उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में खराब मौसम और लगातार बारिश के कारण प्रसिद्ध आदि कैलाश यात्रा के दूसरे चरण को स्थगित कर दिया गया है। प्रशासन ने यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 15 सितंबर से शुरू होने वाली यात्रा को अब 20 सितंबर तक टाल दिया है। आदि कैलाश जाने वाले प्रमुख मार्ग पर भूस्खलन से सड़क के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हुए हैं, जबकि 11 सितंबर को भारी बारिश और अचानक आई बाढ़ के कारण कुलागाड़ के पास बैली ब्रिज बह गया, जिससे सीमावर्ती इलाकों की आवाजाही प्रभावित हुई है।
प्रशासन का कहना है कि यात्रा दोबारा शुरू करने से पहले सड़क और पुल की मरम्मत जरूरी है। अधिकारियों को उम्मीद है कि बैली ब्रिज को जल्द ही तैयार कर दिया जाएगा और सड़क से मलबा हटाकर यातायात बहाल करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, अंतिम निर्णय मौसम की स्थिति और मार्ग की सुरक्षा का आकलन करने के बाद ही लिया जाएगा।
15 सितंबर से होनी थी आदि कैलाश यात्रा की शुरुआत
आदि कैलाश यात्रा का दूसरा चरण 15 सितंबर से शुरू किया जाना था। इसके लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने यात्रा की तैयारी की थी। लेकिन पिछले कुछ दिनों में पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी इलाकों में हुई भारी बारिश ने यात्रा मार्ग की स्थिति खराब कर दी।
धारचूला से गुंजी तक जाने वाले मार्ग पर कई स्थानों पर भूस्खलन हुआ। सड़क पर मलबा और पत्थर आने के कारण यातायात बाधित हुआ। इसी बीच कुलागाड़ के पास महत्वपूर्ण बैली ब्रिज बह जाने से स्थिति और गंभीर हो गई।
यह पुल स्थानीय लोगों के साथ-साथ आदि कैलाश जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग था। इसके क्षतिग्रस्त होने से मार्ग पर वाहनों की आवाजाही प्रभावित हुई और प्रशासन के सामने यात्रा को सुरक्षित रूप से संचालित करने की चुनौती खड़ी हो गई।
तीन घाटियों की कनेक्टिविटी प्रभावित
पुल बहने के बाद व्यास, चौदांस और दारमा घाटियां धारचूला से प्रभावित हुईं। ये सीमावर्ती और दुर्गम क्षेत्र हैं, जहां सड़क संपर्क बाधित होने का सीधा असर स्थानीय लोगों की आवाजाही और जरूरी सामान की आपूर्ति पर पड़ता है।
बारिश के दौरान इस क्षेत्र में सड़कें भूस्खलन की चपेट में आती रहती हैं। सितंबर के शुरुआती दिनों में भी पिथौरागढ़ जिले में भारी बारिश के कारण कई सड़कों के बंद होने और संपर्क प्रभावित होने की खबरें सामने आई थीं।ऐसे में प्रशासन के लिए केवल यात्रा मार्ग बहाल करना ही चुनौती नहीं है, बल्कि स्थानीय आबादी के लिए नियमित संपर्क और आवश्यक सेवाओं की उपलब्धता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।
तीन दिन में पुल बहाल करने का लक्ष्य
धारचूला के एसडीएम आशीष जोशी के अनुसार, बैली ब्रिज के निर्माण का काम शुरू हो चुका है और उम्मीद है कि करीब तीन दिनों के भीतर इसे वाहनों की आवाजाही के लिए तैयार कर लिया जाएगा। इसी अवधि में सड़क से मलबा हटाकर मार्ग को भी बहाल करने का प्रयास किया जा रहा है।
हालांकि, अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि केवल सड़क और पुल की मरम्मत पूरी होना यात्रा शुरू करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। मौसम अनुकूल रहना भी जरूरी है। यदि बारिश दोबारा तेज होती है या नए भूस्खलन की आशंका रहती है, तो यात्रा को आगे भी टाला जा सकता है।
20 सितंबर से शुरू होने की उम्मीद
प्रशासन ने फिलहाल 20 सितंबर को यात्रा दोबारा शुरू करने का लक्ष्य रखा है। मौसम और मार्ग की स्थिति सामान्य रहने पर इसी तारीख से यात्रियों को इनर लाइन परमिट जारी करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
इनर लाइन परमिट इस संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में यात्रा के लिए महत्वपूर्ण प्रशासनिक अनुमति है। इसलिए अधिकारियों के लिए पहले मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करना और उसके बाद ही यात्रियों को आगे बढ़ने की अनुमति देना जरूरी है।प्रशासन ने संकेत दिया है कि अंतिम फैसला परिस्थितियों की समीक्षा के बाद लिया जाएगा।
