देश के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को लेकर कॉकroach जनता पार्टी (CJP) ने एक बार फिर केंद्र में शिक्षा के मुद्दे को ला दिया है। संगठन के संस्थापक और संयोजक अभिजीत दीपके ने सोमवार को सभी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों को पत्र लिखकर सरकारी स्कूलों की आधारभूत संरचना, शिक्षकों की कमी और पिछले पांच वर्षों में शिक्षा पर हुए खर्च का विस्तृत आंकड़ा मांगा है। दीपके ने पत्र में सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि आजादी के 80 वर्ष बाद भी किसी बच्चे को ऐसी परिस्थितियों में पढ़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
CJP का कहना है कि देश के कई सरकारी स्कूलों में बच्चों को अब भी सुरक्षित पेयजल, काम करने वाले शौचालय, उचित कक्षाएं, बैठने के लिए बेंच और अन्य आवश्यक सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। संगठन ने इन समस्याओं को राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनाने के बजाय सार्वजनिक जवाबदेही और शिक्षा के अधिकार से जोड़ने की मांग की है।
सभी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों को भेजा पत्र
अभिजीत दीपके ने सभी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों को समान प्रारूप में पत्र भेजकर सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति से संबंधित आंकड़े मांगे हैं। CJP ने विशेष रूप से पिछले पांच वर्षों के दौरान स्कूलों में हुए नवीनीकरण और मरम्मत कार्यों की जानकारी मांगी है।
संगठन जानना चाहता है कि कितने सरकारी स्कूलों का पूरी तरह नवीनीकरण किया गया, कितने स्कूलों में मरम्मत की जरूरत अभी भी बनी हुई है और कितने स्कूल ऐसे हैं जिन्हें तत्काल बड़े स्तर पर सुधार या पूरी तरह पुनर्निर्माण की आवश्यकता है।
शिक्षक रिक्तियों का भी मांगा हिसाब
स्कूल भवनों और सुविधाओं के अलावा CJP ने शिक्षकों की उपलब्धता को भी महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है। संगठन ने राज्यों से सरकारी स्कूलों में स्वीकृत, भरे हुए और खाली शिक्षक पदों की संख्या का ब्योरा मांगा है।
इसके साथ ही यह जानकारी भी मांगी गई है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को शिक्षण के अलावा किन-किन गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जाता है। CJP का कहना है कि यदि शिक्षक लगातार गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों में व्यस्त रहेंगे, तो इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ सकता है।
CJP की बजट और वास्तविक खर्च पर पारदर्शिता की मांग
CJP ने राज्यों से पिछले पांच वर्षों में सरकारी स्कूलों के लिए कितना बजट आवंटित किया गया और उसमें से वास्तव में कितना खर्च किया गया, इसका विवरण भी मांगा है।
संगठन का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को समझने के लिए केवल स्कूलों की तस्वीरें या कुछ घटनाएं पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए राज्यवार आधिकारिक आंकड़े सामने आना जरूरी है। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि जिन स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है, वहां सरकारों की ओर से कितना पैसा उपलब्ध कराया गया और उसका उपयोग किस तरह हुआ।
शौचालय, पानी और डिजिटल सुविधाओं पर भी सवाल
CJP के पत्र में स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कई सवाल शामिल हैं। संगठन ने राज्यों से पूछा है कि कितने सरकारी स्कूलों में पर्याप्त और कार्यशील शौचालय हैं, कितने स्कूलों में साफ पेयजल उपलब्ध है और कितने स्कूलों में खेल सुविधाएं तथा खेल उपकरण मौजूद हैं।इसके अलावा कंप्यूटर और डिजिटल लर्निंग सुविधाओं से संबंधित आंकड़े भी मांगे गए हैं।
CJP का मानना है कि आधुनिक शिक्षा की बात करने से पहले स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना जरूरी है। यदि किसी बच्चे के पास बैठने के लिए बेंच, पीने के लिए साफ पानी या उपयोग करने योग्य शौचालय नहीं है, तो डिजिटल शिक्षा और भविष्य की तकनीकी शिक्षा की योजनाएं अधूरी रह जाती हैं।
CJP का आरोप- ‘बच्चों के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार’
अपने पत्र में अभिजीत दीपके ने सरकारी स्कूलों की स्थिति पर बेहद तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि देश को आजाद हुए 80 साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी कई बच्चे ऐसी परिस्थितियों में पढ़ रहे हैं जहां उन्हें मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिलतीं। उन्होंने लिखा कि “किसी बच्चे को ऐसी परिस्थितियों में पढ़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। उनके साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जा रहा है।”
