देहरादून। (स्टेट हेड- पंकज गैरोला): उत्तराखंड मे दवाब की राजनीति थमने का नाम नहीं ले ही है। यहां सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सब जगह अपनी बाते मनाने के लिए दवाब की राजनीति चल रही है। पहले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने ट्वीट कर अपने हाईकमान पर दवाब बनया और अब शुक्रबार को यही कैबनेट बैठक में देखने को मिला।

देखा जाये तो उत्तराखंड की राजनीति भविष्य के लिए ये दवाब की राजनीति शुभ संकेत नहीं है। अपनी मांगों को मनवाने के लिए अस्थिरता पैदा करना कतई ठीक नहीं है। शुक्रवार को कैबनेट बैठक के बाद जिस तरह से चर्चाओं का बाजार गरमा गया था। वह बात पूरे प्रदेश में शायद ही कहीं छुपी हो। तमाम टीवी चैनल, अखबार और वैबसाइडस में यही ब्रेकिंग थी कि कैबनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने इस्तीफा दे दिया है। साथ ही यह भी ब्रेक होने लगा की उमेश शर्मा काऊ ने भी साथ में इस्तीफा दे दिया है। हरक सिंह की नाराजगी यह थी कि उनके विधानसभा क्षेत्र में मेडिकल कॉलेज का निर्माण होना है और उसका प्रस्ताव इस बैठक में नहीं रखा गया। बताया तो यह भी जा रहा है कि उनकी स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह रावत के साथ इस मुद्दे पर बहस भी हुई और वे बैठक छोड़कर चले गये। बैठक खत्म होने के बाद किसी भी मंत्री के पास बताने के लिए कुछ था ही नहीं। मुख्यमंत्री जी तो मीडिया में बिना कुछ बोले चले गये। लेकिन इस बीच दवाब की राजनीति काम आई। हरक सिंह की मांग भी कैबनेट बैठक में मान ली गई। साथ ही हरक सिंह के इस्तेफे की बात सुनते ही बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष विजय संकल्प रैली छोड़कर देहरादून लौट गये। पूरी रात मान मनोबल चलता रहा। यह भी संकेत मिले कि हरक सिंह रावत और उमेश शर्मा काऊ बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। लेकिन सुबह जब बयान आता है तो सब कुछ सामान्य बताया जाता है। खुद उमेश शर्मा काऊ ने कहा कि हरक सिंह रावत जी की जो मांग थी वो मान ली गई, हम बीजेपी में ही हैं और हरक सिंह रावत ने कोई इस्तीफा नहीं दिया। अब सवाल ये उठता है कि हरक सिंह की मांग इतनी बड़ी थी कि पांच साल पूरे होते- होते भी वह पूरी नहीं पा रही थी। या इसके पीछे ये मंशा थी हरक सिंह के मांग पूरी नहीं की जाये। भले ही हरक सिंह दवाब बनाने में कामयाब रहे। अब बस सवाल यही है कि ये दवाब की राजनीति कब तक होगी। इससे उत्तराखंड को कब निजात मिलेगा। दवाब की राजनीति में प्रदेश का भला हो रहा है या नेताओं का।

खैर ये तो चुनावी मौसम है सब खेल देखने को मिलेंगे। बस आखिर में यही सवाल छोड़कर जाते हैं कि कब तक चलेगी ये प्रेशर पॉलिटिक्स, कब खत्म होगा ये खेल, कब तक भोली भाली जनता के नाम पर अपने हीत साधे जायेंगे।

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