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भारत ने चीन के ‘अवैध कब्जे’ पर फिर जताई कड़ी आपत्ति, कहा- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के भारतीय क्षेत्रों में चीनी परियोजनाएं स्वीकार नहीं

भारत ने एक बार फिर चीन के कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों में चल रही चीनी परियोजनाओं पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के जिन क्षेत्रों पर चीन का कब्जा है, वे भारत का अभिन्न हिस्सा हैं, इसलिए वहां चीन द्वारा किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य या विकास परियोजना पूरी तरह अस्वीकार्य है। मंत्रालय ने दोहराया कि भारत अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े मुद्दों पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।

विदेश मंत्रालय की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब चीन ने हाल ही में भारत-चीन विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद जारी अपने आधिकारिक बयान में दावा किया था कि भारत चीन की संप्रभुता का सम्मान करता है। भारत ने इस दावे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के बयान को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नियमित प्रेस वार्ता में कहा कि भारत ने कभी भी चीन की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं किया है। इसके विपरीत, संप्रभुता का प्रश्न उठता है तो भारत ही वह देश है जिसे चीन द्वारा भारतीय क्षेत्रों पर अवैध कब्जे के कारण लगातार चिंता जतानी पड़ती है।

उन्होंने कहा कि चीन जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के उन इलाकों में परियोजनाएं चला रहा है जो भारत के हैं। भारत ने इन गतिविधियों पर हमेशा आपत्ति दर्ज कराई है और भविष्य में भी करता रहेगा।

चीन के बयान पर भारत की प्रतिक्रिया

हाल ही में फिलीपींस के मनीला में आयोजित एक बहुपक्षीय बैठक के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच बातचीत हुई थी। इसके बाद चीन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि भारत ने ताइवान और तिब्बत जैसे मुद्दों पर चीन की संप्रभुता का सम्मान करने की बात कही है।

भारत ने इस व्याख्या को गलत बताते हुए कहा कि विदेश मंत्री का आशय यह था कि संप्रभुता का मुद्दा वास्तव में भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि चीन भारतीय क्षेत्रों पर अवैध कब्जा बनाए हुए है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारतीय पक्ष के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।

भारतीय क्षेत्रों में चीनी परियोजनाओं पर आपत्तिभारत

विदेश मंत्रालय ने विशेष रूप से उन बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का उल्लेख किया जो चीन, भारत द्वारा दावा किए जाने वाले क्षेत्रों में चला रहा है। भारत का कहना है कि ऐसे किसी भी निर्माण या विकास कार्य से चीन के अवैध कब्जे को वैधता नहीं मिल सकती।

सरकार ने दोहराया कि वह इन परियोजनाओं को कभी मान्यता नहीं देती और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी लगातार अपना विरोध दर्ज कराती रही है।

भारत चीन सीमा विवाद की पृष्ठभूमि

भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। वर्ष 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ गया था। इसके बाद कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताएं हुईं, जिनके माध्यम से सीमा पर तनाव कम करने के प्रयास जारी हैं।

हालांकि, कई संवेदनशील क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच मतभेद अब भी बने हुए हैं। भारत लगातार यह कहता रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता दोनों देशों के संबंधों के सामान्य होने की पहली शर्त है।

भारत का स्पष्ट रुख

भारत की नीति लंबे समय से यह रही है कि अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न अंग हैं। सरकार का कहना है कि इन क्षेत्रों में किसी भी तीसरे देश की गतिविधि या बयान भारत की स्थिति को प्रभावित नहीं कर सकता।

विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि भारत अपनी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाता रहेगा।

भारत चीन के बीच कूटनीतिक संवाद जारी

तनाव के बावजूद भारत और चीन के बीच उच्चस्तरीय कूटनीतिक संपर्क जारी हैं। दोनों देशों के विदेश मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और सैन्य अधिकारी समय-समय पर बातचीत करते रहे हैं ताकि सीमा पर शांति बनाए रखी जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि संवाद जारी रहना सकारात्मक संकेत है, लेकिन सीमा विवाद के स्थायी समाधान के लिए दोनों पक्षों को पारस्परिक विश्वास और स्पष्ट प्रतिबद्धता दिखानी होगी।

विशेषज्ञों की राय

विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की हालिया प्रतिक्रिया केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट संदेश है कि देश अपनी संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर किसी भी प्रकार की अस्पष्टता स्वीकार नहीं करेगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, चीन द्वारा जारी आधिकारिक बयानों का तथ्यात्मक जवाब देना भारत की कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है, ताकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने भारत की स्थिति स्पष्ट बनी रहे।

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क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व

भारत-चीन संबंध केवल द्विपक्षीय स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एशिया और वैश्विक राजनीति पर भी उनका व्यापक प्रभाव पड़ता है। दोनों देश विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियों में शामिल हैं। ऐसे में सीमा विवाद, व्यापार, सुरक्षा और कूटनीति से जुड़े मुद्दों का समाधान क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि संवाद और सीमा पर शांति बनाए रखने के साथ-साथ दोनों देशों को संवेदनशील मुद्दों पर जिम्मेदार और तथ्यपरक सार्वजनिक बयान देने की भी आवश्यकता है।

निष्कर्ष

भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के जिन क्षेत्रों पर चीन का कब्जा है, वे भारतीय क्षेत्र हैं और वहां किसी भी प्रकार की चीनी परियोजना को नई दिल्ली स्वीकार नहीं करती। विदेश मंत्रालय ने चीन के दावों का खंडन करते हुए कहा कि भारत हमेशा अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करता आया है और भविष्य में भी इसी नीति पर कायम रहेगा।

सीमा विवाद के समाधान के लिए कूटनीतिक संवाद जारी है, लेकिन भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय हित और संप्रभुता के प्रश्न पर उसका रुख अडिग रहेगा।

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PandeyAbhishek
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Abhishek Pandey is a skilled news editor with 4-5 years of experience in the field, he covers mostly political, world news, sports and etc.
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