श्रद्धालुओं की तैयारियों पर पड़ा असर
यात्रा स्थगित होने से उन श्रद्धालुओं को परेशानी हुई है, जिन्होंने सितंबर के दूसरे चरण के लिए पहले से तैयारी कर रखी थी। कुछ यात्री यात्रा शुरू होने की उम्मीद में धारचूला पहुंच भी चुके हैं और स्थानीय होटलों में ठहरे हुए हैं।
स्थानीय टूर ऑपरेटरों के अनुसार, यात्रा को लेकर लोगों की पूछताछ जारी है और श्रद्धालु नई तारीख को लेकर जानकारी मांग रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि यदि सड़क और पुल समय पर ठीक हो जाते हैं और मौसम साफ रहता है तो 20 सितंबर से यात्रा फिर शुरू हो सकती है।
आदि कैलाश क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
उत्तराखंड का आदि कैलाश क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में एक प्रमुख धार्मिक और पर्यटन गंतव्य के रूप में तेजी से उभरा है। यह पिथौरागढ़ जिले की व्यास घाटी में स्थित है और धार्मिक आस्था के साथ-साथ हिमालयी प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी प्रसिद्ध है।
अक्टूबर 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आदि कैलाश क्षेत्र के दौरे के बाद इस क्षेत्र को देशभर में और अधिक पहचान मिली। इसके बाद यहां तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की संख्या में भी रुचि बढ़ी।
हालांकि, इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है। ऊंचे पहाड़, संकरी सड़कें, तेज ढलान और मानसून के दौरान होने वाले भूस्खलन यात्रा को जोखिमपूर्ण बना सकते हैं। इसलिए यात्रा के संचालन में मौसम और सड़क की स्थिति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहती है।
मौसम के कारण बार-बार चुनौती
पिथौरागढ़ और आसपास के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इस मानसून के दौरान बारिश ने बुनियादी ढांचे को कई बार नुकसान पहुंचाया है। कुछ क्षेत्रों में पुलों के बहने से दूरस्थ घाटियों का संपर्क टूट चुका है। हाल में जिले में एक महत्वपूर्ण पुल एक महीने के भीतर दूसरी बार बह गया, जिससे दारमा, व्यास और चौदांस घाटियां प्रभावित हुईं।
इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि पहाड़ी इलाकों में अस्थायी पुल और सड़कें भारी बारिश के दौरान कितनी संवेदनशील हो सकती हैं। आदि कैलाश यात्रा जैसे बड़े धार्मिक आयोजन के दौरान यह चुनौती और बढ़ जाती है, क्योंकि एक साथ बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही होती है।
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सुरक्षा को प्राथमिकता
यात्रा स्थगित करने का प्रशासन का फैसला मुख्य रूप से सुरक्षा से जुड़ा है। खराब सड़क और क्षतिग्रस्त पुल के बीच श्रद्धालुओं को आगे भेजना जोखिमपूर्ण हो सकता था। अचानक भूस्खलन या जलप्रवाह की स्थिति में यात्रियों को सुरक्षित निकालना भी कठिन हो सकता है।
इसलिए प्रशासन पहले संपर्क मार्ग को मजबूत करने और फिर यात्रा शुरू करने की रणनीति पर काम कर रहा है। मौसम साफ रहने की स्थिति में सड़क और पुल की बहाली के बाद यात्रियों की आवाजाही को चरणबद्ध तरीके से शुरू किया जा सकता है।
निष्कर्ष
भूस्खलन और बैली ब्रिज के बह जाने के कारण आदि कैलाश यात्रा का दूसरा चरण अब 15 सितंबर के बजाय 20 सितंबर से शुरू करने की तैयारी है। धारचूला-गुंजी मार्ग की बहाली के लिए प्रशासन ने काम तेज कर दिया है और कुलागाड़ में नया बैली ब्रिज तैयार किया जा रहा है।
हालांकि, यात्रा की नई तारीख अभी मौसम और सड़क की वास्तविक स्थिति पर निर्भर करेगी। प्रशासन की प्राथमिकता श्रद्धालुओं को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना है। यदि पुल और सड़क निर्धारित समय में बहाल हो जाते हैं और मौसम अनुकूल रहता है, तो 20 सितंबर से इनर लाइन परमिट जारी करने और यात्रा को फिर से शुरू करने की उम्मीद है।
आदि कैलाश यात्रा में बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए यह घटना पहाड़ी मार्गों की स्थायी मजबूती, बेहतर मौसम निगरानी और आपदा प्रबंधन व्यवस्था की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है।

