दल ही नहीं विधानसभा बदलने में भी ये सबसे आगे
दल बलदने में माहिर हैं हरक सिंह रावत, तीसरी बार हो रहे हैं कांग्रेस में शामिल

भाजपा, बसपा, कांग्रेस, भाजपा फिर कांग्रेस…यानी हरक सिंह!
दल बलदने में माहिर हरक सिंह, तीसरी बार पाला बदल कर कांग्रेस में आए
दल बदलने के साथ ही विधानसभाओं को बदलने में उस्ताद हैं हकर सिंह रावत
सत्ता की भूख और महत्वकांक्षाएं राजनेताओं पर हावी, चुनावी से पहले बदला पाला

देहरादून, ब्यूरो। पहले भाजपा फिर बसपा, उसके बाद कांग्रेस फिर भाजपा और अब फिर कांग्रेस। उत्तराखंड के कद्दावर नेता माने जाने वाले हरक सिंह रावत ने सत्ता का स्वाद चखने के लिए सत्ताधारी पार्टी से पाला बदलकर कांग्रेस में वापसी कर ली है। दल बदल का उनका यह दौर तीन दशकों से जारी है। हरक सिंह रावत उत्तराखंड की सियासत में वो नाम है जो कभी भी यहां की राजनीति में भू-चाल ला सकते हैं। उत्तराखंड बनने के बाद ही नहीं इससे पहले भी हरक सिंह राज्य में सियासी उठापटक करते रहे हैं। ये बोलना कहीं भी गलत नहीं होगा की हरक सिंह मौका भूनाने में कहीं भी पीछे नहीं रहते। विधानसभा चुनाव 2022 में अब सबकी नजर हरक पर टिकी हैं।

आखिर हरक सिंह रावत क्या करने जा रहे हैं। वैसे ये साफ था कि बीजेपी में शुरू से ही हरक सिंह रावत की दाल नहीं गल रही थी, लेकिन उनकी विधानसभा बदलने की चाहत और लगातार दबाव बनाने की राजनीति से परेशान हरक को बीजेपी ने ही पार्टी से छह सालों के लिए बर्खास्त कर दिया। बताया यह जा रहा है कि हरक सिंह रावत बीजेपी पर लगातार दबाव बना रहे थे कि उनकी पुत्रबधू अनुकृति गुसांई को लैंसडाउन से टिकट दिया जाये और उन्हें कोटद्वार की बजाय मन चाही जगह से, लेकिन बीजेपी ने न तो उनकी पुत्रबधू को टिकट देने को राजी हुई और न ही उन्हें। साफ कह भी दिया है कि हरक कोटद्वार से ही चुनाव लड़ेंगे। इस बात से हरक सिंह रावत खासा नाराज नजर चल रहे थे। इस नाराजगी को जाहिर करने के लिए हरक सिंह रावत बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक में भी एक दिन पहले शामिल नहीं हुए थे। इस बीच सोशल मीडिया में ये खबरें उड़ने लगी कि हरक सिंह रावत कांग्रेस ज्वाइन कर रहे हैं।

इसके बाद रविवार शाम तक हरक सिंह दिल्ली रवाना हो गये। इसके बाद अटकलों के बाजार को और हवा मिली। इस के बाद देर रात भाजपा के मीडिया प्रभारी ने बयान जारी कर हरक सिंह रावत को पार्टी से बर्खास्त कर दिया। अब यह माना जा रहा है कि हरक सिंह रावत अब एक बार फिर कांग्रेस में इंट्री कर रहे हैं। बीजेपी से बर्खास्त होने के बाद एक टीवी चैनल में उन्होंने साफ कहा था कि वह बिना शर्त के कांग्रेस में जा रहे हैं और कांग्रेस को जीताने के लिए काम करेंगे। यह तो था अब तक का घटनाक्रम, लेकिन हम हरक सिंह के राजनैतिक कैरियर पर नजर डालें तो वह लगातार दल बदलते रहे है।। आज इस दल में तो कल उस दल में। हरक सिंह रावत ने 1989 में पौड़ी सीट से भाजपा प्रत्याशी के रूप में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन जीत दर्ज नहीं कर पाए।

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इसके बाद 1991 के विधानसभा चुनाव में वह पौड़ी सीट से ही चुनाव जीत कर पहली बार विधायक बने। तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने उन्हें पर्यटन राज्य मंत्री बनाया। तब हरक सिंह रावत उत्तर प्रदेश सरकार में सबसे युवा मंत्री थे। 1993 का विधानसभा चुनाव भी उन्होंने पौड़ी विधानसभा सीट से जीता। तीन साल बाद 1996 में भाजपा में अंदरूनी मतभेदों के कारण उन्होंने पार्टी को अलविदा कह दिया। यह पहला मौका था जब हरक सिंह रावत ने दल बदला। भाजपा से नाता तोड़ने के बाद हरक बसपा में शामिल हो गए। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने उन्हें कैबिनेट मंत्री के दर्जे के साथ पर्वतीय विकास परिषद में उपाध्यक्ष का पद सौंपा…. इस पद पर वह केवल एक महीने रहे…. इसके बाद मायावती ने उन्हें कैबिनेट मंत्री के दर्जे के साथ उत्तर प्रदेश खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड और महिला और बाल विकास बोर्ड का अध्यक्ष बनाया। बसपा के टिकट पर वह 1998 के लोकसभा चुनाव में पौड़ी गढ़वाल सीट से मैदान में उतरे। हालांकि हरक यह चुनाव जीत तो नहीं पाए, क्योंकि बसपा का पर्वतीय क्षेत्र में कोई जनाधार नहीं था।

इसके कुछ समय बाद उनका बसपा से मोह भंग हो गया और 1998 में ही उन्होंने दूसरी बार दल बदल कर कांग्रेस का रुख कर लिया। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद 2002 में पहले विधानसभा चुनाव में हरक सिंह रावत लैंसडौन सीट से मैदान में उतरे और जीत दर्ज की। नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने और हरक भी उनके कैबिनेट का हिस्सा रह। इस बीच 2003 में एक महिला द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोप के बाद उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि बाद में वह इस आरोप से बरी हो गए। 2007 के चुनाव में उन्होंने फिर लैंसडौन सीट पर जीत दर्ज की। तब बहुमत भाजपा को मिला, लिहाजा सरकार भाजपा की बनी। राज्य की इस दूसरी निर्वाचित विधानसभा में हरक पूरे पांच साल नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में रहे। वर्ष 2012 के चुनाव में उन्होंने रुद्रप्रयाग सीट को चुना और यहां भी चुनाव जीतने में सफल रहे। पहले विजय बहुगुणा और फिर हरीश रावत के नेतृत्व में बनी कांग्रेस सरकार में हरक कैबिनेट मंत्री रहे। 2016 में हरक सिंह रावत और कांग्रेस के नौ विधायकों ने विधानसभा सत्र के दौरान पार्टी से विद्रोह कर हरीश रावत सरकार गिराने की कोशिश की। ये सभी विधायक भाजपा में शामिल हो गए। 2017 में हरक सिंह रावत कोटद्वार से चुनाव लड़े और बीजेपी सरकार में मंत्री रहे।

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पांच साल बाद अब फिर इस 2022 के विधानसभा के चुनावी समर में हरक सिंह रावत एक बार फिर दल बदलकर कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। एंटी इनबेंसी के डर के कारण दल बदलने के साथ ही हरक सिंह रावत विधानसभा क्षेत्र बदलने में भी बहुत माहिर हैं। उन्होंने पौड़ी सीट से चुनाव लड़कर कैरियर की शुरूआत की। फिर वह यहां से पलायन कर लैंसडाउन चले गये। 2002 और 2007 के दोनों चुनाव उन्होंने यहीं से लड़े। .2012 में रुद्रप्रयाग से खड़े हुए तो 2017 के चुनाव में कोटद्वार से। अब इस 2022 के चुनाव में कोटद्वार से चुनाव नहीं लड़ना चाहते। उनकी पहली पसंद इस बार डोईवाला सीट बताई जा रही है। अब वह क्यों इतनी सीट बदलते हैं, इसका सही जवाब तो वही दे सकते हैं? लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि वह बस चुनाव जीतने के लिए सीटों को बदलते रहे हैं। आप शुरू से आखिर तक समझ गये होंगे कि किस तरह से सत्तारूपी भूख की महत्वकांक्षा यहां हावी है। यह प्रदेश की जनता को समझ भी आने लगा है शायद। अब देखना यह होगा कि इस चुनाव में जनता जनार्दन का क्या रूख रहता है। कुल मिलाकर यह प्रदेश हित में तो दूर दूर तक नहीं दिखता। कहने का मतलब यह है कि यहां का पैसा वहां लगाया, वहां का कहीं और, जनता ढूंढते रहेगी अपने नेता और मंत्री को!

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