हालांकि यह CJP का राजनीतिक-सामाजिक आरोप है और इसे सभी सरकारी स्कूलों की स्थिति का सार्वभौमिक वर्णन नहीं माना जा सकता। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की स्थिति अलग-अलग है। फिर भी, संगठन ने जिस तरह से बुनियादी सुविधाओं के राज्यवार आंकड़े मांगे हैं, उससे बहस को आंकड़ों और सार्वजनिक जवाबदेही की दिशा में ले जाने की कोशिश दिखाई देती है।
‘स्कूल ठीक करो’ अभियान से जुड़ा कदम
CJP का यह पत्र उसके ‘School Thik Karo’ अभियान का अगला चरण है। संगठन ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इस अभियान की शुरुआत करते हुए गांवों के सरकारी स्कूलों की स्थिति सामने लाने का आह्वान किया था। अभियान का उद्देश्य स्थानीय लोगों, अभिभावकों और पंचायत प्रतिनिधियों को सरकारी स्कूलों की समस्याओं के समाधान में भागीदार बनाना है।
इस अभियान के तहत संगठन ने स्कूलों का दौरा कर बुनियादी सुविधाओं की स्थिति दर्ज करने पर जोर दिया है। CJP के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में कई स्कूलों में पानी, बेंच, शौचालय, खिड़कियों और अन्य जरूरी सुविधाओं से संबंधित समस्याएं हैं।
विवादों के बीच अभियान
CJP का स्कूल अभियान ऐसे समय आगे बढ़ रहा है जब संगठन के कुछ कार्यकर्ताओं के स्कूल निरीक्षण को लेकर विवाद भी सामने आए हैं। राजस्थान में सरकारी स्कूल का निरीक्षण करने पहुंचे CJP कार्यकर्ताओं के साथ कथित मारपीट का मामला सामने आया था। संगठन ने इसके लिए भाजपा कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराया, जबकि आरोपों को लेकर राजनीतिक विवाद हुआ और दोनों पक्षों की ओर से प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी सामने आई।
इन घटनाओं के बावजूद CJP ने सरकारी स्कूलों की स्थिति को अपने प्रमुख मुद्दों में बनाए रखा है।
सिर्फ पैसे की कमी नहीं, इस्तेमाल पर भी सवाल
CJP के अभियान में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति के लिए केवल धन की कमी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है या नहीं। इससे पहले दीपके ने PM CARES Fund के उपयोग को लेकर भी सवाल उठाए थे और सुझाव दिया था कि ग्रामीण स्कूलों की आधारभूत संरचना सुधारने के लिए उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालांकि सरकारी स्कूलों की वित्तीय व्यवस्था कई अलग-अलग योजनाओं, केंद्र-राज्य हिस्सेदारी और विभागीय बजट पर निर्भर करती है। इसलिए किसी एक फंड को स्कूल सुधार का सीधा स्रोत मानने के बजाय व्यापक शिक्षा बजट और उसके इस्तेमाल का अध्ययन जरूरी है।
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आगे क्या होगा?
अब निगाहें इस बात पर हैं कि अलग-अलग राज्य सरकारें CJP के पत्र का क्या जवाब देती हैं और क्या वे मांगे गए आंकड़े सार्वजनिक करती हैं। यदि राज्यवार जानकारी सामने आती है तो इससे स्कूलों के नवीनीकरण, शिक्षक नियुक्ति, बजट खर्च और बुनियादी सुविधाओं की वास्तविक स्थिति का तुलनात्मक आकलन किया जा सकेगा।
CJP ने स्पष्ट किया है कि उसका मुद्दा किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है। अभिजीत दीपके ने कहा कि यह राजनीति से ज्यादा बच्चों के भविष्य का सवाल है और हर बच्चे को सुरक्षित कक्षा, साफ पानी, काम करने वाला शौचालय, बैठने की जगह और पढ़ाने वाला शिक्षक मिलना चाहिए।
निष्कर्ष
सरकारी स्कूलों की स्थिति पर CJP का नया पत्र शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की बहस को आगे बढ़ाता है। संगठन ने सभी राज्यों से पिछले पांच वर्षों में स्कूलों के नवीनीकरण, लंबित मरम्मत, शिक्षक रिक्तियों, बजट आवंटन और वास्तविक खर्च का आंकड़ा मांगा है। साथ ही शौचालय, पेयजल, खेल और डिजिटल सुविधाओं की उपलब्धता का भी ब्योरा मांगा गया है।
अभिजीत दीपके की तीखी टिप्पणी ने इस मुद्दे को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों बना दिया है, लेकिन असली महत्व इस बात का होगा कि राज्यों से मिलने वाले आंकड़े क्या तस्वीर सामने लाते हैं। यदि इन आंकड़ों के आधार पर कमजोर स्कूलों की पहचान कर समयबद्ध तरीके से सुधार किया जाता है, तो यह अभियान केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रहकर शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक बदलाव की दिशा में कदम साबित हो सकता है।
आखिरकार, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि चाहे जो हो, उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण में शिक्षा मिलना देश की शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी है।

