देहरादून ब्यूरो। ऊंचे ऊंचे पहाड़ हो, सर्द हवाएं चल रही हो और इन खूबसूरत वादियों के बीच आप गर्मागर्म चाय की चुसकी ले रहे हों। सुनकर ही मज़ा आ रहा है न। पहाड़ों में अक्सर आप सभी ने चाय का लुफ्त तो जरूर उठाया होगा और अगर आप उत्तराखंड के किसी गांव में चले जाएं तो वहां तो आपको स्टील के ग्लास में भरकर चाय दी जाएगी। मगर क्या आपको मालूम है कि ये स्वादिष्ट चाय उत्तराखंड कैसे पहुंची, भारत कैसे पहुंची और इससे भी बड़ा सवाल कि इसका आविश्कार कैसे हुआ।

बात है 2732 BC की, चीन के राजा शेन नुंग अपने बगीचे में बैठकर गर्म पानी पी रहे थे, बस उसी समय वहां मौजूद एक पेड़ की तहनी से एक पत्ता उड़कर आया और राजा के उस प्याले में गिर गया जिससे वो पानी पी रहे थे। तभी राजा को उनके पानी में से एक अलग खुशबु आती है, जिसके बाद उन्हें उस पानी के रंग में थोड़ा बदलाव नज़र आता हैं और वो उस बदले हुए पानी का एक सिप लेते हैं जो कि उन्हें बेहद पसंद आता है और बस इसी के बाद से चाय का आविश्कार होता है। आपको बता दें कि चाय का नाम भी राजा शेन नुंग ने ही दिया है। पहली बार शेन नुंग ने चाय को चा.आ कहा। चा.आ एक चीनी अक्षर हैं जिसका मतलब परखना या फिर खोजना होता है।

इसके बाद चीन में चाय की ज्यादा से ज्यादा खेती होने लगी और चीन पूरे विश्व भर में चाय बेचने लगा और खूब पैसा कमाने लगा। अब अंग्रेज़ों ने जब पहली बार चाय पी तो उन्हें ये इतनी पसंद आई की वो चीन से काफी मात्रा में चाय खरीदने लगे। अंग्रेजों को चाय की ऐसी लत लगी वो इसे छोड़ न पाए। वहीं चीन से चाय खरीदने से उनकी जेब काफी ढीली हो रही थी, क्योंकी लंबे समुद्री रस्तों से निर्यात होने वाली चाय काफी महंगी पड़ रही थी। अब अंग्रजी दिमाग में कुछ खुरापात चल रहा था। क्योंकी चीन किसी भी देश को चाय के पौधे उगाने का राज नही बताता था, वो अकेला ऐसा देश था जो चाय की खेती कर पूरे विश्व में चाय बेचता था। इसलिए अंग्रेजों के दिमाग में एक Idea आया, वो Idea था चीन से चाय की पौध चुराने का और उनकी चाय उगाने की तकनीक सीखने का। बताया जाता है कि इस काम के लिए East India Co. द्वारा एक जासूस को चीन भेजा गया। इस जासूस का नाम था रॉबर्ट फॉर्च्यून जो चीन जाकर चाय की पौध और इसकी खेती की तकनीक को चुराने में कामयाब हो गया, जिसके बाद अंग्रजों द्वारा चाय की पैदावार की जाने लगी और इसे पूरे विश्व में बेचा जाने लगा।

अब बात करते हैं कि चाय़ आखिरकार भारत में कैसे आई। दरअसल चाय के पौधे भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में पहले से ही जगंली घास के रूप मौजूद थे। मगर किसी को मालूम नही था की ये चाय के पौधे हैं। असम के लोग इन पत्तियों को पानी में उबालकर दवाई की तरह इस्तमाल किया करते थे। जब 1834 में गवर्नर जनरल लॉर्ड बैंटिक ने इन लोगों को इसे दवाई की तरह पीते देखा तो उन्होंने एक समिती का गठन किया और असम के लोगों को चाय के बारे में जानकारी दी। जिसके बाद 1835 में असम में चाय की खेती शुरू की गई और इसी समय के आसपास ही उत्तराखंड में भी चाय की खेती शुरू की गई थी। इससे पहले 1827 में सहारनपुर के सरकारी वानस्पतिक उद्दान में अधीक्षक के रूप में कार्यरत डॉ रॉयल ने सरकार से कुमाऊं की ऐसी जमीने मांगी जो बंजर पड़ी थी। डॉ रॉयल का मानना था कि उत्तराखंड की ठंडी जलवायु के कारण यहां उगाई जाने वाली चाय बेहद स्वादिष्ट होगी।

फिर 1834 में गर्वनर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा एक समिति बनाई गई, जिसमें विशेषज्ञों द्वारा उपजाऊ जमीन का चुनाव किया गया और इसके बाद चाय की खेती में मदद के लिए चीन से चाय के Specialists बुलाए गए। 1834 में ही इस समिती द्वारा चाय की नर्सरी के लिए प्रशिक्षण हेतू देहरादून को चुना गया। देहरादून में राजपुर रोड और मसूरी के बीच झड़ीपानी में प्रशिक्षण केंद्र तैयार किया गया। इसके बाद 1835 में कलकत्ता से चाय के करीबन 2 हजार पौधे मंगवाए गए, जिन्हें अल्मोड़ा के लक्ष्मेश्वर और भीमताल में भरतपुर की नर्सरी में लगाया गया। इसी वर्ष ही गढ़वाल के टिहरी में भी चाय की कई पौधशालाओं का निर्माण कराया गया।

वहीं 1843 में पौड़ी और गडोलिया में कैप्टन हडलस्टन चाय की खेती शुरू कर चुके थे और इसके अगले साल ही देहरादून के कौलागीर में करीब 400 एकड़ भूमि में सरकारी चाय बागान की स्थापना हुई। धीरे धीरे उत्तराखंड में चाय की खेती और उत्पादन तेजी से बढ़ने लगा और साल 1843 में जहां कुमाऊं में चाय का कुल उत्पादन 190 पोंड था वहीं अगले साल ये बढ़कर 375 पोंड हो गया था।

वहीं आपको ये जानकर खुशी होगी कि उस समय उत्तराखंड और खासकर के अल्मोड़ा में पैदा होने वाली ये चाय असम और दार्जिलिंग में पैदा हो रही चाय से कई ज्यादा बेहतर मानी गई थी। जब इस चाय की पौधें इंग्लैण्ड भेजी गईं तो वहां के लोगों को ये काफी पसंद आई, यहां तक की ये चाय चीन की विश्वप्रसिद्ध ओलांग चाय को टक्कर दे रही थी।

अब यहां की चाय का नशा अंग्रजों के सिर ऐसा चढ़ा की ब्रिटेन के कई परिवार यहां आकर बस गए। 1830 से 1856 के बीच ब्रिटेन से कई परिवार रानीखेत, भवाली, अल्मोड़ा, कौसानी, दूनागिरी, बिनसर, मुक्तेश्वर और रामगढ़ जैसी जगहों में बसने लगे। अब इन सभी परिवारों को सरकार द्वारा चाय एवं फलों की खेती के लिए जमीनें भेंट स्वरूप दी गई। इन ब्रिटिश परिवारों को चाय की खेती के लिए जो जमीनें भेंट स्वरूप दी गई उन्हें फ्री सैम्पल स्टेट कहा गया। अब 1965 तक इन इलाकों में चाय का उत्पादन अच्छा खासा हुआ, लेकिन स्वाद में सबसे अव्वल दर्जें की चाय के उत्पादन में पूर्णविराम लगना तब शुरू हुआ जब काठगोदाम और बरेली के बीच रेल यातायात शुरू हुआ। इस रेल का मुख्य उदेश्य था पहाड़ों में पैदा होने वाले उत्पादों को बाहर भेजना। अब लोगों को चाय के मुकाबले फलों में ज्यादा मुनाफा होने लगा, जिसके बाद धीरे धीरे चाय की खेती कम होने लगी और फलों की ज्यादा।

इसके बाद साल 2004 में उत्तराखंड में चाय विकास बोर्ड का गठन किया गया और 2021 तक उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड ने प्रदेश के नौ जिलों में चाय के नए बागान विकसित करने के लिए 48 हजार हेक्टेयर जमीन का चयन किया। वहीं चमोली जिले में कई जगहों पर ग्रीन टी का भी उत्पादन किया जा रहा है, जिसकी मार्केट में काफी ज्यादा डिमांड है।