केदारनाथ और यमुनोत्री में क्यों जान गंवा रहे बेजुबान, चंद दिन में 400 से ज्यादा मरे

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केदारनाथ और यमुनोत्री में इस बीमारी से मर रहे घोड़े-खच्चर, इंसान ही नहीं बेजुबान भी केदारनाथ और यमुनोत्री में गंवा रहे जान

रुद्रप्रयाग/देहरादून, ब्यूरो। दो साल बाद सुचारू रूप से चल रही चारधाम यात्रा की शुरूआत में ही हार्ट अटैक से 104 लोगों की मौत हो चुकी है वहीं बेजुबान घोड़े-खच्चर भी असमय काल के गाल में समा रहे हैं। चार में से दो धाम केदारनाथ और यमुनोत्री की यात्रा में घोड़े-खच्चरों का अहम योगदान है, लेकिन संतुलित चारा, गुनगुना पानी और बहुत ज्यादा काम लेने के कारण घोड़े-खच्चरों की मौत हो रही है। कपाट खुलने के बाद अभी तक 400 से ज्यादा घोड़े-खच्चर अपनी जान गंवा चुके हैं। दूसरी ओर जिला प्रशासन के रिकाॅर्ड में अभी तक 86 घोड़े-खच्चरों की मौत होना दर्शाया गया है।

यमुनोत्री धाम में जहां इन जंगली जानवरों के लिए गर्म पानी के सोलर वाटर हिटर लगाए जा रहे हैं, वहीं केदारनाथ पैदल मार्ग पर अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हुई है। पशु विशेषज्ञों के अनुसार घोड़े खच्चरों की सबसे ज्यादा मौत बर्फ के ठंडे पानी और अत्यधिक काम के दबाव और सही समय पर चारा न मिलने के कारण हो रही है। ज्यादातर घोड़े-खच्चर पेट में तेज दर्द (शूल) से हो रही है।

केदारनाथ जाने के लिए गौरीकुंड से करीब 16 किमी पैदल तय करना पड़ता है। पूर्व में पैदल मार्ग के पड़ावों पर प्रशासन की ओर से गर्म पानी के टैंक बनाए गए थे। रखरखाव न होने के कारण अब वह अनुपयोगी हो गए हैं। इस कारण घोड़े-खच्चर बिना पानी के या बर्फीला पानी पीकर ये सफर तय कर रहे हैं। शरीर में पानी की कमी और असहनीय दर्द उनकी मौत का कारण बन रहा है। घोड़ा और खच्चर को रोजाना कम से कम 30 लीटर पानी पिलाया जाना जरूरी है। पैदल मार्ग पर घोड़ा-खच्चर के लिए चारा तो दूर उनके पीने के पानी की ही व्यवस्था नहीं हैं।

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केदारनाथ पैदल मार्ग पर प्रतिदिन पांच से छह हजार घोड़ा-खच्चर की आवाजाही होती है। लगभग 40 प्रतिशत श्रद्धालु घोड़ा-खच्चर से ही केदारनाथ पहुंचते हैं। इसके अलावा सामान ढोने का कार्य भी घोड़ा-खच्चर से ही होता है। इस वर्ष यात्रा के लिए 8200 घोड़ा-खच्चर का पंजीकरण हुआ है। जबकि, बिना पंजीकरण के भी हजारों घोड़ा-खच्चर पैदल मार्ग पर आवाजाही कर रहे हैं। इन घोड़ा-खच्चर की देखरेख के लिए पशुपालन विभाग की ओर से दो पशु चिकित्सक गौरीकुंड व एक सोनप्रयाग में तैनात किया गया है। लिनचोली व केदारनाथ में दो-दो पशुधन प्रसार अधिकारी तैनात है । समझा जा सकता है कि घोड़ा-खच्चर की कैसी देखरेख हो रही होगी।

रुद्रप्रयाग जिले में मुख्य पशु चिकित्साधिकारी रहे डा. रमेश चंद्र नितवाल के अनुसार गर्म पानी की व्यवस्था न होने के कारण पैदल मार्ग पर संचालक ग्लेशियर का पानी ही घोड़ा-खच्चर को पिलाने की कोशिश करते हैं। अक्सर घोड़े-खच्चर बर्फीले पानी को नहीं पीते, जिससे शरीर में पानी की कमी हो जाती है। केदानाथ मार्ग पर घोड़ा-खच्चर के खाने के लिए हरी घास भी उपलब्ध नहीं है, जिससे उन्हें भूसा, चना व गुड़ दिया जाता है। इससे उनकी आंतों में गांठ बन जाती है और मूत्र भी बंद हो जाता है। यही घोड़ा-खच्चर की मौत की मुख्य वजह है।

सरकारी रिकार्ड के अनुसार अब तक सिर्फ 86 घोड़ा-खच्चर की जान गई है। दरअसल, रिकार्ड में सिर्फ उन्हीं घोड़ा-खच्चर की मौत दर्ज की जा रही है, जिनका पंजीकरण हुआ है। घोड़ा संचालक गोविंद सिंह रावत कहते हैं कि प्रशासन की ओर से पंजीकरण बंद कर दिया गया था, जिस कारण हजारों घोड़ा-खच्चर बिना पंजीकरण के रह गए। ऐसे में घोड़ा-खच्चर के मरने पर उनका पोस्टमार्टम भी नहीं हो पा रहा। इसलिए विभाग के पास मृत घोड़ा-खच्चर का आकड़ा उपलब्ध नहीं है।

इस संबंध में मुख्य पशु चिकित्साधिकारी रुद्रप्रयाग डा. आशीष रावत के अनुसार गौरीकुंड समेत यात्रा मार्ग पर घोड़ा-खच्चर की नियमित जांच हो रही है। पेट फूलने से फेफड़े सीधे प्रभावित होते हैं और सांस लेने में दिक्कत आती है। इसे देखते हुए पशुपालन विभाग की ओर से पर्याप्त मात्रा में दवाइयां उपलब्ध कराई जा रही हैं। पैदल मार्ग पर सभी घोड़ा-खच्चर की मौत पेट फूलने व सांस लेने में दिक्कत आने से हुई।