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पत्नी खाना न बनाए तो क्या पति तलाक ले सकता है? बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

भारत में शादी, घरेलू जिम्मेदारियां और पति-पत्नी के अधिकारों को लेकर एक अहम फैसला सामने आया है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि केवल इस आधार पर कि पत्नी खाना नहीं बनाती या घरेलू काम नहीं करती, पति तलाक नहीं ले सकता। अदालत ने यह भी कहा कि “पत्नी कोई नौकरानी या ‘deemed maid’ नहीं है।”

यह फैसला आज के समय में महिलाओं के अधिकार, वैवाहिक समानता और घरेलू जिम्मेदारियों के बंटवारे पर एक बड़ा संदेश देता है।

बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला: पत्नी का खाना न बनाना तलाक का आधार नहींबॉम्बे हाई कोर्ट

हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक पति की तलाक याचिका खारिज करते हुए कहा कि शादी कोई “सर्विस कॉन्ट्रैक्ट” नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी खाना नहीं बनाती, सफाई नहीं करती या घरेलू कामों में पूरी तरह शामिल नहीं होती, तो इसे मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि विवाह समानता और सम्मान का रिश्ता है, जहां दोनों पक्षों की जिम्मेदारियां साझा होती हैं। सिर्फ घरेलू कामों के आधार पर पत्नी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

पति ने लगाए थे घरेलू काम न करने के आरोप

इस मामले में पति ने अदालत में दावा किया कि शादी के कुछ समय बाद ही wife ने घरेलू काम करना बंद कर दिया। उसने आरोप लगाया कि पत्नी:

  • खाना नहीं बनाती थी
  • घर की सफाई नहीं करती थी
  • सास-ससुर की बात नहीं मानती थी
  • पति के साथ रूखा व्यवहार करती थी

पति ने इन आरोपों को मानसिक क्रूरता बताते हुए तलाक की मांग की थी।

लेकिन पत्नी ने अदालत में इन आरोपों को गलत बताया और कहा कि उससे घर के सारे काम करवाए जाते थे, यहां तक कि उसे बचे हुए खाने तक दिए जाते थे।

हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की तलाक याचिका?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सिर्फ यह कहना कि पत्नी खाना नहीं बनाती, तलाक का कानूनी आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा:

“शादी समान भागीदारी का रिश्ता है, न कि घरेलू सेवाओं का अनुबंध।”

कोर्ट ने यह भी माना कि भारतीय समाज में अक्सर महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे बिना किसी सवाल के घर के सारे काम करें, लेकिन कानून ऐसी सोच को समर्थन नहीं देता।

पत्नी को मिला मेंटेनेंस और रहने का खर्च

इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने सिर्फ तलाक याचिका खारिज नहीं की, बल्कि पत्नी को आर्थिक सहायता देने का आदेश भी दिया। अदालत ने पति को हर महीने:

  • ₹10,000 मेंटेनेंस
  • ₹10,000 रहने के खर्च के लिए

देने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने माना कि पति एक योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट है और पत्नी को सम्मानजनक जीवन देने की जिम्मेदारी उसकी है।

महिलाओं के अधिकारों पर मजबूत संदेश

यह फैसला महिलाओं के अधिकारों और वैवाहिक समानता को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। अदालत ने साफ किया कि:

  • पत्नी केवल घरेलू काम करने के लिए शादी नहीं करती
  • घर की जिम्मेदारी पति-पत्नी दोनों की होती है
  • खाना बनाना पत्नी की कानूनी बाध्यता नहीं है

यह निर्णय आधुनिक भारतीय समाज में बदलती सोच को भी दर्शाता है।

क्या भारतीय कानून में घरेलू काम न करना “क्रूरता” है?

भारतीय विवाह कानून के अनुसार तलाक के लिए “क्रूरता” एक आधार हो सकता है। लेकिन अदालतों ने कई मामलों में कहा है कि सामान्य वैवाहिक विवाद या घरेलू असहमति को क्रूरता नहीं माना जा सकता।

इस मामले में भी बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि घरेलू काम न करना अपने आप में मानसिक क्रूरता साबित नहीं करता।

हालांकि यदि किसी रिश्ते में लगातार अपमान, हिंसा, धमकी या गंभीर मानसिक उत्पीड़न हो, तब अदालत अलग निर्णय ले सकती है।

सोशल मीडिया पर फैसले की चर्चा

इस फैसले के बाद सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि शादी में घरेलू जिम्मेदारियां साझा होनी चाहिए। वहीं कुछ लोगों ने इसे पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों के खिलाफ बताया।

रेडिट और अन्य सोशल प्लेटफॉर्म्स पर बड़ी संख्या में यूजर्स ने कहा कि अगर पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं, तो घरेलू काम भी बराबर बांटे जाने चाहिए।

बदलते भारत में विवाह और समानता की नई परिभाषा

भारत में अब शादी को केवल पारंपरिक भूमिकाओं के नजरिए से नहीं देखा जा रहा। अदालतें लगातार यह स्पष्ट कर रही हैं कि:

  • पति और पत्नी दोनों बराबर हैं
  • घरेलू जिम्मेदारियां साझा होनी चाहिए
  • महिलाओं को केवल “घर संभालने” तक सीमित नहीं किया जा सकता

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में कई वैवाहिक मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

आगे और समाचार पढ़े:

निष्कर्ष: पत्नी खाना न बनाए तो तलाक नहीं मिलेगा

इस ऐतिहासिक फैसले से यह साफ हो गया है कि पत्नी का खाना न बनाना या घरेलू कामों में कमी होना तलाक का स्वतः आधार नहीं है। अदालत ने यह संदेश दिया कि विवाह सम्मान, समानता और साझेदारी का रिश्ता है, न कि घरेलू सेवा का अनुबंध।

आज के बदलते समाज में यह फैसला महिलाओं के अधिकारों, वैवाहिक समानता और आधुनिक पारिवारिक सोच को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

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PandeyAbhishek
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Abhishek Pandey is a skilled news editor with 4-5 years of experience in the field, he covers mostly political, world news, sports and etc.
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