“उत्तराखण्ड: मुगलों की शिकस्त”, उत्तराखण्डी नारी की जीत।

“उत्तराखण्ड: मुगलों की शिकस्त”, इस रानी के आगे मुगलों ने अपना शीश झुकाया

इतिहास के पन्नों पर से विलुप्त एक वीरांगना। ये शौर्य गाथा उस रानी की है जिसने साधन कम होने के बावजूद भी अपनी सूझ बूझ से भारत के अधिकतर हिस्सों में राज करने वाले मगलों को अच्छी खासी शिकस्त दी थी। हमारे शो “ज़रा याद करो कुरबानी” में आज जानेगें उस वीर नारी के बारे में जिसने पति की मृत्यु के पश्चात राजपाठ और 7 वर्षीय पुत्र दोनों को बखूबी संभाला। उससे पहले अगर आपने हमारे चैनल को subscribe नही किया है तो जल्दी से करलें। क्यूंकी वीरभूमी कहे जाने वाले उत्तराखण्ड की वीरांगनाओं के शौर्य को जानना देश के हर नागरिक के लिए बेहद ज़रूरी है।

सन 1628, मुगल शासकों के राजा शाहजहां का राज्याभीषेक होने जा रहा था। इस समारोह में देश के सभी राजा आगरा पहुंचे। लेकिन उन सभी राजाओं के बीच एक राजा नही थे और वो थे हमारे उत्तराखंड के पंवार वंश के ततकालीन राजा, राजा महिपतशाह । कहा जाता है कि बस उसी शण से शाहजहां इस वाक्य से चिढ़ गए थे। बस उनको इन्तेज़ार था, सिर्फ एक मौके का। और वो मौका भी उनको जल्द मिला। 1635 में राजा महीपतशाह की मृत्यु हो गई। उस समय राजा के 7 वर्षीय पुत्र पृथ्वीपति शाह को राजगद्दी पर बैठाया गया मगर राज काज उनकी मां रानी कर्णावती संभाल रही थी। इसी बात का फायदा उठाते हुए शाहजहां ने गढ़वाल पर आक्रमण का फैसला लिया। लेकिन शायद उसे मालूम नही था कि जिस राज्य में वो आक्रमण करने की रणनीति बना रहा है उस राज्य में हर घर में एक वीर जन्म लेता है। आक्रमण की जिम्मेदारी सौंपी गई शाहजहां  के एक सेनापति नजाबत खान को। 30 हजार घुड़सवारों और पैदल सेना के साथ अब नजाबत खान ने गढ़वाल की तरफ कूच कर दिया। रानी कर्णावती जानती थी कि संख्याबल के आधार पर वे मुगलों से नहीं जीत पाएंगी इसलिए उन्होंने अपनी सूझ बूझ का इस्तेमाल कर नजाबत खान को गढ़गाव में प्रवेश करने दिया। साथ ही संदेश भिजवाया की यदि उनको कुछ समय दिया जाए तो वे मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार कर लेंगी और बादशाह को भेंट स्वरूप दस लाख रूपये भी देंगी.

“उत्तराखण्ड: मुगलों की शिकस्त”, सुनिश्चित करने वाली वो गढ़वाल की रानी

नजावत खान मान गया। रानी ने अगले डेढ़ महीने में उसे केवल एक लाख रुपया दिए. इसी बीच गढ़राज्य की सीमा पर बैठी उसकी सेना के पास खाने की सामग्री खत्म होने लगी. सेना का जो भी सैनिक सामान लेने जाता स्थानीय लोग उसे लूट लेते. नजावत खां की सेना पूरी तरह कमजोर हो गयी, जिसका रानी कर्णावती ने भरपूर फायदा उठाया और पूरी शक्ति के साथ मुगलों पर हमला बोल दिया। युद्ध में जो सैनिक बच गये उनको सजा देने का रानी कर्णावती ने एक ऐसा तरीका निकाला जिससे गढ़राज्य से टकराने की सोच रखने वालों की रूह कांप जाए। रानी ने संदेश भिजवाया कि वह सैनिकों को जीवनदान दे सकती है लेकिन इसके लिये उन्हें अपनी नाक कटवानी होगी। सैनिकों को भी लगा कि नाक कट भी गयी तो क्या, जिंदगी तो रहेगी। मुगल सैनिकों के हथियार छीन लिए गये और आखिर में एक एक करके उनकी नाक काट दी गई। कहते हैं कि शाहजहां का सेनापति नजावतखां भागकर दिल्ली चला गया और जब अपमान का घूंट न पी सका तो दिल्ली में ही उसने आत्महत्या कर ली.

गढ़वाल की सबसे पराक्रमी रानी कर्णावती को इसी कारण से ‘नाक-काटी-रानी’ कहा जाता है. उत्तराखण्ड के इतिहास में दबे गढ़वाल की इस वीरांगना के शौर्य को देवभूमी न्यूज़ करता है नमन।

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