मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चल रहा विवाद अब सत्तारूढ़ NDA के भीतर भी चर्चा का विषय बन गया है। NDA के तीन सहयोगी दलों—लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) और तेलुगु देशम पार्टी (TDP)—ने चुनाव आयोग से SIR और आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। सहयोगी दलों का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर जनता के मन में किसी तरह का भ्रम या संदेह नहीं रहना चाहिए।
चिराग पासवान ने SIR पर कहा- आयोग को खुद रखना चाहिए अपना पक्ष
केंद्रीय मंत्री और LJP (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान ने पटना में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उन्हें सरकार का हिस्सा होने के नाते उसका बचाव करने की जरूरत नहीं है। उनका कहना था कि अगर आयोग के कामकाज को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो उसे खुद सामने आकर अपना पक्ष रखना चाहिए।
पासवान ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी मांग विपक्ष के आरोपों का समर्थन करने के लिए नहीं है। उनके मुताबिक विपक्ष राजनीतिक तौर पर अपने आरोप लगाता रहेगा, लेकिन आम मतदाताओं के मन में पैदा हुए सवालों का जवाब देना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। उन्होंने चेताया कि अगर लोगों का चुनावी व्यवस्था से भरोसा कमजोर होता है, तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा।
उपेंद्र कुशवाहा ने भी SIR पर तत्काल स्पष्टीकरण की मांग की
राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने भी SIR को लेकर चुनाव आयोग से तत्काल स्पष्टीकरण जारी करने की मांग की। उन्होंने कहा कि विवाद के कारण जनता के बीच भ्रम की स्थिति बनी है और आयोग को वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
कुशवाहा की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब चुनाव आयोग के भीतर SIR और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों की ओर से आपत्तियां दर्ज किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
TDP ने पारदर्शिता को बताया भरोसे की कुंजी
NDA की सहयोगी TDP ने भी चुनाव आयोग से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। पार्टी के लोकसभा फ्लोर लीडर लावु श्रीकृष्ण देवरायालु ने कहा कि चुनाव आयोग लोकतंत्र में महत्वपूर्ण संवैधानिक जिम्मेदारी निभाता है। ऐसे में जब किसी प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो स्पष्टीकरण और पारदर्शिता संस्था के प्रति जनता के भरोसे को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।
TDP नेता ने आंध्र प्रदेश में SIR के अनुभव का भी उल्लेख किया और कहा कि वहां उनकी जानकारी के अनुसार प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से हुई तथा मतदाताओं को अपनी चिंताएं रखने के लिए अवसर और समय दिया गया।
क्या है SIR को लेकर विवाद?
यह विवाद उस रिपोर्ट के बाद तेज हुआ जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नाम हटाने और बहाल करने, Form 6 में बदलाव तथा मतदाता डेटा और चुनावी सॉफ्टवेयर के प्रबंधन जैसे मुद्दे शामिल थे।
इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर भी राजनीतिक विवाद तेज हुआ।
चुनाव आयोग ने कहा- अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए
हालांकि, चुनाव आयोग ने कथित अंदरूनी मतभेद की व्याख्या अलग तरीके से की है। आयोग ने कहा कि बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में लिखित टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव, सवाल और आंतरिक जांच-पड़ताल निर्णय लेने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
ECI के मुताबिक SIR समेत पिछले एक साल में आयोग द्वारा लिए गए अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से हुए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि कुछ चुनिंदा आंतरिक टिप्पणियों को सामने रखकर पूरी प्रक्रिया की तस्वीर देखना उचित नहीं होगा।
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जनता के भरोसे पर केंद्रित हुई बहस
NDA सहयोगी दलों की टिप्पणियों से साफ है कि मौजूदा विवाद का एक प्रमुख मुद्दा चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बना रहना है। एक तरफ चुनाव आयोग अपने फैसलों को सर्वसम्मत और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप बता रहा है, वहीं आयोग के दो सदस्यों की कथित लिखित आपत्तियों को लेकर सार्वजनिक बहस जारी है।
ऐसे में सहयोगी दलों की मांग है कि आयोग सामने आकर पूरे मामले पर विस्तृत स्थिति स्पष्ट करे। आने वाले दिनों में SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची में बदलाव और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों को लेकर स्पष्टीकरण इस विवाद की दिशा तय करने में अहम हो सकता है।

