देहरादून, ब्यूरो। 22 साल के हो चुके उत्तराखंड को पृथक राज्य बनाने में मातृशक्ति का बड़ा योगदान है। राज्य निर्माण के दौरान कई महिलाओं ने आबरू और जान तक की परवाह न करते हुए संघर्ष किया। रामपुर तिराहा कांड की अगर किसी को याद हो तो शायद समझ में आ जाएगा कि राज्य के निर्माण में महिलाओं का कितना महत्वपूर्ण योगदान है। ऐसे में विधानसभा चुनाव में भी महिलाओं की भागीदारी होनी चाहिए। लेकिन, कोई भी पार्टी महिलाओं को अभी तक उचित संख्याबल के हिसाब से प्रतिनिधित्व नहीं दे पाई है।

हालांकि महिला उम्मीदवार कई बार हारने के कारण भी विधानसभा की दहलीज तक नहीं पहुंची हैं, लेकिन अगर पार्टियां महिलाओं को अधिक टिकट देने के साथ ही उनके लिए कैंपेन आदि करें तो महिलाएं भी विधानसभा और लोकसभा में आसानी से पहुंच सकती हैं। फिलहाल उत्तराखंड की बात करें तो यहां अभी इस पिछले विधानसभा चुनाव में राज्य की 70 सीटों में से मात्र 5 महिलाएं ही चुनाव जीतककर यहां पहुंच पाई हैं। वहीं, इसके बाद हुए उपचुनाव में भी दो महिलाएं निर्वाचित हुई हैं। इस तरह 70 में से 7 यानि 10 प्रतिशत महिलाएं फिलहाल विधानसभा में मौजूद हैं। दूसरी ओर अब फिर से राज्य में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। ऐसे में महिला मतदाता एक बहुत बड़ा तबका राज्य में है। कहीं न कहीं आधी दुनिया का दर्जा महिलाओं को इसीलिए दिया जाता है।

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अब देखना होगा कि कौन सी पार्टी महिलाओं को अधिक से अधिक टिकट देकर मैदान में उतार कर उन्हें प्रोत्साहित करने के साथ ही पुरुष प्रधान इस वर्तमान समाज में कोई नई पहल करती है। या फिर पहले ही की तरह महिलाएं चाहे प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भी बन जाएं काम सारा पति को ही संभालना वाली स्थिति भी कई बार महिलाओं के सामने देखने को मिलती हैं। हालांकि यह कोई अपवाद हो सकता है। लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में अक्सर ऐसा देखने को मिलता है, जब डीएम को महिला प्रधान का पति फोन कर प्रधान पति बोल रहा हूं या बीडीसी मेंबर पति या जिला पंचायत सदस्य पति बोल रहा हूं वाले किस्से अक्कसर सुने और देखे जा सकते हैं। कहीं न कहीं आधी आबादी को अपनी सोच और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ राजनीति में अपनी योग्यता के अनुसार आगे आना चाहिए। अब देखना होगा कि प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस कितनी महिलाओं को प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारती हैं।

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