देश में स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के लिए दो से अधिक बच्चे होने पर उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित करने वाले कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। बुधवार, 4 नवंबर 2026 को शीर्ष अदालत ने कहा कि बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों और घटती प्रजनन दर को देखते हुए ऐसे कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं।
अदालत का मानना है कि जिस समय जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ये कानून बनाए गए थे, उस समय परिस्थितियां अलग थीं। लेकिन आज भारत की प्रजनन दर में काफी गिरावट आ चुकी है। ऐसे में दो से अधिक बच्चे होने पर लोगों को चुनाव लड़ने से रोकना कितना उचित है, इस पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।
हालांकि, अदालत ने इन सभी कानूनों को तत्काल समाप्त नहीं किया है, बल्कि 2003 के एक महत्वपूर्ण फैसले को बड़ी पीठ के पास भेजा है।
किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने की यह टिप्पणी?
महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव से जुड़ा मामला
यह मामला महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका से जुड़ा है। उन्हें तीसरा बच्चा होने के आधार पर पंचायत के चुनाव लड़ने और पद पर बने रहने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था।
महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत दो से अधिक बच्चे होने पर व्यक्ति को पंचायत सदस्य या सरपंच के पद के लिए अयोग्य ठहराने का प्रावधान है।
मंगला भीमराव ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी उनकी अयोग्यता को बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने इस मामले में उनकी अयोग्यता को रद्द कर दिया और संबंधित कार्यवाही पर रोक लगाते हुए कानून की संवैधानिक वैधता के व्यापक सवाल को बड़ी पीठ के पास भेज दिया।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने क्या कहा?
जनसंख्या नियंत्रण के पुराने तर्क पर उठाए सवाल
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंड देने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब समाप्त हो चुकी है।
अदालत ने कहा कि इन कानूनों की बुनियाद अत्यधिक जनसंख्या बढ़ने का डर था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति में बड़ा बदलाव आया है।
पीठ के अनुसार, यदि इन बदलावों को नजरअंदाज किया गया तो भविष्य में देश को गंभीर जनसांख्यिकीय चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
भारत की घटती प्रजनन दर बनी अहम वजह
3 से घटकर 1.9 पर पहुंची TFR
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भारत की कुल प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) का भी उल्लेख किया।
अदालत के अनुसार, वर्ष 2003 में भारत की कुल प्रजनन दर लगभग 3 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2.1 की प्रजनन दर को प्रतिस्थापन दर (Replacement Rate) माना जाता है। इसका अर्थ है कि लंबी अवधि में एक पीढ़ी अपनी संख्या को अगली पीढ़ी के माध्यम से बनाए रख सकती है।
भारत की प्रजनन दर इस स्तर से नीचे पहुंचने के कारण भविष्य में बुजुर्ग आबादी बढ़ने और कामकाजी उम्र के लोगों की हिस्सेदारी घटने की आशंका है।
2003 के जावेद बनाम हरियाणा फैसले पर फिर विचार
बड़ी पीठ करेगी कानून की समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में दिए गए फैसले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है।
उस समय तीन जजों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के दो बच्चों वाले नियम को संवैधानिक रूप से वैध माना था।
इस कानून के अनुसार, दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर व्यक्ति पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो सकता था।
अब मौजूदा पीठ ने बदलती परिस्थितियों को देखते हुए उस फैसले के आधार और संवैधानिक पहलुओं पर दोबारा विचार करने की जरूरत बताई है।
प्रजनन की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर चिंता
क्या बच्चे पैदा करने का फैसला चुनावी अधिकार छीन सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि किसी व्यक्ति को केवल अधिक बच्चे होने के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित करना कितना उचित है।
अदालत के अनुसार, ऐसे कानून नागरिकों के एक पूरे वर्ग को चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर सकते हैं, जबकि बच्चों की संख्या का किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता से सीधा संबंध नहीं है।
पीठ ने यह भी कहा कि ऐसे प्रतिबंध लोगों को परिवार बढ़ाने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने के बीच अनुचित विकल्प चुनने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाली प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) के अधिकार से भी जुड़ी हुई है।
किन राज्यों में लागू हैं दो बच्चों के नियम?
देश में दो बच्चों की शर्त को लेकर सभी राज्यों में एक समान नीति नहीं है। कुछ राज्यों ने ऐसे प्रावधानों को समाप्त कर दिया है, जबकि कुछ राज्यों में स्थानीय निकाय चुनावों के लिए अब भी अलग-अलग प्रतिबंध मौजूद हैं।
इस मुद्दे पर अदालत के सामने रखी गई जानकारी के अनुसार, असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड सहित कुछ राज्यों में ऐसे प्रावधान मौजूद हैं।
बड़ी पीठ की समीक्षा का असर भविष्य में इन कानूनों की संवैधानिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।
आम जनता और राजनीति पर क्या होगा असर?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से उन लोगों को उम्मीद मिली है जो दो से अधिक बच्चे होने के कारण स्थानीय चुनाव लड़ने की पात्रता खो देते हैं।
यदि भविष्य में बड़ी पीठ इन कानूनों को असंवैधानिक घोषित करती है या उनके दायरे में बदलाव करती है, तो स्थानीय निकाय चुनावों में अधिक लोगों को राजनीतिक भागीदारी का अवसर मिल सकता है।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी राज्यों में दो बच्चों की शर्त तत्काल खत्म हो गई है।
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निष्कर्ष:
बदलते भारत के साथ बदलने चाहिए पुराने कानून
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारत की बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
एक समय जनसंख्या नियंत्रण के लिए बनाए गए नियम आज नई परिस्थितियों में कितने उपयोगी हैं, इस पर गंभीर बहस जरूरी है।
अब सबकी नजर बड़ी पीठ पर है, जो दो बच्चों के नियम की संवैधानिक वैधता पर आगे विचार करेगी। उसका फैसला देश में स्थानीय निकाय चुनावों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

