देहरादून, ब्यूरो। उत्तराखंड में भाजपा सरकार दूसरी बार लगातार सत्तासीन हुई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी चुनाव हारने के बाद भी फिर से पद पर बने हुए हैं। सभी भाजपाई धुरंधरों को पीछे छोड़ते हुए वह सीएम पद के लिए पहली पसंद बने। वहीं, अब उनके सामने तमाम चुनौतियां हैं, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अगले छह माह के अंदर किस विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा सदस्य के तौर पर अपने को साबित करेंगे। सरकार गठन के चंद दिन बाद पुष्कर सिंह धामी के दो दिवसीय चंपावत दौरे को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं। सीएम साहब जन संवाद कार्यक्रम भी इसी इलाके में आयोजित कर रहे हैं। चंपावत विधायक कैलाश गहतोड़ी पहले ही मुख्यमंत्री के लिए अपनी सीट खाली करने की बात कर चुके हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि कहीं सीएम साहब अपने लिए यह सेफ सीट तो नहीं तलाश रहे हैं। कहीं न कहीं चंपावत और खटीमा का इलाका भी एकदम लगा हुआ है। ऐसे में खटीमा से फिर से चुनाव लड़ने का रिश्क लेने की बजाय सीएम साहब थोड़ा-सा सरक कर चंपावत से चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। इसके अलावा बनबसा इलाके में सीएम साहब एक दिन पहले जनसभा भी कर चुके हैं।

हालांकि अभी तक जो भी मुख्यमंत्री बना वह कभी भी विधायक के तौर पर चुनाव नहीं हारा है। अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी किस विधानसभा सीट से विधायक का चुनाव लड़ेंगे। बता दें कि अपनी सीट खटीमा से चुनाव हारने के बाद सीएम साहब इलाके के लोगों से काफी खफा बताए जा रहे हैं। अगर इलाके के लोग उनको चुनकर विधानसभा भेजते तो आज खटीमा में विकास की बयार फिर से बह रही होती। विधानसभा चुनाव से चंद दिन पहले सीएम बनाए जाने पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खटीमा में विकास योजनाओं की झड़ी लगा दी थी। तमाम घोषणाएं भी उन्होंने इलाके के लिए की थी, लेकिन चुनाव हारने के बाद उनका स्वतः ही क्षेत्र से मोहभंग हो गया। अब उन घोषणाओं और प्रस्तावित योजनाओं का क्या होगा शायद ही कोई पूछने वाला है। जिस तरह से सीएम धामी का चंपावत प्रेम झलक रहा है, उससे तो यही अंदाजा लगाया जा रहा है कि वह चंपावत से चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो चंपावत विधायक को कोई बड़ी जिम्मेदारी भी मिल सकती है। खैर, अभी तो सीएम साहब के पास पांच माह का पूरा समय बचा है। इस बीच या इससे पहले भी वह चुनाव मैदान में उतर सकते हैं।