/ Feb 07, 2026

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देहरादून में हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन प्रबंधन, आधुनिक तकनीकों और पूर्वानुमान प्रणाली पर विशेषज्ञों ने किया मंथन

UTTARAKHAND DISASTER MANAGEMENT: उत्तराखण्ड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र (ULMMC) द्वारा हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ‘आपदा-सक्षम विकास’ विषय पर आयोजित पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुक्रवार, 6 फरवरी 2026 को सफलतापूर्वक समापन हो गया। सुद्धोवाला स्थित पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण एवं वित्तीय प्रशासन अनुसंधान संस्थान में आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत 2 फरवरी को हुई थी। इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य हिमालयी राज्यों में भूस्खलन जैसी आपदाओं से निपटने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक तकनीकों को साझा करना था।

UTTARAKHAND DISASTER MANAGEMENT
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UTTARAKHAND DISASTER MANAGEMENT:  विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का सहयोग

इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन ULMMC द्वारा विश्व बैंक और नार्वेयन जियो टेक्निकल इंस्टीट्यूट (NGI) के सहयोग से किया गया। प्रशिक्षण के दौरान देश और विदेश के प्रख्यात वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने उत्तराखण्ड और संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से मंथन किया। सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम हिमालयी क्षेत्र में जोखिम-संवेदनशील विकास की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार करेगा। समापन अवसर पर विश्व बैंक पोषित ‘यू-प्रिपेयर’ परियोजना के निदेशक आनंद स्वरूप ने सभी प्रतिभागियों को सम्मानित किया।

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पूर्वानुमान प्रणाली और आधुनिक प्रयोगशाला पर जोर

प्रशिक्षण सत्रों के दौरान विशेषज्ञों ने इस बात पर विशेष बल दिया कि उत्तराखण्ड जैसे संवेदनशील राज्यों के लिए ‘भूस्खलन पूर्वानुमान प्रणाली’ और ‘प्रारंभिक चेतावनी तंत्र’ विकसित करना समय की मांग है। आपदा जोखिम को कम करने के लिए एक आधुनिक भू-तकनीकी जांच प्रयोगशाला की स्थापना को भी अनिवार्य बताया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, इन वैज्ञानिक ढांचों की मदद से जोखिमों की पहले ही पहचान की जा सकेगी, जिससे साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने और समय रहते जान-माल की रक्षा करने में मदद मिलेगी।

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विशेषज्ञों ने तकनीकी सत्रों में बताया कि भूस्खलन के सटीक पूर्वानुमान के लिए वर्षा-आधारित थ्रेशहोल्ड मॉडल, ढाल स्थिरता विश्लेषण और संख्यात्मक मॉडलिंग का प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए। रियल-टाइम डेटा के एकीकरण से भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्रों को अधिक सटीक बनाया जा सकता है, जिससे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में एहतियाती कदम उठाना आसान होगा। प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतिम दिन को ‘ULMMC दिवस’ के रूप में मनाया गया। इस दौरान संस्थान ने अपनी संगठनात्मक संरचना, अब तक की प्रमुख उपलब्धियों और भविष्य के दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया।

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