राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए भारत की समृद्ध और विविधतापूर्ण हथकरघा परंपरा को संरक्षित एवं प्रोत्साहित करने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत का हथकरघा क्षेत्र केवल वस्त्र निर्माण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक शिल्प कौशल और लाखों बुनकर परिवारों की आजीविका का आधार भी है।
उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि वे अधिक से अधिक हाथकरघा उत्पादों का उपयोग करें और स्थानीय बुनकरों का समर्थन करते हुए ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को जन-जन तक पहुंचाएं। प्रधानमंत्री का संदेश ऐसे समय आया है जब देशभर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रम, प्रदर्शनी, हस्तशिल्प मेले और जागरूकता अभियान आयोजित किए जा रहे हैं।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का महत्व
हर वर्ष 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य भारत की समृद्ध हथकरघा परंपरा, बुनकर समुदाय के योगदान और स्वदेशी वस्त्र उद्योग के महत्व को सम्मान देना है।
यह दिवस वर्ष 1905 में शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन की याद भी दिलाता है, जब भारतीयों ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी उत्पादों के उपयोग का संकल्प लिया था। आज भी हथकरघा उद्योग को आत्मनिर्भर भारत और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
प्रधानमंत्री मोदी का संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संदेश में कहा कि भारत की हथकरघा परंपरा विश्वभर में अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता, कलात्मकता और विविधता के लिए प्रसिद्ध है। उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न राज्यों में बनने वाली पारंपरिक साड़ियां, शॉल, दुपट्टे, कपड़े और अन्य हस्तनिर्मित वस्त्र भारतीय संस्कृति की जीवंत पहचान हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रत्येक हथकरघा उत्पाद अपने साथ किसी क्षेत्र की संस्कृति, इतिहास और बुनकरों की वर्षों पुरानी कला को भी समेटे होता है। इसलिए इन उत्पादों का उपयोग केवल खरीदारी नहीं बल्कि भारत की विरासत को सम्मान देने जैसा है।
मोदी ने बुनकरों के योगदान की सराहना की
प्रधानमंत्री ने देशभर के लाखों बुनकरों और शिल्पकारों के अथक परिश्रम की सराहना करते हुए कहा कि उनके कौशल ने भारतीय वस्त्र उद्योग को विश्व स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई है।
उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद बुनकर अपनी पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं और आने वाली पीढ़ियों तक इस विरासत को पहुंचा रहे हैं। ऐसे में प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह उनके उत्पादों को अपनाकर उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत करने में योगदान दे।
‘वोकल फॉर लोकल’ पर जोर
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में एक बार फिर ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि स्थानीय उत्पादों को अपनाना केवल आर्थिक निर्णय नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण कदम है।
उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि त्योहारों, पारिवारिक समारोहों और दैनिक जीवन में हाथकरघा उत्पादों को प्राथमिकता दें। इससे स्थानीय उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और भारत की पारंपरिक कला भी संरक्षित रहेगी।
भारत का विशाल हथकरघा उद्योग
भारत विश्व के सबसे बड़े हथकरघा उत्पादक देशों में शामिल है। देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग प्रकार की पारंपरिक बुनाई तकनीकें आज भी प्रचलित हैं।
उत्तर प्रदेश की बनारसी साड़ी, मध्य प्रदेश की चंदेरी, तेलंगाना की पोचमपल्ली, असम का मुगा सिल्क, तमिलनाडु की कांजीवरम, पश्चिम बंगाल की बालूचरी, गुजरात की पटोला, जम्मू-कश्मीर की पश्मीना और राजस्थान के पारंपरिक वस्त्र दुनिया भर में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं।
अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान
हथकरघा क्षेत्र देश के सबसे बड़े रोजगार उपलब्ध कराने वाले असंगठित क्षेत्रों में से एक है। लाखों बुनकर, कारीगर और उनके परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़े हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हथकरघा उद्योग को आधुनिक तकनीक, बेहतर विपणन और निर्यात सुविधाओं का पर्याप्त समर्थन मिले तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ भारत के निर्यात में भी उल्लेखनीय योगदान दे सकता है।
सरकार की पहल
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने हथकरघा क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। इनमें बुनकरों को वित्तीय सहायता, आधुनिक डिजाइन प्रशिक्षण, डिजिटल मार्केटिंग, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ने और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराने जैसी पहलें शामिल हैं।
इसके अलावा विभिन्न राज्यों में हथकरघा मेलों और प्रदर्शनी के माध्यम से स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का प्रयास भी किया जा रहा है।
युवाओं में बढ़ रही लोकप्रियता
हाल के वर्षों में भारतीय युवाओं के बीच पारंपरिक हथकरघा वस्त्रों की लोकप्रियता लगातार बढ़ी है। कई फैशन डिजाइनर भारतीय हस्तनिर्मित कपड़ों को आधुनिक परिधानों के साथ जोड़कर नए प्रयोग कर रहे हैं।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी हाथकरघा उत्पादों की मांग बढ़ी है। इससे बुनकरों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर मिला है और उनकी आय में भी सुधार देखने को मिला है।
पर्यावरण के लिए भी लाभकारी
विशेषज्ञों का कहना है कि हाथकरघा उद्योग पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मशीन आधारित बड़े उद्योगों की तुलना में हाथकरघा उत्पादन में ऊर्जा की खपत कम होती है और प्रदूषण भी अपेक्षाकृत कम होता है।
इसी कारण वैश्विक स्तर पर टिकाऊ (Sustainable) फैशन की बढ़ती मांग के बीच भारतीय हथकरघा उत्पादों की लोकप्रियता और बढ़ रही है।
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विशेषज्ञों की राय
हथकरघा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय उत्पादों के उपयोग को जनआंदोलन बनाया जाए तो इससे न केवल लाखों बुनकर परिवारों की आय बढ़ेगी बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान भी और मजबूत होगी।
उनका कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म, निर्यात प्रोत्साहन और आधुनिक डिजाइन के समन्वय से भारतीय हथकरघा उद्योग विश्व बाजार में और अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकता है।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश केवल शुभकामना नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था और स्थानीय उद्योगों को सशक्त बनाने का व्यापक आह्वान है। उन्होंने देशवासियों से हाथकरघा उत्पादों को अपनाने, स्थानीय बुनकरों का समर्थन करने और ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को जनआंदोलन बनाने की अपील की।
भारत की सदियों पुरानी हथकरघा परंपरा आज भी लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है और आधुनिक भारत में भी इसकी प्रासंगिकता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यदि नागरिक स्वदेशी हस्तनिर्मित उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं तो इससे न केवल बुनकरों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर भी आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकेगी।

