है।
उन्होंने कहा कि संधि में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी एक पक्ष को इसे एकतरफा निलंबित या समाप्त करने का अधिकार देता हो। पाकिस्तान का मानना है कि यह समझौता आज भी पूरी तरह लागू है और दोनों देशों पर समान रूप से बाध्यकारी है।
सिंधु जल संधि क्या है?
सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते में विश्व बैंक ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।
संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों का बंटवारा किया गया। रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का उपयोग भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का अधिकांश जल उपयोग पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। साथ ही भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित सिंचाई, जलविद्युत और अन्य गैर-उपभोग संबंधी उपयोग की अनुमति दी गई। यह संधि दशकों तक दोनों देशों के बीच जल प्रबंधन का आधार बनी रही।
भारत ने क्यों बदला अपना रुख?
हाल के वर्षों में भारत ने बार-बार कहा है कि सीमा पार आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय संबंधों के अभाव में संधि की समीक्षा आवश्यक हो गई है। भारत ने यह भी कहा है कि आतंकवाद और सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते।
भारत के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है और बदलते हालात में जल संसाधनों के उपयोग से जुड़ी नीतियों पर पुनर्विचार करना उसका अधिकार है। दूसरी ओर पाकिस्तान इस रुख का विरोध करता रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संधि को यथावत लागू रखने की मांग करता है।
पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय कानून का दिया हवाला
इशाक डार ने अपने संबोधन में कहा कि अंतरराष्ट्रीय संधियों का सम्मान सभी देशों की जिम्मेदारी है। उनके अनुसार सिंधु जल संधि छह दशक से अधिक समय तक युद्धों और राजनीतिक तनाव के बावजूद लागू रही और इसे दुनिया की सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय जल-साझाकरण व्यवस्थाओं में गिना जाता है।
उन्होंने कहा कि साझा नदियां संघर्ष का नहीं बल्कि सहयोग का माध्यम बननी चाहिए और दोनों देशों को मतभेदों का समाधान संधि में उपलब्ध संस्थागत तंत्र के माध्यम से करना चाहिए।
जल सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता
विशेषज्ञों का मानना है कि सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान की कृषि और पेयजल व्यवस्था की जीवनरेखा है। पाकिस्तान की बड़ी आबादी और कृषि क्षेत्र इन नदियों पर निर्भर हैं। ऐसे में संधि को लेकर किसी भी प्रकार का विवाद वहां खाद्य सुरक्षा और जल सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को बढ़ा सकता है।
दूसरी ओर भारत का कहना है कि उसे संधि के तहत मिले अधिकारों का पूरा उपयोग करने और अपने जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने का अधिकार है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिंधु जल संधि पर बढ़ी चर्चा
सिंधु जल संधि को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग रुख ने अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विशेषज्ञों का भी ध्यान आकर्षित किया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि जल संसाधनों से जुड़े विवादों का समाधान संवाद और कानूनी ढांचे के भीतर ही संभव है।
हालांकि भारत और पाकिस्तान दोनों अपने-अपने कानूनी और कूटनीतिक तर्कों पर कायम हैं, जिससे निकट भविष्य में इस मुद्दे पर मतभेद बने रहने की संभावना है।
भारत-पाकिस्तान संबंधों पर असर
सिंधु जल संधि को लेकर बढ़ता विवाद दोनों देशों के पहले से तनावपूर्ण संबंधों को और प्रभावित कर सकता है। सुरक्षा, सीमा पार आतंकवाद, व्यापार और कूटनीतिक संबंध पहले से ही चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल सहयोग भी विवाद का विषय बनता है तो इसका असर क्षेत्रीय स्थिरता और भविष्य के द्विपक्षीय संवाद पर पड़ सकता है।
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अब आगे क्या?
फिलहाल भारत और पाकिस्तान अपने-अपने रुख पर कायम हैं। पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने संधि की वैधता का मुद्दा उठा रहा है, जबकि भारत अपनी सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने की बात कह रहा है।
आने वाले समय में यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंचों, कूटनीतिक वार्ताओं और दोनों देशों के बीच संभावित बातचीत का अहम विषय बना रह सकता है।
निष्कर्ष
पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री इशाक डार का यह बयान कि सिंधु जल संधि “वैध, बाध्यकारी और प्रभावी” बनी हुई है, दोनों देशों के बीच जल विवाद को लेकर जारी मतभेदों को फिर उजागर करता है। पाकिस्तान संधि को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत पूरी तरह लागू मानता है, जबकि भारत बदलती सुरक्षा परिस्थितियों और सीमा पार आतंकवाद के संदर्भ में अपने रुख को उचित ठहराता है।
दक्षिण एशिया की शांति, जल सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग के दृष्टिकोण से यह मुद्दा आने वाले समय में भी अत्यंत महत्वपूर्ण बना रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान केवल संवाद, पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के सम्मान के माध्यम से ही संभव है।

