केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान की नजर अब उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी टिक गई है। बिहार की सियासत में अपनी पार्टी की पकड़ मजबूत करने के बाद चिराग पासवान ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सक्रियता बढ़ाने के संकेत दिए हैं। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश में उनका संभावित राजनीतिक विस्तार ऐसे समय हो रहा है, जब वह केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा हैं।
चिराग पासवान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी सहयोगी और एनडीए के प्रमुख युवा चेहरों में से एक माना जाता है। प्रधानमंत्री के प्रति अपनी राजनीतिक निष्ठा जताते हुए चिराग कई बार खुद को उनका ‘हनुमान’ भी बता चुके हैं। ऐसे में यूपी में भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपनी पार्टी का विस्तार करने की कोशिश कई राजनीतिक सवाल खड़े करती है।
यूपी में क्यों बढ़ रही है चिराग की दिलचस्पी?
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा विधानसभा वाला राज्य है और यहां की राजनीति का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ता है। राज्य में दलित, पिछड़ा और अति पिछड़ा वोट बैंक चुनावी समीकरणों में अहम भूमिका निभाता है।
चिराग पासवान की राजनीति का सबसे मजबूत आधार बिहार का पासवान यानी दलित वोट बैंक रहा है। उनके पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत ने इस समुदाय में एलजेपी को मजबूत पहचान दी थी।
चिराग अब इसी सामाजिक आधार को उत्तर प्रदेश में विस्तार देने की कोशिश कर सकते हैं। राज्य में पासवान समुदाय की मौजूदगी बिहार की तुलना में कम है, लेकिन दलित राजनीति के व्यापक समीकरण में इसका राजनीतिक महत्व है।
इसके अलावा चिराग की पार्टी यदि यूपी में चुनाव लड़ती है तो वह खुद को केवल एक जाति आधारित दल के रूप में पेश करने के बजाय दलित, युवा और गरीब तबकों के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश कर सकती है।
भाजपा के साथ रहते हुए भाजपा के खिलाफ?
चिराग पासवान की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती यही है कि वह एनडीए के सहयोगी हैं और केंद्र में मंत्री भी हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश में यदि उनकी पार्टी भाजपा के खिलाफ उम्मीदवार उतारती है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सहयोगी दलों के बीच मतभेद पैदा होंगे।
हालांकि, राजनीति में गठबंधन राज्य-दर-राज्य अलग समीकरणों पर आधारित हो सकते हैं। किसी राज्य में सहयोगी दल एक साथ चुनाव लड़ें और दूसरे राज्य में अलग-अलग सीटों पर अपनी ताकत आजमाएं, ऐसा पहले भी देखने को मिला है।
चिराग की रणनीति भी इसी मॉडल पर आगे बढ़ सकती है। वह भाजपा के साथ राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन बनाए रखते हुए यूपी में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर सकते हैं।
‘मोदी के हनुमान’ की छवि का क्या होगा?
चिराग पासवान की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू उनकी प्रधानमंत्री मोदी के प्रति सार्वजनिक निष्ठा रही है। उन्होंने कई मौकों पर कहा है कि वह प्रधानमंत्री के साथ मजबूती से खड़े हैं।
यही वजह है कि यूपी में भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने की स्थिति में चिराग को अपने समर्थकों के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि उनका राजनीतिक लक्ष्य क्या है।
यदि एलजेपी (रामविलास) सीमित सीटों पर चुनाव लड़ती है और उसका मकसद अपनी संगठनात्मक मौजूदगी दर्ज कराना होता है, तो इसे भाजपा के खिलाफ व्यापक मोर्चा नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि पार्टी बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारती है, तो इससे एनडीए की राजनीति पर सवाल जरूर उठेंगे।
2027 का विधानसभा चुनाव क्यों अहम?
उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। भाजपा के लिए यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि राज्य में सत्ता बरकरार रखना उसके राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभाव के लिए भी अहम है।
वहीं विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस भी भाजपा के खिलाफ सामाजिक और राजनीतिक गठजोड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
ऐसे माहौल में चिराग पासवान जैसे सहयोगी दलों का अलग-अलग सामाजिक समूहों में विस्तार भाजपा के लिए दोधारी स्थिति पैदा कर सकता है। एक ओर इससे एनडीए के व्यापक सामाजिक आधार को बढ़ाने में मदद मिल सकती है, लेकिन दूसरी ओर सहयोगी दल यदि भाजपा के वोट बैंक वाले क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ते हैं तो वोटों के बंटवारे का जोखिम भी पैदा हो सकता है।
चिराग के लिए भी बड़ा मौका
यूपी में चुनाव लड़ना चिराग पासवान के लिए सिर्फ सीट जीतने का प्रयास नहीं होगा। यह उनकी पार्टी को बिहार से बाहर राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।
एलजेपी (रामविलास) अगर यूपी में कुछ सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करती है तो चिराग की राष्ट्रीय राजनीति में bargaining power बढ़ सकती है। इससे वह एनडीए के भीतर भी अपने राजनीतिक महत्व को मजबूत कर सकते हैं।
इसके अलावा उत्तर प्रदेश में संगठन खड़ा करने से पार्टी को भविष्य में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में नए अवसर मिल सकते हैं।
भाजपा के लिए क्या संदेश?
चिराग का यूपी प्लान भाजपा के लिए भी एक राजनीतिक संदेश हो सकता है। एनडीए में शामिल छोटे दल अब केवल अपने पारंपरिक राज्यों तक सीमित नहीं रहना चाहते। वे अपने प्रभाव का विस्तार कर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहते हैं।
भाजपा के सामने चुनौती यह होगी कि वह सहयोगी दलों की महत्वाकांक्षाओं और अपने चुनावी हितों के बीच संतुलन कैसे बनाए।
अगर चिराग यूपी में सीमित सीटों पर उतरते हैं तो इसे गठबंधन के भीतर सीटों की सौदेबाजी और संगठन विस्तार के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन अगर उनका अभियान बड़े पैमाने पर होता है, तो भाजपा के लिए राजनीतिक समीकरण अलग हो सकते हैं।
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क्या चिराग को फायदा होगा?
उत्तर प्रदेश में किसी नई पार्टी के लिए जगह बनाना आसान नहीं है। यहां भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस जैसी स्थापित राजनीतिक ताकतें मौजूद हैं। जातीय समीकरण भी बेहद जटिल हैं और हर क्षेत्र में अलग-अलग प्रभाव दिखाई देता है।
चिराग के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन तैयार करने और स्थानीय स्तर पर मजबूत उम्मीदवार खोजने की होगी। केवल बिहार की सामाजिक पहचान के आधार पर यूपी में चुनावी सफलता हासिल करना मुश्किल होगा।
फिर भी, चिराग पासवान का बढ़ता राजनीतिक आत्मविश्वास बताता है कि वह अपनी पार्टी को क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर ले जाना चाहते हैं।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में चिराग पासवान की सक्रियता को भाजपा के खिलाफ सीधी बगावत के बजाय राजनीतिक विस्तार और भविष्य की सौदेबाजी की रणनीति के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा। वह एनडीए के साथ अपने रिश्ते बनाए रखते हुए अपनी पार्टी की स्वतंत्र पहचान मजबूत करना चाहते हैं।
अब असली सवाल यह है कि 2027 के चुनाव में चिराग कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारते हैं और भाजपा के साथ उनका तालमेल किस रूप में सामने आता है। यही तय करेगा कि उनका यूपी दांव केवल संगठन विस्तार तक सीमित रहता है या राज्य की चुनावी राजनीति में एक नया समीकरण खड़ा करता है।

