केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर के मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के चिन्हित इलाकों में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA), 1958 को एक बार फिर छह महीने के लिए बढ़ा दिया है। गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचनाओं के मुताबिक यह विस्तार 1 अक्टूबर 2026 से लागू होगा और फिलहाल 31 मार्च 2027 तक प्रभावी रहेगा, जब तक इसे इससे पहले वापस नहीं लिया जाता। सरकार ने यह फैसला तीनों राज्यों में कानून-व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा के बाद लिया है।
किन इलाकों में लागू रहेगा AFSPA?
मणिपुर में केंद्र ने लगभग पूरे राज्य को ‘डिस्टर्ब्ड एरिया‘ घोषित करने की अवधि आगे बढ़ाई है, लेकिन पांच जिलों के 13 पुलिस थाना क्षेत्रों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। इनमें इम्फाल वेस्ट, इम्फाल ईस्ट, थौबल, बिष्णुपुर और काकचिंग के कुछ थाना क्षेत्र शामिल हैं।
नागालैंड में AFSPA नौ जिलों—दीमापुर, निउलैंड, चुमौकेदिमा, मोन, किफिरे, नोकलाक, फेक, पेरेन और मेलुरी में जारी रहेगा। इसके अलावा पांच अन्य जिलों के 21 पुलिस थाना क्षेत्रों को भी अधिसूचना में शामिल किया गया है।
अरुणाचल प्रदेश में यह कानून तिरप, चांगलांग और लोंगडिंग जिलों में लागू रहेगा। इसके साथ ही नामसाई जिले के नामसाई, महादेवपुर और चौखाम पुलिस थाना क्षेत्रों को भी इसके दायरे में रखा गया है।
AFSPA आखिर है क्या?
AFSPA यानी Armed Forces (Special Powers) Act, 1958 ऐसा कानून है जिसके तहत केंद्र सरकार किसी इलाके को ‘डिस्टर्ब्ड एरिया’ घोषित कर सकती है, जहां सुरक्षा बलों की सहायता से कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी माना जाता है।
कानून की धारा 3 केंद्र सरकार को किसी क्षेत्र को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित करने का अधिकार देती है। इसके बाद वहां तैनात सशस्त्र बलों को सामान्य परिस्थितियों की तुलना में अतिरिक्त अधिकार मिलते हैं।
यह कानून मूल रूप से 1958 में पूर्वोत्तर में उग्रवाद और सशस्त्र विद्रोह की स्थिति से निपटने के लिए लागू किया गया था। समय के साथ इसका इस्तेमाल पूर्वोत्तर के अलग-अलग राज्यों के कुछ हिस्सों में किया गया।
सेना को मिलते हैं कौन-कौन से विशेष अधिकार?
AFSPA के तहत ‘डिस्टर्ब्ड एरिया’ में तैनात सशस्त्र बलों के अधिकृत अधिकारियों को कुछ विशेष शक्तियां प्राप्त होती हैं। इनमें बिना वारंट तलाशी लेना, कुछ परिस्थितियों में गिरफ्तारी करना और हथियारों या गोला-बारूद को जब्त करना शामिल है।
कानून कुछ परिस्थितियों में अधिकारी को बल प्रयोग करने का अधिकार भी देता है। यदि उसे लगता है कि कोई व्यक्ति कानून के तहत निषिद्ध गतिविधि कर रहा है या ऐसा कृत्य करने वाला है, तो परिस्थितियों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। कुछ गंभीर परिस्थितियों में कानून घातक बल के इस्तेमाल की भी अनुमति देता है।
यही व्यापक शक्तियां AFSPA को भारत के सबसे अधिक बहस वाले सुरक्षा कानूनों में शामिल करती हैं।
क्या AFSPA का मतलब सेना को असीमित अधिकार मिलना है?
नहीं। AFSPA के तहत मिलने वाली शक्तियां कानून और उसमें निर्धारित शर्तों के अधीन हैं। इसका उद्देश्य सुरक्षा बलों को ‘डिस्टर्ब्ड एरिया’ में सशस्त्र हिंसा और गंभीर सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए अतिरिक्त कानूनी अधिकार उपलब्ध कराना है।
साथ ही, AFSPA के तहत कार्रवाई के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रियाएं लागू होती हैं। कानून की धारा 6 के तहत ड्यूटी के दौरान किए गए कुछ कार्यों के संबंध में सुरक्षा बलों के सदस्यों पर मुकदमा चलाने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति का प्रावधान है।
AFSPA को लेकर विवाद क्यों रहता है?
AFSPA को लेकर लंबे समय से दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते रहे हैं। सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान इसे उग्रवाद और सशस्त्र हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को प्रभावी ढंग से काम करने के लिए जरूरी कानून के रूप में देखते हैं।
दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठनों और कानून के आलोचकों का कहना है कि इसके तहत मिली शक्तियों के दुरुपयोग की आशंका रहती है और कथित ज्यादतियों के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसी वजह से पूर्वोत्तर में AFSPA को हटाने या इसके दायरे को सीमित करने की मांग समय-समय पर उठती रही है।
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पूर्वोत्तर में धीरे-धीरे कम हुआ है दायरा
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर के कई हिस्सों से AFSPA हटाया या इसका क्षेत्र सीमित किया है। गृह मंत्रालय की मौजूदा सूची में भी अलग-अलग राज्यों के लिए समय-समय पर जारी अधिसूचनाओं के जरिए ‘डिस्टर्ब्ड एरिया’ की सीमाएं निर्धारित की गई हैं।
हालांकि मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में इसे जारी रखने का ताजा फैसला बताता है कि केंद्र इन क्षेत्रों में सुरक्षा स्थिति की समीक्षा के आधार पर कानून को फिलहाल बनाए रखना जरूरी मानता है।

