देश की राजनीति में विरोध-प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में इसकी भाषा GEN Z और शैली में बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों में पारंपरिक राजनीतिक नारों के साथ मीम, फिल्मी संवाद, सोशल मीडिया स्लैंग और युवा पीढ़ी की बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल नजर आ रहा है। ‘ज्ञानू मस्ट गो’, ‘ज्ञानेश BRO, JUST RESIGN’ और ‘इट्स डन ब्रो’ जैसे नारे और पोस्टर इस बदलाव के उदाहरण बनकर सामने आए हैं।
SIR विवाद के बीच सड़क पर विपक्ष
विरोध प्रदर्शनों का मौजूदा दौर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद से जुड़ा है। विपक्षी दलों ने SIR की प्रक्रिया और उसके संभावित प्रभावों को लेकर चुनाव आयोग से सवाल किए हैं और CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है।
हाल के दिनों में दिल्ली में विपक्षी सांसदों और अन्य संगठनों के प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बैरिकेडिंग और हिरासत की घटनाएं भी सामने आई हैं। दिल्ली में आप, AISA, NSUI और अन्य समूहों के कार्यकर्ताओं ने मार्च निकालने की कोशिश की, जिन्हें पुलिस ने रोक दिया। कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
इसी बीच मुंबई में भी CJP की ओर से आयोजित प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोग जुटे। रिपोर्टों के मुताबिक प्रदर्शन में युवाओं की मौजूदगी अधिक रही और पोस्टरों तथा नारों में राजनीतिक संदेश के साथ व्यंग्य और पॉप-कल्चर का इस्तेमाल किया गया।
‘ज्ञानू मस्ट गो’ और ‘इट्स डन ब्रो’ क्यों चर्चा में?
परंपरागत राजनीतिक प्रदर्शनों में ‘इस्तीफा दो’, ‘सरकार जवाब दो’ या ‘तानाशाही नहीं चलेगी’ जैसे नारे आम रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया के दौर में विरोध की भाषा अधिक संक्षिप्त, दृश्यात्मक और मीम-आधारित होती जा रही है।
मुंबई के प्रदर्शन में ‘Gyanesh BRO, JUST RESIGN’ और ‘Gaddaar Gyaanu Must Go’ जैसे संदेश वाले पोस्टर नजर आए। वहीं ‘Gyanu, it’s done bro’ जैसे वाक्यांशों का इस्तेमाल भी हुआ। राहुल गांधी द्वारा ‘ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो!’ वाला पोस्टर दिखाए जाने की तस्वीरें और वीडियो भी सोशल मीडिया पर चर्चा में रहे।
इन नारों की खासियत यह है कि वे लंबे राजनीतिक भाषण के बजाय कुछ शब्दों में संदेश देने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा अंग्रेजी और हिंदी के मिश्रण, इंटरनेट स्लैंग और फिल्मी संदर्भों का इस्तेमाल इन्हें सोशल मीडिया पर साझा करने के लिहाज से अधिक आसान बनाता है।
GEN Z और सोशल मीडिया ने बदला तरीका
इस बदलाव के पीछे सोशल मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। Instagram, WhatsApp, YouTube और X जैसे प्लेटफॉर्म किसी स्थानीय प्रदर्शन, नारे या पोस्टर को कुछ ही समय में बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचा सकते हैं।
इससे आंदोलन के लिए केवल पारंपरिक राजनीतिक संगठनों पर निर्भरता भी कम हो सकती है। किसी मुद्दे पर ऑनलाइन चर्चा, हैशटैग, वीडियो या मीम पहले लोकप्रिय हो सकता है और उसके बाद वही मुद्दा सड़क पर प्रदर्शन का रूप ले सकता है।
हाल की रिपोर्टों में राजनीतिक विश्लेषक उदय चंद्र के हवाले से कहा गया है कि सोशल मीडिया ने लोगों को पारंपरिक पार्टियों और संगठनों से स्वतंत्र रूप से जोड़ने की क्षमता बढ़ाई है। उनके मुताबिक डिजिटल प्लेटफॉर्म ऐसे लोगों को तेजी से जोड़ सकते हैं जो पहले किसी संगठित नेटवर्क का हिस्सा नहीं थे।
पुरानी है सड़क की राजनीति, नया है माध्यम
भारत में सड़क पर आंदोलन और जनभागीदारी का लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सत्याग्रह और मार्च से लेकर जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन, नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन और किसान आंदोलन तक सड़कें राजनीतिक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण मंच रही हैं।
फर्क यह है कि आज सड़क पर पहुंचने से पहले आंदोलन डिजिटल स्पेस में आकार ले सकता है। किसी प्रदर्शन की तस्वीर, वीडियो या नारा कुछ घंटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। इससे प्रदर्शन की दृश्यता बढ़ती है, लेकिन साथ ही सोशल मीडिया पर गलत या अधूरी जानकारी तेजी से फैलने की संभावना भी रहती है।
राजनीतिक दल भी अपना रहे युवा शैली
हाल के प्रदर्शनों में युवा भाषा और डिजिटल संस्कृति का प्रभाव केवल स्वतंत्र प्रदर्शनकारियों तक सीमित नहीं रहा। राजनीतिक दलों के नेता भी सोशल मीडिया पर छोटे, वायरल होने वाले संदेशों और दृश्यों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
CEC विवाद में विपक्षी नेताओं के सड़क पर उतरने, बैरिकेड पार करने की कोशिश करने और प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े होने की तस्वीरें व्यापक रूप से साझा हुई हैं। इससे पारंपरिक राजनीतिक आंदोलन और डिजिटल प्रचार के बीच की दूरी कम होती दिखाई दे रही है।
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आंदोलन की भाषा बदली, मुद्दे वही
‘ज्ञानू मस्ट गो’ से लेकर ‘इट्स डन ब्रो’ तक के नारों को केवल स्लोगन का बदलाव मानना आसान है, लेकिन इनके पीछे विरोध की वही पुरानी राजनीतिक प्रक्रिया दिखाई देती है—किसी संस्था या निर्णय के खिलाफ असहमति दर्ज करना और उसे सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाना।
फिलहाल SIR, चुनाव आयोग की भूमिका और CEC के इस्तीफे की मांग को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। चुनाव आयोग की ओर से आंतरिक मतभेदों को सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है, जबकि विपक्षी दल चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात जरूर स्पष्ट की है कि भारत में सड़क की राजनीति खत्म नहीं हुई है। बस उसकी भाषा बदल रही है। अब नारे केवल पोस्टरों और लाउडस्पीकरों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि मीम, रील, वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए एक साथ सड़क और स्क्रीन—दोनों जगह दिखाई देते हैं।

