Wed. Apr 1st, 2020

दुर्भाग्यः अब तक पाठ्यक्रम में शामिल नहीं हो पाया उत्तराखण्ड का इतिहास

1 min read

देहरादून। उत्तराखण्ड उस राज्य का नाम है जिसे देवभूमि भी कहा जाता है। ऋषि मुनियों की तपस्थली देवी देवताओं की मौजूदगी वाले स्थान उत्तराखण्ड को अलग पहचान दिलाते है। उत्तराखण्ड की संस्कृति देश ही नहीं वरन विदेशों में भी विश्व विख्यात है। उत्तराखण्ड की संस्कृति ने विदेशों में भी डंका बजाया है। तभी तो प्रतिवर्ष बड़ी संख्या मंे पर्यटक उत्तराखण्ड में आते है। इतना ही नहीं उत्तराखण्ड में चारधाम मौजूद है। जहां बड़ी संख्या में श्रद्वालु  अपनी मन्नतें लेकर आतें हैं। देवभूमि में भगवान शिव, भगवान विष्णु स्वंय विराजमान हैं। यहां गंगा, भागीरथी, अलंकनंदा, जैसी नदियां कलकल करती हुई बहती है। मां गंगा के उद्वगम् स्थल गौमुख भी यहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि उत्तराखंड आदि अनादिकाल से ही देवी देवताओं के साथ ही आमजन के आकर्षण का केंद्र रही है। देवों के स्थान उत्तराखण्ड का जिक्र पुराणोंं तक मंे मिलता है। ऐसे राज्य की यदि अपनी ही सरकार उपेक्षा कर रही हो तो इससे ज्यादा दुर्भाग्य की कोई बात नहीं हो सकती। उत्तराखण्ड जैसे राज्य का इतिहास अपने आप में काफी मायनें रखता है। आने वाली  नस्लों को क्या सिखाया पढ़ाया जायेगा यह वर्तमान में चिंता का विषय है। पुराणों मंे जो लिखा हुआ है वह तो वे पढ़ लेगे लेकिन राज्य बनाने के लिये जो संघर्ष हुआ उसे वह कैसे पढ़ेगें। इसकी कोई प्रमाणित पुस्तक भी मौजूद नहीं है। लिपिबद्व इतिहास कहां मिलेगा और कैसे मिलेगा इस सवाल का जवाब सरकार तक के पास नहीं है। वैसे सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अपने स्तर पर उत्तराखण्ड का इतिहास तलाश करने का प्रयास किया था उन्होंने बकायदा 9 नवम्बर 2012 को सूचना एवं लोकजनसंपर्क विभाग की विकास पुस्तिका का विमोचन करते हुए घोषणा की थी कि राज्य निर्माण आंदोलन के इतिहास को उत्कृष्ट रूप से लिपिबद्व किये जाने हेतु तीन सर्वोत्कृष्ट कृतियों का चयन किया जायें। चयनित प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय कृति को क्रमशः 5 लाख, 3 लाख एवं 2 लाख की राशि से पुस्कृत किया जायेगा। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद इस संबंध में फाइल भी शुरू हुई जिसमें अनुसचिव से लेकर सचिवों तक के आदेश दिशा निर्देश सम्माहित होते चले गये। लेकिन कृतियों का चयन न हो पाया। मामले की गम्भीरता को देखते हुए सूबे की महामहिम ने इस संबंध में अपनी सहर्ष स्वीकृति तक प्रदान कर दी थी। 3 दिसम्बर 2014 को बकायदा उत्तराखण्ड शासन के सचिव डॉ. उमाकांत पंवार ने संस्कृति निदेशालय उत्तराखण्ड के निदेशक को राज्य निर्माण आंदोलन के इतिहास को उत्कृष्ट रूप से लिपिबद्व किये जाने के लिये तीन सर्वोत्कृष्ट कृतियांे के चयन कर चयनित प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय कृति को क्रमशः 5 लाख, 3 लाख एवं 2 लाख की राशि से पुरूस्कृत किये जाने के संबंध में दिशा निर्देश भी जारी किये थें। जिस पर संस्कृति निदेशालय ने 21 मई 2013 को दैनिक समाचार पत्रों मंे विज्ञापन प्रकाशित कर सवोत्कृष्ट कृतियों के लिये लेखक, साहित्यकार, इतिहासकारों से उनकी कृतियां आमंत्रित कर ली।लेकिन इस विज्ञापन के जारी करने के बाद संस्कृति निदेशालय ने सवोत्कृष्ट कृतियों का चयन आज तक नहीं किया है जबकि विज्ञापन के प्रकाशित होने के बाद संस्कृति निदेशालय को 31 साहित्यकारों, लेखकों, इतिहासकारों की कृतियां प्राप्त हो चुकी थी। जिनमें से तीन कृतियों का बड़े आराम से चयन किया जा सकता था। इन कृतियों मंे कुछ ऐसी है जो अपने आप में प्रमाणित इतिहास को अपने में समाहित किये हुए है। यदि इस इतिहास को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया जायें तो निश्चित रूप से हमारी आने वाली पीढ़ियों को उत्तराखण्ड के संबंध में छोटी से छोटी घटना, राज्य आंदोलन के बारे में संपूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जायेगा। इतना ही नहीं पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की जो घोषणा है वह भी पूरी हो जायेगी। लेकिन सरकार की हीला हवाली न ही विजय बहुगुणा की घोषणा को पूरा होने दे रही है और न ही बच्चोें के पाठ्यक्रम में उत्तराखण्ड का इतिहास शामिल होने दे रही है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इन तीन सर्वोत्कृष्ट कृतियों के चयन के लिये चयन समिति का गठन कब तक करती है। जो समिति गठित होनी है उसमें सचिव, संस्कृति विभाग, उत्तराखंड शासन अध्यक्ष, निदेशक, संस्कृति विभाग उत्तराखण्ड सदस्य@सचिव, गढ़वाल एवं कुमाउं विश्वविद्यालय से एक-एक विषय विशेषज्ञ सदस्य, अध्यक्ष द्वारा नामित प्रदेश में साहित्य तथा इतिहास के क्षेत्र से जुड़े दो ख्यातिलब्ध महानुभाव सदस्य के रूप मंे शामिल होना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *