Essel ग्रुप के संस्थापक और मीडिया कारोबारी सुभाष चंद्रा से जुड़े एक बड़े व्यक्तिगत दिवालियापन मामले में राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) के फैसले ने वित्तीय और कारोबारी जगत में व्यापक चर्चा छेड़ दी है। NCLT के तीसरे सदस्य ने करीब ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकृत दावों के मुकाबले कुल लगभग ₹6.50 करोड़ के repayment plan को मंजूरी देने के पक्ष में फैसला दिया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इससे लेनदारों की वास्तविक वसूली करीब 0.028% बैठती है और प्रभावी ‘हेयरकट’ लगभग 99.97% है।
हालांकि, इस मामले को सीधे तौर पर “₹22 हजार करोड़ का कर्ज माफ” कहना पूरी तस्वीर नहीं बताता। यह Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) के तहत चल रही व्यक्तिगत दिवालियापन प्रक्रिया और व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ा repayment plan है। NCLT ने उपलब्ध संपत्तियों और प्रक्रिया से जुड़े पहलुओं पर विचार करने के बाद योजना को मंजूरी देने का रास्ता अपनाया है।
₹22,006 करोड़ के दावों के सामने ₹6.5 करोड़ का प्रस्ताव
मामले में लेनदारों के करीब ₹22,006.57 करोड़ के दावे स्वीकार किए गए थे। इसके मुकाबले प्रस्तावित भुगतान ₹6.50 करोड़ है। इसमें से ₹6.25 करोड़ पात्र लेनदारों के बीच बांटे जाने हैं, जबकि करीब ₹25 लाख दिवालियापन समाधान प्रक्रिया की लागत के लिए रखे गए हैं।
इस हिसाब से लेनदारों को मूल दावों का बहुत छोटा हिस्सा ही वापस मिल पाएगा। यही वजह है कि कई बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने repayment plan का विरोध किया था।
NCLT के सामने यह तर्क भी रखा गया कि इतनी कम वसूली से वित्तीय संस्थानों को भारी नुकसान होगा। दूसरी तरफ, ट्रिब्यूनल के सामने यह सवाल भी था कि यदि प्रस्ताव खारिज कर दिया जाता है, तो क्या उपलब्ध संपत्तियों से लेनदारों को इससे अधिक रकम मिल पाएगी।
मामला शुरू कैसे हुआ?
यह मामला सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ा है। उन्होंने Vivek Infracon को दिए गए करीब ₹170 करोड़ के ऋण के लिए व्यक्तिगत गारंटर की भूमिका निभाई थी। जब संबंधित ऋण की अदायगी में समस्या आई, तो Indiabulls Housing Finance, जिसे अब Sammaan Capital के नाम से जाना जाता है, ने 2022 में IBC की धारा 95 के तहत चंद्रा के खिलाफ व्यक्तिगत दिवालियापन की कार्यवाही शुरू की। यह याचिका 2024 में स्वीकार की गई।
इसके बाद चंद्रा की ओर से repayment plan पेश किया गया। इस योजना में उनकी व्यक्तिगत संपत्तियों और उपलब्ध वित्तीय संसाधनों को ध्यान में रखते हुए सीमित भुगतान की पेशकश की गई।
रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित ₹6.50 करोड़ में करीब ₹2.50 करोड़ बैंक बैलेंस और ₹4 करोड़ सूचीबद्ध शेयरों की बिक्री से जुटाने की बात थी।
NCLT में दो सदस्यों की राय अलग-अलग थी
इस मामले की सुनवाई के दौरान NCLT की मूल पीठ के दो सदस्यों के बीच repayment plan को लेकर मतभेद सामने आया। एक सदस्य योजना को मंजूरी देने के पक्ष में था, जबकि दूसरे ने इसके कानूनी और प्रक्रियात्मक पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए।
मतभेद को दूर करने के लिए मामला तीसरे सदस्य के पास भेजा गया। 25 अगस्त 2026 को NCLT सदस्य निलेश शर्मा ने योजना को मंजूरी देने के पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद बहुमत के आधार पर repayment plan को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ।हालांकि, अंतिम औपचारिक आदेश के लिए मामला मूल पीठ के समक्ष रखा जाना है।
80.81% वोट से योजना को मिला था समर्थन
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि repayment plan को लेनदारों की बैठक में करीब 80.81% वोटिंग शेयर का समर्थन मिला था। IBC के तहत निर्धारित बहुमत के आधार पर योजना को आगे बढ़ाया गया।
कुछ बड़े बैंक और वित्तीय संस्थान इस योजना के विरोध में थे। इनमें LIC Housing Finance, HDFC Bank, Axis Bank, Canara Bank, RBL Bank, IDBI Trusteeship और Union Bank जैसे नाम शामिल बताए गए हैं।
यानी यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें सभी लेनदार योजना से सहमत थे। योजना को आवश्यक बहुमत मिलने के बावजूद कुछ संस्थाओं ने इसकी बेहद कम recovery को लेकर आपत्ति जताई।
LIC Housing Finance को ₹1,322 करोड़ के दावे पर कितनी रकम?
इस मामले में LIC Housing Finance का उदाहरण नुकसान की तस्वीर को साफ करता है। कंपनी का स्वीकृत दावा करीब ₹1,322.39 करोड़ बताया गया है, जबकि repayment plan के तहत उसे करीब ₹38.09 लाख मिलने का अनुमान है।
इसका अर्थ है कि कंपनी की संभावित वसूली उसके दावे का बेहद छोटा हिस्सा होगी। यही कारण है कि लेनदारों ने NCLT के समक्ष repayment plan पर सवाल उठाए।
चंद्रा की संपत्ति को लेकर भी उठे सवाल
विरोध करने वाले लेनदारों ने सुभाष चंद्रा की संपत्ति और नेटवर्थ से संबंधित दस्तावेजों का भी हवाला दिया। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ दस्तावेजों में उनकी नेटवर्थ 2017 में करीब ₹45,888 करोड़ और 2018 में करीब ₹40,562 करोड़ बताई गई थी। दूसरी ओर, वर्तमान व्यक्तिगत नेटवर्थ करीब ₹31.79 करोड़ बताई गई।
यही अंतर लेनदारों के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल बना कि इतनी बड़ी पूर्व संपत्ति और कारोबारी साम्राज्य के बावजूद व्यक्तिगत insolvency में उपलब्ध संपत्ति इतनी कम कैसे रह गई।
हालांकि, NCLT ने केवल पुराने नेटवर्थ आंकड़ों के आधार पर repayment plan को खारिज नहीं किया। ट्रिब्यूनल ने कानूनी प्रक्रिया और वर्तमान उपलब्ध संपत्तियों को ध्यान में रखकर अपना निष्कर्ष दिया।
क्या इसे ‘कर्ज माफी’ कहना सही है?
इस फैसले के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में इसे “₹22 हजार करोड़ का कर्ज सिर्फ ₹6.5 करोड़ में खत्म” जैसे शब्दों में पेश किया जा रहा है। लेकिन कानूनी दृष्टि से इसे सीधे कर्ज माफी कहना सही नहीं होगा।
यह IBC के तहत व्यक्तिगत insolvency repayment plan है। इसमें लेनदारों के दावों के सामने देनदार द्वारा एक निर्धारित राशि का भुगतान प्रस्तावित किया गया है। योजना को लेनदारों के आवश्यक बहुमत का समर्थन मिला और NCLT के तीसरे सदस्य ने इसे मंजूरी देने के पक्ष में फैसला दिया।
IBC का उद्देश्य केवल अधिकतम वसूली करना ही नहीं, बल्कि insolvency मामलों को कानूनी ढांचे के भीतर समयबद्ध तरीके से निपटाना भी है। ऐसे मामलों में ट्रिब्यूनल को उपलब्ध संपत्तियों, प्रस्तावित भुगतान और लेनदारों की संभावित recovery जैसे पहलुओं पर विचार करना पड़ता है।
बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर असर
इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन वित्तीय संस्थानों पर पड़ेगा जिनके दावे repayment plan के तहत बहुत कम राशि में निपटेंगे। 99.97% के करीब haircut का अर्थ है कि स्वीकार किए गए दावों की तुलना में recovery बेहद कम होगी।
यह मामला बैंकिंग और insolvency व्यवस्था के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भविष्य में व्यक्तिगत गारंटी और promoter guarantees के मामलों पर बहस तेज हो सकती है।
सवाल यह भी उठेगा कि बड़े कारोबारी ऋणों में व्यक्तिगत गारंटी लेते समय ऋणदाता किस तरह जोखिम का आकलन करते हैं और डिफॉल्ट की स्थिति में व्यक्तिगत संपत्तियों से वास्तविक recovery कितनी संभव होती है।
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अब आगे क्या?
NCLT के तीसरे सदस्य की राय के बाद मामला अब औपचारिक आदेश के लिए मूल पीठ के सामने जाएगा। कुछ दावों की वैधता और दस्तावेजों की जांच के बाद लेनदारों की सूची में बदलाव भी हो सकता है। NCLT ने कुछ ऐसे दावों को हटाने का निर्देश दिया है जिन्हें पर्याप्त दस्तावेजों से समर्थित नहीं माना गया। इसके बाद ₹6.25 करोड़ की वितरण राशि पात्र लेनदारों के बीच दोबारा तय की जा सकती है।
इसलिए अंतिम वितरण में मामूली बदलाव संभव है, हालांकि वर्तमान योजना का मूल ढांचा लगभग ₹6.50 करोड़ के कुल भुगतान पर आधारित है।
निष्कर्ष
सुभाष चंद्रा से जुड़े इस मामले ने भारत की व्यक्तिगत insolvency व्यवस्था और बैंकिंग प्रणाली पर एक बड़ी बहस खड़ी कर दी है। करीब ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकृत दावों के सामने ₹6.50 करोड़ का repayment plan मंजूर किए जाने से लेनदारों की recovery लगभग 0.028% और haircut करीब 99.97% बैठता है।
लेकिन इसे महज “₹22 हजार करोड़ का कर्ज माफ” कहना कानूनी स्थिति को सरल बनाना होगा। यह IBC के तहत व्यक्तिगत insolvency और repayment plan की प्रक्रिया है, जिसे लेनदारों के आवश्यक बहुमत का समर्थन मिला और NCLT के तीसरे सदस्य ने मंजूरी के पक्ष में फैसला दिया।
अब निगाहें अंतिम औपचारिक आदेश और पात्र लेनदारों के बीच राशि के वितरण पर हैं। साथ ही, यह मामला आने वाले समय में इस बड़े सवाल को भी जन्म दे सकता है कि भारत की insolvency व्यवस्था में बड़े व्यक्तिगत गारंटरों से अधिकतम वसूली और समयबद्ध समाधान के बीच संतुलन किस तरह कायम किया जाए।

