भारत में इस बार मौसम का मिजाज सामान्य से अलग रह सकता है। प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहा सुपर अल नीनो दुनियाभर के मौसम को प्रभावित करने की आशंका बढ़ा रहा है। वैज्ञानिक पूर्वानुमानों के मुताबिक, 2026 के अंत तक यह घटना बेहद शक्तिशाली स्तर पर पहुंच सकती है। इसका असर भारत में बारिश, तापमान, खेती और आने वाले मौसम पर पड़ सकता है। ऐसे में सवाल है कि क्या इस बार सर्दियां कम ठंडी रहेंगी और क्या देश को गर्मी के साथ पानी की कमी की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है?
क्या है सुपर अल नीनो और क्यों बढ़ रही चिंता?
अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म होने की जलवायु संबंधी घटना है। इसके कारण समुद्र और वातावरण के बीच ऊर्जा का आदान-प्रदान बदलता है, जिससे दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश और तापमान के पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के 8 अक्टूबर 2026 के पूर्वानुमान के अनुसार, अक्टूबर से दिसंबर के दौरान प्रशांत महासागर के निगरानी क्षेत्र में समुद्री सतह का तापमान औसत से लगभग 3.7 डिग्री सेल्सियस अधिक हो सकता है। यह एक बेहद मजबूत अल नीनो की संभावना की ओर संकेत करता है।
हालांकि, भारत के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ‘सुपर अल नीनो’ विश्व मौसम विज्ञान संगठन या भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की कोई आधिकारिक रूप से परिभाषित श्रेणी नहीं है। इसलिए इस शब्द को संभावित तीव्रता के संदर्भ में समझना चाहिए, न कि किसी घोषित आपदा के रूप में।
क्या इस बार सर्दियों में कम पड़ेगी ठंड?
अल नीनो का प्रभाव भारत में हर जगह एक जैसा नहीं होता। फिर भी, मजबूत अल नीनो की परिस्थितियों में कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की आशंका बढ़ सकती है।
यदि सर्दियों के दौरान तापमान सामान्य से ऊपर रहता है, तो उत्तर भारत के लोगों को कड़ाके की ठंड का इंतजार करना पड़ सकता है। दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे क्षेत्रों में ठंड का वास्तविक असर पश्चिमी विक्षोभ, हवाओं, बादलों और स्थानीय परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि इस बार शीतलहर नहीं चलेगी या ठंड बिल्कुल नहीं पड़ेगी। मौसम में अचानक बदलाव संभव हैं और किसी विशेष शहर में कितनी ठंड होगी, इसका आकलन क्षेत्रवार पूर्वानुमान से ही किया जा सकता है।
मानसून की कमी बढ़ा सकती है पानी की चिंता
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल बारिश और जल उपलब्धता का है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्टों के मुताबिक, 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से लगभग 13 प्रतिशत कम बारिश के साथ समाप्त हुआ।
कम बारिश का असर जलाशयों, भूजल और खेती के लिए उपलब्ध पानी पर पड़ सकता है। यदि आने वाले महीनों में भी बारिश कम रहती है और तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहता है, तो कुछ क्षेत्रों में पानी की मांग और उपलब्धता के बीच अंतर बढ़ सकता है।
हालांकि, देश के सभी हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बनना तय नहीं है। स्थानीय बारिश, जलाशयों में पहले से मौजूद पानी और सरकारी प्रबंधन के आधार पर प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं।
किसानों की बढ़ सकती है परेशानी
मौसम में बदलाव का असर कृषि क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। रबी की फसलों, विशेषकर गेहूं, सरसों और चने की खेती के लिए तापमान और मिट्टी में नमी महत्वपूर्ण हैं।
यदि बारिश कम होती है और खेतों में नमी की कमी रहती है, तो किसानों को सिंचाई के लिए अतिरिक्त पानी की जरूरत पड़ सकती है। वहीं, सर्दियों के दौरान तापमान सामान्य से अधिक रहने पर कुछ फसलों की बढ़वार और उत्पादन प्रभावित होने की आशंका भी रहती है।
लेकिन फसलों पर वास्तविक असर बुवाई के समय, मिट्टी की स्थिति, सिंचाई की उपलब्धता और आगे के मौसम पर निर्भर करेगा। इसलिए अभी किसी निश्चित उत्पादन नुकसान का दावा करना जल्दबाजी होगी।
गर्मियों में बढ़ सकती है गर्मी और बिजली की मांग
अल नीनो का प्रभाव केवल सर्दियों तक सीमित नहीं रह सकता। यदि इसके साथ वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी और स्थानीय मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां जुड़ती हैं, तो 2027 की गर्मियों में कुछ इलाकों में अधिक गर्मी का जोखिम बढ़ सकता है।
गर्मी बढ़ने पर एयर कंडीशनर और कूलर के इस्तेमाल से बिजली की मांग बढ़ती है। दूसरी ओर, जलाशयों में पानी कम होने पर जलविद्युत उत्पादन पर दबाव पड़ सकता है। पानी की कमी और अत्यधिक गर्मी का मेल आम लोगों, किसानों और उद्योगों के लिए चुनौती बन सकता है।
क्या भारत को अभी से सतर्क होने की जरूरत है?
विशेषज्ञों के लिए सबसे महत्वपूर्ण काम मौसम के संकेतों पर लगातार नजर रखना और समय रहते तैयारी करना है। लोगों को पानी की बर्बादी रोकने, बिजली का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करने और मौसम विभाग की चेतावनियों पर ध्यान देने की जरूरत है।
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निष्कर्ष
2026-27 के दौरान मजबूत अल नीनो भारत के मौसम के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन सकता है। कम बारिश, अपेक्षाकृत गर्म सर्दियां और आगे चलकर गर्मी बढ़ने की आशंका पर नजर रखना जरूरी है। हालांकि, सर्दियों में कितनी ठंड पड़ेगी और गर्मियों में कितनी गर्मी बढ़ेगी, यह अभी निश्चित नहीं है। आने वाले महीनों में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के अपडेट से तस्वीर अधिक स्पष्ट होगी।

