RANA SANGA: आगरा में समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन के विवादित बयान को लेकर हिंसा भड़क उठी। करणी सेना के हजारों कार्यकर्ता बुधवार को उनके घर के बाहर इकट्ठा हुए और बुलडोजर लेकर तोड़फोड़ शुरू कर दी। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। सपा सांसद रामजी लाल सुमन ने हाल ही में राज्यसभा में एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर मुसलमानों को बाबर का वंशज कहा जाता है, तो हिंदू “गद्दार” राणा सांगा की औलाद माने जाने चाहिए। उनके इस बयान से क्षत्रिय समाज और करणी सेना में भारी आक्रोश फैल गया।

करणी सेना का हंगामा, सांसद के घर पर हमला
गुस्साए करणी सेना के कार्यकर्ता बुलडोजर लेकर सांसद के आगरा स्थित घर पहुंचे और वहां जमकर तोड़फोड़ की। प्रदर्शनकारियों ने घर के बाहर रखी 50 से ज्यादा कुर्सियां तोड़ दीं, गेट को क्षतिग्रस्त किया और सांसद की गाड़ियों को भी नुकसान पहुंचाया। स्थिति को बिगड़ते देख पुलिस ने मौके पर पहुंचकर प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश की, लेकिन वे उग्र हो गए और पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया। इस झड़प में कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। इसके बाद पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।

करणी सेना ने दी चेतावनी
करणी सेना के युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष ओकेंद्र राणा ने एक वीडियो जारी कर सांसद के बयान की निंदा की। उन्होंने कहा कि सांसद के आवास की हर ईंट पर “राणा सांगा” लिखा जाएगा और अगर सुमन को माफी मांगनी है, तो उन्हें महाराणा सांगा के स्मारक पर जाकर सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी होगी। बवाल को देखते हुए पुलिस ने सांसद के घर की सुरक्षा बढ़ा दी है। उनकी सोसाइटी के दोनों गेट बंद कर दिए गए हैं और किसी को भी बाहर निकलने की इजाजत नहीं दी जा रही है। पुलिस की ओर से साफ निर्देश दिए गए हैं कि कोई भी व्यक्ति हिंसा भड़काने की कोशिश करेगा, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।

कौन थे RANA SANGA?
राणा सांगा (महाराणा संग्राम सिंह) मेवाड़ के वीर शासक और सिसोदिया वंश के राजा थे। उन्होंने 1509 से 1528 तक शासन किया और विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ कई युद्ध लड़े। उनकी सबसे प्रसिद्ध लड़ाई 1527 में बाबर के खिलाफ खानवा के युद्ध में हुई, जिसमें उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। उन्होंने मालवा और गुजरात के सुल्तानों के खिलाफ भी कई सफल युद्ध लड़े। राणा सांगा अपने साहस, युद्धकौशल और आत्मसम्मान के लिए जाने जाते हैं। उनके शरीर पर 80 से अधिक घाव थे, फिर भी वे आखिरी सांस तक लड़ते रहे। 1528 में उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन आज भी वे राजपूत वीरता और बलिदान के प्रतीक माने जाते हैं।


