अर्जुन की मृत्यु पर क्यों ठहाके लगाने लगी देवी गंगा?

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अर्जुन की मृत्यु का असल सच्च, एक नही दो बार हुई थी मृत्यु

देहरादून ब्यूरो। महाभारत का युद्ध जीतने में श्री कृष्ण के दिमाग और धनुर्धर अर्जुन के पराक्रम ने एक अहम भूमिका निभाई थी। यदी महाभारत के युद्ध में पांडवों की ओर से श्री कृष्ण और अर्जुन न लड़ रहे होते तो शायद पांडवों की जीत होना मुमकिन था। लेकिन क्या आपको मालूम है कि महाभारत के युद्ध में अहम भूमिका निभाने वाला अर्जुन स्वर्ग यात्रा में जाने से पहले भी एक बार मर चुका था इसका मतलब ये है कि अर्जुन की अपने जीवन में दो बार मृत्यु हो चुकी थी और उनकी मृत्यु के दौरान देवी गंगा ज़ोर ज़ोर से ठहाके लगाने लगी। मगर क्यों..क्यों अर्जुन की मृत्यु पर..मां कुंती के रोने पर देवी गंगा हंसने लगी। क्यों खुद भी एक मां होने के बावजूद देवी गंगा दूसरी मां के दुख पर ठहाके लगा रही थी।

अश्वमेघ यज्ञ का अर्जुन की मृत्यु से क्या है लेना?

महाभारत के युद्ध में जब पांडवों की जीत हुई तो हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर। इसके बाद श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुझाव दिया अश्वमेघ यज्ञ कराने का जिसके बाद युधिष्ठिर ने अश्वमेघ यज्ञ को आरम्भ करते हुए अश्व को अर्जुन के नेतृत्व में रवाना कर दिया। अब जिस दिशा में अश्व चलता जाता उसी के पीछे पीछे अर्जुन और उनकी सेना भी चलती जाती। इस दौरान ये अश्व कई राज्यों से गुजरा।

जिन भी राज्यों से वो अश्व गुजरा उन सभी राज्यों के साथ अर्जुन ने युद्ध लड़ा। कई राजाओं ने तो पहले ही अर्जुन के आगे घुटने टेक दिए लेकिन कई राजाओं ने ऐसा नही किया जिसके बाद अर्जुन और उनकी सेना द्वारा युद्ध लड़ा गया और कई राजाओं को परास्त करते हुए अर्जुन उनके राज्यों को जीतते चले गए।  

अर्जुन और बभ्रुवाहन के बीच युद्ध

अर्जुन की मृत्यु
अर्जुन की मृत्यु

अर्जुन की मृत्यु से पहले क्या हुआ था?

ऐसे कई राज्यों को अपने अधीन करते हुए अर्जुन मणिपुर पहुंचें जहां पर उनका सामना होना था बभ्रुवाहन से। आपको बता दें कि बभ्रुवाहन अर्जुन और चित्रांगदा के पुत्र थे और अपने पिता अर्जुन के उनके राज्य में पधारने से वे काफी उत्साहित थे। उन्होंने युद्ध के बारे में कुछ सोचा ही नही और अपने पिता अर्जुन के स्वागत के लिए वे राज्य की सीमा पर जा पहुंचे। लेकिन जैसे ही बभ्रुवाहन अर्जुन का स्वागत करने के लिए आगे बढ़े वैसे ही अर्जुन ने उन्हें रोकते हुए कहा कि मै इस समय तुम्हारा पिता नही बल्कि हस्तिनापुर के नरेश का प्रतिनिधि हूं और क्षत्रिय होने के अनुसार इस समय तुम्हें मेरे साथ युद्ध लड़ना चाहिए।

अर्जुन की दूसरी पत्नी उलूपी

बस उसी समय अर्जुन की दूसरी पत्नी उलूपी वहां आती है और बभ्रुवाहन से बोलती है कि हे पुत्र तुम्हे अपने पिता के साथ युद्ध लड़ना चाहिए यदी तुम युद्ध नहीं लड़ोगे तो इसमें तुम्हारे पिता का ही अपमान होगा। माता की आज्ञा पाते ही बभ्रुवाहन युद्ध के लिए तैयार हो जाता है और अर्जुन और बभ्रुवाहन के बिच युद्ध छिड़ जाता है। ये युद्ध काफी समय तक चलता है मगर इस युद्ध का कोई परिणाम न निकलने के कारण बभ्रुवाहन कामाख्या देवी से प्राप्त दिव्य बाण का इस्तेमाल करते हुए अर्जुन पर प्रहार करता है जिससे अर्जुन का सर धड़ से अलग हो जाता है और अर्जुन की मृत्यु हो जाती है।

