मोदी और शाह की दोस्ती की पूरी कहानी

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धर्मेन्द्र और अमिताभ के बाद अब देश मे इन्हे जय और वीरू कहा जाता है. दो ऐसे धुरंदरों की दोस्ती की कहानी जिनका नाम आज हिन्दुस्तान के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की जुबां पे हैं. पिछले 35 सालों से ये एक दूसरे के पूरक बन हुए हैं.हम बात कर रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की. इस पोलिटिकल स्टोरी मे हम आपको बताएँगे कि कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की मुलाकात हुई, फिर ये मुलाकात कैसे दोस्ती में बदली और फिर कैसे ये दोनो जय और वीरू की जोड़ी बन गये. बात 80 के दशक की है. दोंनों एक ही विचार धारा से जुड़े, वो थी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचार धारा. इस विचार धारा में नरेंद्र मोदी प्रचारक की तरह जुड़े और अमित शाह स्वयं सेवक की तरह ऐसे में आरएसएस की शाखाओं सहित अन्य कार्यक्रमों में इनकी मुलाकात होने लगी और यहीं से नरेंद्र मोदी के विचारों से अमित शाह जुड़ने लगे.

मोदी और शाह की दोस्ती की पूरी कहानी

1984 में नरेंद्र मोदी अहमदाबाद जिले के जिला प्रचारक बन गये और अमित शाह आरएसएस के साथ भारतीय जनता पार्टी से भी जुड़ गये. इस के बाद दोनों की घनिष्ठता बढ़ने लगी. अमित शाह की सोच भी नरेंद्र मोदी को प्रभावित करने लगी. 1986 में नरेंद्र मोदी ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और बीजेपी ने उन्हें गुजरात बीजेपी में संगठन महामंत्री पद पर तैनात किया. संगठन महामंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी को ऐसे युवाओं की जरूरत थी जो बूथ मैनेमेंट से लेकर रणनीति बनाने में उनका सहयोग करे. तो उन्होंने इस सब को लेकर अमित शाह को महत्पूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी फिर दोनों ने मिलकर गुजरात में बीजेपी संगठन को मजबूत करने का काम किया. ऐसे में इनकी दोस्ती भी मजबूत होने लगी. साथ ही नरेंद्र मोदी ने गुजरात बीजेपी में केशुभाई पटेल और शंकर सिंह बाघेला जैसे नेताओं की तरह अपनी पहचान बना दी.

1987 में गुजरात में पहली यात्रा जिसे न्याय यात्रा कहा गया उसमें इन दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही. उसके बाद 1989 में निकाली गई शक्ति यात्रा भी इन्हें के कंधों पर थी. 1990 में गुजरात के सोमनाथ मंदिर से अयोध्या रथ यात्रा की शुरूआत की गई जिसके आयोजन में भी दोनों की महत्पूर्ण भूमिका रही. रथ यात्रा की सफलता के बाद तत्कालीन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने नरेंद्र मोदी को देशव्यापी यात्रा का आयोजक बनाया, जो तमिलनाडू से शुरू हुई थी और श्रीनगर में तिरंगा फहरा कर समाप्त हुई थी. लेकिन 1996 में गुजरात के राजनीतिक घटनाक्रम बदले शंकर सिंह बाघेला ने गुजरात में बीजेपी सरकार गिराने की कोशिश की जिसमें नरेंद्र मोदी को भी सजा मिली और उन्हे गुजरात छोड़कर दिल्ली भेज दिया गया.

यह इन दोनों की दोस्ती की पहली परीक्षा थी. इस समय में अमित शाह हमेशा नरेंद्र मोदी के साथ रहे. 2001 में गुजरात की राजनीति में एक बार फिर नरेंद्र मोदी की इंट्री होती है और वे गुजरात के मुख्यमंत्री बनाये जाते हैं .तब नरेंद्र मोदी ने अमित शाह को अपने मंत्री मंडल में शामिल किया और उन्हें 17 पोर्टफोलियो दिये गये. 2003 में नरेंद्र मोदी फिर गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो नरेंद्र मोदी ने अमित शाह को प्रदेश के गृहमंत्री सहित कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी. 2010 में अमित शाह सोहराबुद्दीन मुठभेड़ में घिरते नजर आये उन्हें जेल तक जाना पड़ा. ऐसे समय में जब मुख्यमंत्री होते हुए नरेंद्र मोदी पर भी सवाल खड़े हो रहे थे, तब भी नरेंद्र मोदी ने अमित शाह का साथ नहीं छोड़ा, यहां तक की उनके परिवार का भी ख्याल रखा. 2014 में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया तो अमित शाह ने इस चुनाव में रणनीतिकार की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. चुनाव बीजेपी के पक्ष में रहा नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गये. नरेंद्र मोदी ने भी इस विश्वास को आगे बढ़ाते हुए अमित शाह को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया. 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने केंद्रीय मंत्री मंडल में अमित शाह को जगह देते हुए देश का गृह मंत्री बनाकर सबसे महत्वपूर्ण पद दिया. ये जोड़ी आपसी भरोसे, सहयोग और समझदारी की जोड़ी है, हमेशा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन को अमित शाह मिशन बनाने का काम करते हैं. और सबसे बड़ी बात, दोनों के रिश्ते के बीच में राजनीतिक महत्वकांक्षा, कभी नहीं आई.

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