भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई से इनकार किए जाने संबंधी मीडिया रिपोर्टों को सख्त शब्दों में खारिज करते हुए उन्हें “लापरवाह” (Reckless) और तथ्यात्मक रूप से गलत बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष कोई विधिवत रिट याचिका दायर ही नहीं की गई थी, इसलिए यह कहना गलत है कि अदालत ने किसी याचिका की सुनवाई से इनकार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश ने खुली अदालत में कहा कि पिछले कुछ दिनों से ऐसी खबरें प्रसारित की जा रही हैं जिनमें दावा किया गया कि उन्होंने छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका को सूचीबद्ध करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वास्तविकता यह है कि अदालत में कोई औपचारिक याचिका दाखिल नहीं हुई थी और केवल एक प्रतिनिधित्व (Representation) का उल्लेख किया गया था।
क्या कहा मुख्य न्यायाधीश(CJI) ने?
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि मीडिया में यह कहना कि अदालत ने याचिका स्वीकार नहीं की, पूरी तरह गलत है।
उन्होंने कहा कि सुबह 10 बजे तक अदालत की रजिस्ट्री में इस मामले से संबंधित एक भी पृष्ठ औपचारिक रूप से दाखिल नहीं किया गया था। उनके अनुसार, केवल एक पत्र या प्रतिनिधित्व भेजा गया था, जिसे कानून के अनुसार स्वतः रिट याचिका नहीं माना जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि किसी प्रतिनिधित्व को बिना विधिक प्रक्रिया पूरी किए सीधे रिट याचिका का दर्जा नहीं दिया जा सकता और ऐसी परिस्थितियों में यह कहना कि अदालत ने सुनवाई से इनकार कर दिया, तथ्यात्मक रूप से गलत है।
विवाद कैसे शुरू हुआ?
कुछ दिन पहले एक अधिवक्ता ने सर्वोच्च न्यायालय में मौखिक रूप से आग्रह किया था कि दिल्ली में छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा कथित बल प्रयोग के मामले में अदालत स्वतः संज्ञान लेकर तत्काल सुनवाई करे।
वकील ने दावा किया था कि उनके पास पुलिस कार्रवाई से जुड़े वीडियो भी हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि अदालत इस स्तर पर वीडियो देखने के लिए इच्छुक नहीं है और उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। इस टिप्पणी के बाद विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह खबर चलने लगी कि अदालत ने याचिका सुनने से इनकार कर दिया।
“प्रतिनिधित्व और याचिका में अंतर”
मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि किसी भी मामले में न्यायालय तभी सुनवाई कर सकता है जब निर्धारित प्रक्रिया के तहत विधिवत याचिका दाखिल की जाए।
उन्होंने कहा कि केवल एक पत्र या प्रतिनिधित्व भेज देना पर्याप्त नहीं होता। अदालत के समक्ष याचिका दाखिल करने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया, आवश्यक दस्तावेज और रजिस्ट्री में पंजीकरण अनिवार्य होता है।
CJI ने की मीडिया की भूमिका पर टिप्पणी
CJI सूर्यकांत ने इस अवसर पर मीडिया की भूमिका पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग करते समय तथ्यों की पुष्टि करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि बिना यह जांचे कि वास्तव में अदालत में याचिका दायर हुई भी है या नहीं, यह प्रकाशित कर देना कि अदालत ने सुनवाई से इनकार कर दिया, जिम्मेदार पत्रकारिता के अनुरूप नहीं है। उन्होंने ऐसी रिपोर्टिंग को “लापरवाह” बताया।
छात्र प्रदर्शन की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद हाल ही में दिल्ली में छात्रों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। प्रदर्शनकारी परीक्षा प्रणाली में सुधार, कथित पेपर लीक मामलों की निष्पक्ष जांच और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग कर रहे थे।
प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प की घटनाएं सामने आई थीं। पुलिस का कहना था कि कुछ प्रदर्शनकारी सुरक्षा बैरिकेड पार करने का प्रयास कर रहे थे, जबकि प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाया था। इन घटनाओं के बाद न्यायिक हस्तक्षेप की मांग उठी।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को स्पष्ट करती है। उनके अनुसार, अदालत किसी मामले पर तभी औपचारिक रूप से विचार करती है जब वह निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मौखिक उल्लेख (Mentioning) और विधिवत दायर याचिका (Filed Petition) के बीच स्पष्ट अंतर होता है, जिसे समझना आवश्यक है।
न्यायपालिका की प्रक्रिया पर जोर
मुख्य न्यायाधीश ने अपने वक्तव्य के माध्यम से यह संकेत दिया कि सर्वोच्च न्यायालय में प्रत्येक मामले के लिए निर्धारित संवैधानिक और प्रक्रियात्मक व्यवस्था का पालन आवश्यक है। यदि कोई पक्ष अदालत से राहत चाहता है तो उसे निर्धारित प्रारूप में याचिका दायर करनी होगी।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका के बारे में गलत सूचनाएं फैलने से लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है, इसलिए तथ्यात्मक रिपोर्टिंग अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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अब आगे क्या?
यदि संबंधित पक्ष इस मामले में विधिवत रिट याचिका दाखिल करता है, तो सर्वोच्च न्यायालय उस पर कानून के अनुसार विचार कर सकता है। फिलहाल मुख्य न्यायाधीश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब तक ऐसा कोई औपचारिक मामला अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया था।
इस बीच छात्र आंदोलन, परीक्षा सुधार और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक बहस जारी है तथा विभिन्न मंचों पर इन विषयों को लेकर चर्चा हो रही है।
निष्कर्ष
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि छात्र प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किसी विधिवत दायर याचिका की सुनवाई से इनकार नहीं किया, क्योंकि अदालत के समक्ष ऐसी कोई याचिका प्रस्तुत ही नहीं की गई थी। उन्होंने मीडिया रिपोर्टों को भ्रामक बताते हुए जिम्मेदार रिपोर्टिंग की आवश्यकता पर जोर दिया।
यह घटनाक्रम न्यायिक प्रक्रिया की औपचारिकताओं, मीडिया की जवाबदेही और संवेदनशील मामलों में तथ्यात्मक जानकारी के महत्व को एक बार फिर रेखांकित करता है।