अर्जुन की मृत्यु पर हंसी देवी गंगा

अर्जुन की मृत्यु, arjun ki maut

साक्षात अर्जुन की मृत्यु देख हस्तिनापुर की सेना सुन्न हो जाती है और इसकी सूचना तुरंत श्री कृष्ण तक और हस्तिनापुर तक पहुंचाई दाती है। मणिपुर पहुंचकर श्री कृष्ण और माता कुंति अर्जुन को धरती पर पड़ा देखते हैं जिसके बाद माता कुंति अर्जुन का सर अपनी गोद में रखकर फूटफूट कर रोने लगती है और बस इसी दौरान देवी गंगा अर्जुन की मृत्यु पर मुस्कुराने लगी और जब काफी देर तक माता कुंती रोती रही तो देवी गंगा माता कुंति से कहती है- हे कुंती तुम व्यर्थ में रो रही हो क्यूंकि तुम्हारे पुत्र अर्जुन को उसके कर्मो का फल मिला है।

मेरा पुत्र भीष्म अर्जुन को अपने पुत्र की तरह स्नेह करता था मगर फिर भी इसने श्रीखंडी का सहारा लेकर मेरे पुत्र भीष्म का वध कर डाला। मैं भी उस समय ऐसे ही रोई थी जैसे तुम आज अपने पुत्र के लिए रो रही हो। मैंने अपने पुत्र के वध का बदला ले लिया। क्यूंकि जिस कामाख्या देवी के बाण से बभ्रुवाहन ने अर्जुन का सिर धड़ से अलग किया है वो मेरे द्वारा ही प्रदान किया गया था।

अर्जुन की मृत्यु से कैसे देवी गंगा की बदले की आग हुई ठंडी?

देवी गंगा के शब्दों में बदले की भावना झलक रही थी और देवी गंगा की इस बदले की भावना को देखते हुए श्री कृष्ण हैरान हो गए। और देवी गंगा से बोले हे देवी आप किस बदले की बात कर रही हैं ,आप किस किस से बदला लेंगी.. अर्जुन की माता कुंती से या फिर अर्जुन से, आप एक माता से प्रतिशोध कैसे ले सकती है। ये सुनकर देवी गंगा ने कृष्ण से कहा.. हे वासुदेव ये तो आप जानते ही हैं की अर्जुन ने उस समय मेरे पुत्र का वध किया जब वो निहत्था था। जब अर्जुन का ऐसा करना उचित था तो अर्जुन का वध उसी के पुत्र द्वारा करा कर मैंने क्या गलत किया।

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फिर श्री कृष्ण देवी गंगा को समझाते हुए कहते हैं कि पितामह ये भलिभांति जानते थे कि यदि वह जिंदा रहेंगे तो उन्हें कौरवों की तरफ से युद्ध मैदान में आना होगा और ऐसे में पांडवों की जीत होना नमुमकिन था इसलिए उन्होंने खुद को मार्ग से हाटाने का निर्णय लिया और अर्जुन को वो स्थिति बताई जिसमें वो अपने पितामह की मृत्यु कर सके। यहां तक की जब अर्जुन का मुकाबला उनके पुत्र बभ्रुवाहन से हो रहा था तो उस समय भी उन्होंने बभ्रुवाहन पर प्रहार न किया बस बभ्रुवाहन के प्रहारों को रोके रखा और साथ ही बभ्रुवाहन को कामाख्या देवी द्वारा दिए गए दिव्य बाण की लाज़ रखने के लिए अपने प्राणों की आहूती दे दी।

अर्जुन की मृत्यु पर अब क्यों पछताई देवी गंगा?

अब श्री कृष्ण द्वारा दिए गए तत्थों को सुनकर देवी गंगा सोच में पड़ गईं और उन्होंने श्री कृष्ण से अर्जुन को पुनः जीवित करने का मार्ग पूछा जिसके बाद श्री कृष्ण देवी गंगा को उनकी प्रतिज्ञा वापिस लेने को कहते हैं। जिसके बाद देवी गंगा ने अपनी प्रतिज्ञा वापिस ली और अर्जुन का सर धड़ से जोड़ दिया। मगर अब भी अर्जुन के प्राण वापिस न आए थे जिसके बाद श्री कृष्ण ने अर्जुन की दूसरी पत्नि से नागमणि लेकर अर्जुन को पुनः जीवित कर दिया।