राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को नागपुर में आयोजित विजयादशमी समारोह में ‘स्वबोध’, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और भारत की सांस्कृतिक विविधता पर जोर दिया। संघ के शताब्दी वर्ष के समापन से जुड़े इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी शामिल हुए। अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता को स्वीकार करने और सभी समुदायों के बीच भावनात्मक एकता बनाए रखने में है।
1. भारत विविधताओं वाला देश है
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में भारत की विविधता को देश की पारंपरिक पहचान बताया। उन्होंने कहा कि भारत में धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, खानपान और रीति-रिवाजों की अनेक विविधताएं हैं। इन विभिन्नताओं को स्वीकार करना और उनकी रक्षा करना भारतीय परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विविधताओं के बावजूद देश को एकजुट रखने के लिए ऐसा आधार जरूरी है, जो सभी नागरिकों के बीच अपनत्व और आपसी विश्वास को मजबूत करे। उनके अनुसार, राष्ट्रीय एकता का अर्थ सभी लोगों को एक जैसा बनाना नहीं, बल्कि अलग-अलग पहचानों का सम्मान करते हुए एक समाज के रूप में आगे बढ़ना है।
2. ‘स्वबोध’ से मजबूत होगी राष्ट्रीय पहचान
भागवत के भाषण में ‘स्वबोध’ एक प्रमुख विषय रहा। स्वबोध का सामान्य अर्थ है अपनी पहचान, इतिहास, परंपराओं और मूल्यों के प्रति जागरूक होना।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 100 वर्षों से समाज में इसी चेतना को जागृत करने का प्रयास कर रहा है। उनके अनुसार, भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को समझकर देश को अधिक संगठित, मजबूत और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
भागवत ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखे ‘हम भारत के लोग’ के भाव का उल्लेख करते हुए कहा कि यही सामूहिक पहचान देश के नागरिकों को भावनात्मक रूप से जोड़ती है।
3. संत रविदास के विचारों का उल्लेख
अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने संत शिरोमणि रविदास के जीवन और शिक्षाओं को भी याद किया। उन्होंने संत रविदास के संदेश में स्वधर्म के प्रति निष्ठा, भक्ति और सामाजिक समरसता के महत्व को रेखांकित किया।
भागवत के अनुसार, संत रविदास ने कठिन परिस्थितियों में भी समाज का मनोबल बढ़ाने और सामाजिक मूल्यों को बनाए रखने का काम किया। उनके विचारों से प्रेरणा लेते हुए समाज में आपसी सम्मान और सद्भाव को बढ़ावा देने की जरूरत है।
यह उल्लेख ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब सामाजिक एकता और विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास को मजबूत करना सार्वजनिक विमर्श का अहम विषय बना हुआ है।
4. राष्ट्रीय एकता और विभाजन की चुनौती
भागवत ने अपने भाषण में अतीत के उन अनुभवों का जिक्र किया, जब सामाजिक विभाजन और आपसी अविश्वास के कारण भारत को नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने कहा कि देश की एकता को बनाए रखने के लिए लोगों को अलग-अलग पहचान के आधार पर एक-दूसरे से दूर नहीं होना चाहिए।
उन्होंने समाज को संगठित और मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके मुताबिक, राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देना और नागरिकों के बीच आपसी संबंधों को मजबूत करना देश की प्रगति के लिए जरूरी है।
इस विचार के केंद्र में यह संदेश रहा कि मतभेदों के बावजूद संवाद, सहयोग और साझा राष्ट्रीय भावना को बनाए रखना चाहिए।
5. विचार, चरित्र और सामाजिक जिम्मेदारी
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने विचारों और चरित्र के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “विचार बोइए, तो कर्म की फसल काटेंगे; चरित्र बोएंगे तो प्रारब्ध का निर्माण होगा।”
इस कथन के जरिए उन्होंने व्यक्तिगत आचरण और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संबंध पर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, समाज का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि नागरिक किस प्रकार के विचार अपनाते हैं और अपने व्यवहार में किन मूल्यों को महत्व देते हैं।
युवाओं में जिम्मेदारी, अनुशासन और देश के प्रति सकारात्मक योगदान की भावना विकसित करना भी इसी व्यापक विचार का हिस्सा है।
6. जगदीप धनखड़ की मौजूदगी रही चर्चा में
विजयादशमी समारोह में पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की मौजूदगी भी चर्चा का विषय रही। कार्यक्रम में उनकी भागीदारी ने आयोजन को अतिरिक्त सार्वजनिक महत्व दिया। यह समारोह संघ के शताब्दी वर्ष के समापन के अवसर पर आयोजित किया गया था।
आरएसएस का विजयादशमी संबोधन हर वर्ष संगठन की प्राथमिकताओं, सामाजिक दृष्टिकोण और देश से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर उसके विचारों को सामने रखने का एक महत्वपूर्ण अवसर होता है।
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निष्कर्ष
मोहन भागवत के विजयादशमी संबोधन का मुख्य संदेश ‘स्वबोध’ और राष्ट्रीय एकता के इर्द-गिर्द रहा। उन्होंने भारत की विविधता को स्वीकार करने, सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूक रहने और समाज में भावनात्मक जुड़ाव मजबूत करने पर जोर दिया।
साथ ही, संत रविदास के विचारों और व्यक्तिगत चरित्र के महत्व का उल्लेख करते हुए सामाजिक समरसता की आवश्यकता रेखांकित की। इस संबोधन से यह स्पष्ट हुआ कि संघ अपने शताब्दी वर्ष के समापन पर राष्ट्रीय पहचान, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक मूल्यों को अपने विमर्श के प्रमुख विषयों के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।

